पत्र तेईसवाँ
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ताहिती वाले ख़त का जवाब. ख़त शुरू होता है यादों से.
जनवरी की याद आती है, पत्र फ़रवरी के मध्य में लिखा गया है. मगर यादें विश्वसनीय
नहीं प्रतीत होतीं. भाप, बिजली और जिम्मी की शताब्दी ने ज़िन्दगी की रफ़्तार को तेज़
कर दिया है. पत्र ‘समर्पण’ लिखने की कोशिश से समाप्त होता है, अंतिम परिच्छेद
आवेशपूर्ण शैली के अनुभव के रूप में दिये गए हैं. उन्हें उसी तरह देखें.
(ये उसी दिन का दूसरा पत्र है).
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तुमने अपने बारे में मेरे लिये लिखा है.
तुम मेरे लिए मुस्कुरा सकती हो, मेरे लिए लंच कर सकती हो या मेरे लिए कहीं भी,
किसी के भी साथ आ सकती हो. मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकता.
तुम्हें शायद वे शब्द याद नहीं हैं, जो तुमने नोट-बुक के पन्ने पर लिखे थे.
अगर वे एक मिनट के लिए भी सच होते, अगर तुम उन्हें भूल गई हो, तो मैं भी
तुम्हारे लिए अपने बारे में लिखता, या कम से कम तुम्हारे बारे में तुम्हारे लिए
लिखता.
मगर नोट-बुक खो चुकी है, और पत्रों को ढूँढ़ा नहीं जा सकता.
माफ़ करना, आल्या “प्यार” शब्द फिर से मेरे ख़त में अनावृत्त रूप से फ़िसल कर आ
गया है. प्यार के बारे में न लिखते-लिखते मैं थक गया हूँ. मेरे ख़तों में पराये लोग
ही होते हैं, या तो तुमसे मुलाक़ात करते हुए, तीन-तीन, चार-चार, और कभी तो उनका
पूरा झुण्ड ही होता है.
मेरे शब्दों को आज़ाद कर दो, आल्या, जिससे वे तुम्हारे पास आ सकें.
मुझे प्यार के बारे में लिखने की इजाज़त दे दो.
मगर, रोने की ज़रूरत नहीं है, मुझे ख़ुद भी हल्का-हल्का और प्रसन्न महसूस हो रहा
है, गर्मियों वाली छतरी की तरह.
तुम्हारा ख़त ज़्यादा अच्छा है. तुम्हारे लहज़े में आत्मविश्वास है – तुम आवाज़ ऊँची
नहीं करती हो.
मुझे कुछ ईर्ष्या भी होती है.
तुम ताहिती गई थीं, और इसके अलावा, तुम्हारे लिए इसके बारे में लिखना आसान है.
तुम्हें मालूम नहीं है – और ये अच्छा भी है, - कि कई शब्दों पर पाबन्दी है.
फूलों से संबंधित शब्दों पर पाबन्दी है. बसंत पर पाबन्दी है. आम तौर से सारे
अच्छे शब्द बेहोशी की हालत में होते हैं.
बुद्धिमत्ता और व्यंग्य से मैं उकता गया हूँ.
तुम्हारे ख़त ने मेरे भीतर ईर्ष्या को जगा दिया.
कितना दिल चाहता है कि चीज़ों का वर्णन इस तरह सरलता से करूँ, जैसे साहित्य कभी
था ही नहीं और इसलिए साहित्यिक तरह से लिखा जा सकता है.
लम्बे वाक्यों का इस्तेमाल करके कुछ इस तरह से लिखा जा सकता था: “आश्चर्यजनक
है द्नेप्र शांत ख़ामोश मौसम में’.
मैं भी “अनमुरझाए”, - नहीं, बेहतर है “अनकुम्हलाए” पुष्प-हार के बारे में
लिखना चाहता हूँ.
पुष्प- हारों के बारे में लिखूँगा, और प्रेरणा तुम्हारे पत्र से लूँगा.
आल्या, मैं शब्दों को रोक नहीं सकता!
मैं तुमसे प्यार करता हूँ. पूरे जोशोख़रोश से, ऑर्गन बजाते हुए.
ये – शब्द हैं.
तुमने मेरे प्यार को टेलिफ़ोन के चोगे में भगा दिया है. ये मैं कह रहा हूँ.
मगर शब्द कहते हैं: “वो – तेरे लिए और तेरी ज़िन्दगी के लिए इकलौता द्वीप है. वहाँ
से तू वापस नहीं आ सकता. बस, उसके चारों ओर का समुद्र रंगीन है.”
और हम सब एक साथ कहते हैं.
वह औरत, जो मुझे अपने पास नहीं आने देती! तेरी देहलीज़ पे, काले तापू की तरह, मेरी
किताब को पड़ा रहने दे! मगर वह सफ़ेद है. नहीं, बल्कि इसका उल्टा है. ताना देने की ज़रूरत
नहीं है. प्यारी! मेरी किताब तेरे नाम को घेर ले, उसके चारों ओर सफ़ेद, चौड़े, अनमुरझाए,
अनकुम्हलाए, अनशिथिल पुष्प-हार की तरह पड़ी रहे.
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