पत्र सत्रहवाँ
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क्लाइमेक्स की
अपरिहार्यता और पूर्वानुमान के बारे में. उसके इंतज़ार में कॉरेस्पोन्डेंट पहले
हैमबर्ग के बारे में, फिर एक कॉलम में भूरे ड्रेस्डेन के बारे में, और बेशक,
रेडीमेड घरों वाले शहर – बर्लिन के बारे में लिखता है; आगे वर्णन है उस रिंग के
बारे में जिससे होकर लेखक के सारे विचार गुज़रते हैं, लोहे के बारह पुलों के नीचे
से उसके सफ़र के बारे में और मुलाक़ात के बारे में. और इस बारे में भी कि शब्द अनुपयोगी
होते हैं.
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मैं पूरी तरह
गड़बड़ा गया हूँ, आल्या! देखो, बात ये है कि: मैं तुम्हें पत्र लिखने के साथ-साथ
किताब भी लिख रहा हूँ. और - वो जो किताब में है, और वो, जो ज़िन्दगी में है, पूरी
तरह गड्ड्मड्ड हो गया है.
याद है, मैंने तुम्हें आन्द्रे बेली के बारे में और साहित्य की विधा के बारे में लिखा था? प्यार की अपनी-अपनी विधाएँ होती हैं, सभी चालों का अपना तर्क होता है, जो मेरे बिना और हमारे बिना स्थापित है. मैंने ‘प्यार’ शब्द का उच्चारण किया और चाल चल दी. खेल शुरू हो गया. अब प्यार कहाँ है, किताब कहाँ है, मुझे नहीं मालूम. खेल आगे बढ़ता जा रहा है. तीसरी या चौथी प्रिंटर-शीट पर मुझे अपनी शह और मात मिल जाएगी. आरंभिक चाल चली जा चुकी है. क्लाइमेक्स को कोई भी बदल नहीं सकता.
पत्रों वाले उपन्यास में शोकांतिकाओं का, कम से कम – टूटे हुए दिल का पूर्वानुमान हो चुका है.
फ़िलहाल सिर्फ अपने लिए उस जगह का वर्णन करता हूँ, जहाँ घटनाक्रम घटित होता है.
बर्लिन का
वर्णन करना मुश्किल है.
अगर हैम्बर्ग का वर्णन करना हो तो नहरों के ऊपर उड़ते हुए समुद्री पंछियों के बारे में, दुकानों के बारे में, नहरों के ऊपर झुके हुए घरों के बारे में कुछ कहा जा सकता है, हर उस चीज़ के बारे में, जिसका आम तौर से वर्णन किया जाता है. जब हैम्बुर्ग शहर के फ्री-पोर्ट पर आते हो, तो गेट्स सरकते हुए परदे की तरह खुल जाते हैं. बिल्कुल थियेटर जैसा लगता है. पानी का विशाल खेत, झुकती हुई क्रेन्स, काली बाल्टियाँ, जो अपने मुँह में स्टीमर्स से कोयला समेटती हैं. उनके जबड़े, मगर के जबड़ों के समान, एकदम दोनों तरफ़ खुल जाते हैं. ऊँची, पिस्तौल की गोली की ऊँचाई पर, जालीदार लिफ्ट्स. तैरते हुए एलिवेटर्स, जो दिन भर में 35,000 मन अनाज सोख कर निकाल सकते हैं.
ऐसे चूषक के पास जाकर कहना चाहिए: “डियर कॉम्रेड, प्लीज़ मेरे भीतर से 35,000 प्यार के शैतानों को चूस लो, जो मेरी रूह को खाए जा रहे हैं”.
या फिर सबसे बड़ी क्रेन से कहना चाहिए कि वह मुझे गिरेबान पकड़कर ऊपर उठा ले और गेट्स से, खूब सारे लोहे से, स्टीमरों से अटी पड़ी एल्बा दिखाए. कारें तो इन स्टीमरों के सामने – एकदम मक्खियों जैसी लगती हैं. और तब स्टीम-क्रेन मुझसे कहे: “सेन्टीमेन्टल पिल्ले, देख उस लोहे की तरफ़ जो सिर के बल खड़ा है. रोना-बिसूरना अच्छी बात नहीं है, और अगर तुम जी नहीं सकते तो अपना सिर कोयले की बाल्टी में घुसा लो, जिससे उस पर वह खरोंचे पड़ जाएँ.”
सही है!
हैम्बुर्ग का वर्णन किया जा सकता है.
अगर ड्रेज़्डेन का वर्णन करना हो, तो, निसःन्देह काम ज़्यादा होगा. मगर एक रास्ता है, जिसकी ओर नए रूसी साहित्य में अक्सर भागते हैं.
ड्रेज़्डेन का कोई एक पक्ष ले लीजिए – उदाहरण के लिए, यह, कि उसमें कारें बेहद साफ़ हैं, और उनमें भीतर से धारियों वाला भूरा कपड़ा जड़ा है.
आगे, हर बात उतनी ही आसान है, जैसे क्रेन के लिए एक टन वज़न उठाना.
ये यक़ीन दिलाना होगा कि पूरा ड्रेज़्डेन धारियों वाला भूरा है, और एल्बा – भूरे पर धारियों वाला, और घर हैं भूरे, और सिस्टीन मैडोना16 धारियों वाली भूरी है.
ये मुश्किल से
ही सही होगा, मगर बहुत ही आश्वासक और बढ़िया लहज़े में होगा.
धारियों वाला
भूरा.
मगर बर्लिन का वर्णन करना कठिन है. उसे पकड़ नहीं सकते.
बर्लिन मे रूसी, जैसा कि सबको मालूम है, ज़ू-पार्क के आस-पास रहते हैं.
इस तथ्य का सर्वविदित होना अप्रिय है.
युद्ध के समय कहते थे : “ जैसा कि सर्वविदित है, जर्मन आम तौर से बसंत में आक्रमण करते हैं”. जैसे कि जर्मन बसंत की तरह आक्रमण करते हैं.
बर्लिन में रूसी ओल्ड-चर्च के आस-पास ही घूमते रहते हैं, जैसे मक्खियाँ फ़ानूस के चारों ओर उड़ती रहती हैं. और, जैसे फ़ानूस पर मक्खियों के लिए कागज़ का गोला टंगा रहता है, वैसे ही इस चर्च में भी क्रॉस के ऊपर एक विचित्र सा कंटीला अखरोट लटकाया गया है.
सड़कें, जो इस अख़रोट की ऊँचाई से दिखाई देती हैं, चौड़ी हैं. घर एक जैसे हैं, सूटकेसों जैसे. रास्ते पर बिल्ली की खाल वाले ओवर-कोट और चमड़े के भारी जूतों में औरतें चलती हैं, और उनके बीच में होती हो तुम, अपने बिल्ली की खाल की कॉलर वाले चूहे के रंग के ओवरकोट में.
सड़कों पर एक साथ चल रहे हैं सट्टेबाज़ - अपने खुरदुरे ओवरकोटों में, और रूसी प्रोफेसर - अपना छतरी वाला हाथ पीठ के पीछे रखे हुए. ट्रामगाड़ियाँ खूब सारी हैं, मगर उनमें बैठकर शहर में घूमने में कोई तुक नहीं है, क्योंकि शहर हर जगह एक सा ही है. तैयार महलों की दुकान से बनाये गए महल. स्मारक – सेट्स जैसे. हम कहीं नहीं जाते, जर्मनों के बीच एक झुण्ड बनाकर रहते हैं, जैसे किनारों के बीच कोई तालाब हो.
सर्दियाँ नहीं हैं. बर्फ – कभी गिरती है, कभी पिघलती है.
नमी और पराजय में लौह-जर्मनी को ज़ंग लग रही है, और हम ज़ंग की तरह फैलते जाते हैं, उसके साथ ही ख़ुद भी ज़ंग खा रहे हैं, हम - अलौह हैं.
क्लैस्ट्रास में, इवान पूनी के घर के सामने, एक घर है जिसमें एलेना फेरारी रहती है.
उसका चेहरा पोर्सिलीन जैसा है, और बरौनियाँ बड़ी-बड़ी, जो पलकों को ताने रखती हैं.
वह अज्वलनशील
तिजोरियों के दरवाज़ों की तरह उन्हें बन्द कर सकती है.
इन दो मशहूर घरों के बीच से अण्डरग्राउंड रेल लपकती हुई बाहर आती है और चीख़ती हुई पुल पर चढ़ जाती है.
रेल विट्टेनबर्गप्लाट्ज़ स्टेशन से आती है और ऊपर उठते हुए भारी-भरकम रॉकेट जैसी प्रतीत होती है.
आगे रेल लाल-चर्च के पीछे फुदकती है, और बर्लिन के चर्च तो एक दूसरे से इतने मिलते-जुलते हैं कि उन्हें सिर्फ उन सड़कों के नाम से ही पहचान सकते हैं, जिन पर वे स्थित होते हैं.
लाल-चर्च के पीछे, घरों के बीच से रेल इस तरह फुदकती है जैसे विक्टरी-आर्क से होकर जा रही हो.
आगे बर्लिन की सभी रेलों का जंक्शन – ग्लेस्ड्रीक है. रूसियों को जो जर्मनों के बीच किनारों से घिरे तालाब की तरह रहते हैं, ग्लेस्ड्रीक से ट्रेन बदलनी पड़ती है.
यहाँ से रेल भागती है लिप्ज़िगरप्लाट्ज़ और अन्य चौकों की ओर, जहाँ ग़रीब लोग माचिस बेचते हैं और कम्बलों से ढंके कुत्ते - – अंधों के गाईड्स - ख़ामोश पड़े रहते हैं.
ग्रामोफोन रिरियाते हैं, वे कोई गाने-वाने नहीं बजाते, बल्कि सिर्फ कराहते हैं. ये बर्लिन की यांत्रिक-कराह है.
अगर चौराहों पर न जाकर ग्लेस्ड्रीक के खाली फ़ाटक से बाहर निकलो, तो न तुम्हें जर्मन दिखाई देंगे, न प्रोफ़ेसर्स, न ही कोई गेट्स.
चारों ओर, लम्बी, पीली बिल्डिंग्स की छतों के किनारे-किनारे से रास्ते जाते हैं, रास्ते ज़मीन से गुज़रते हैं, ऊँचे-ऊँचे लोहे के पुलों से गुज़रते हैं, लोहे के पुलों को छेदते हैं, दूसरे, और अधिक ऊँचे, पुलों को पार करते हैं.
हज़ारों रोशनियाँ, फ्लैशलाइट्स, सिग्नल्स-पॉइंट्स, तीन टाँगों पर सवार लोहे के गोले, सिग्नल्स, चारों ओर सिग्नल्स ही सिग्नल्स.
पीड़ा, शरणार्थी प्यार और ट्राम नं. 44 मुझे यहाँ ले आए, मैं रास्तों के ऊपर वाले पुलों पर काफ़ी देर तक चलता रहा, जो यहाँ इस तरह एक दूसरे को छेदते हैं, जैसे अंगूठी के बीच से गुज़ारी जाने वाली शॉल के धागे एक दूसरे को छेदते हैं.
ये अंगूठी – बर्लिन है.
मेरे ख़यालों के लिए ये अंगूठी है – तुम्हारा नाम.
मैं अक्सर रात को तुम्हारे यहाँ से लौटते हुए बारह लोहे के पुलों के नीचे से गुज़रता हूँ.
चलता जाता हूँ, चलता जाता हूँ. सोचता हूँ, जर्मनी के लोहे के दिल – ग्लेसड्रीक – और हैम्बुर्ग के लोहे के गेट्स को ज़िन्दगी सिर्फ रेडीमेड चीज़ें ही देती है – घर, सूटकेसों जैसे, ट्राम्स, जिनमें कहीं नहीं जा सकते. वापस लौटते हुए चल रहा हूँ.
बारह लोहे के पुलों के नीचे वाले रास्ते से जाता हूँ.
दूर जाना है. पोस्टडैमेरस्ट्रास के नुक्कड़ पर हर रोज़ लाल हैट वाली एक ही वेश्या को देखता हूँ.
मुझे देखकर वह कुछ गाती है, फिर किसी समझ में न आने वाली भाषा में कुछ कहती है.
बगल से गुज़रता हूँ, मुझे दूर जाना है.
क्या करूँ, लाल हैट वाली कॉम्रेड!
दुनिया में विभिन प्रकार के जानवर हैं, और वे सब अपने-अपने तरीक़े से ख़ुदा की तारीफ़ करते हैं और उसे गालियाँ देते हैं.
तुम समुद्र के तल में बिना शब्दों के डुबकी लगाती हो और समुद्र के तल से रेत का एक कण लाती हो, बहता हुआ, कीचड़ जैसा.
और मेरे पास बहुत
शब्द हैं, मुझमें शक्ति है, मगर वो, जिससे मैं सारे शब्द कहता हूँ, - विदेशी है.
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