गुरुवार, 23 जुलाई 2015

Twenty first Letter

पत्र इक्कीसवाँ
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अलीना का पाँचवा. इस पत्र में ताहिती द्वीप के बारे में लिखा गया है, जिस पर सब कुछ बुरा है.
द्वीप पर जहाज़ों से पेट्रोल की बू आती है, और ये भी बुरा है.
ये द्वीप बहुत दूर है, उसे प्यार नहीं किया जा सकता.
वह दूर ही रहेगा, उस पर रहने लगो, तब भी.
पत्र में तान्यूशा नामक घोड़े के बारे में और उसके मूरिया द्वीप पर भेजे जाने का ज़िक्र है. ताहिती से इस द्वीप तक डेढ़ घण्टे का सफ़र है. 
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प्यारे!

ताहिती के बारे में सोचना अच्छा लगता है, मगर उसके बारे में बताना उतना दिलचस्प नहीं है. मम्मा हमेशा कहती थी कि आसपास की दुनिया और घटनाओं के प्रति मेरा रवैया बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं है: मुझे ये नहीं मालूम कि ताहिती की आबादी कितनी है, उसमें कितने गोरे और कितने काले हैं, उसका क्षेत्रफ़ल कितना है, पहाड़ कितने ऊँचे हैं. मेरा दिल बस उस प्यारे द्वीप पर, उस जादुई समुद्र पर वापस जाना चाहता है. पानी नीला-नीला है, रंगीन स्याही की तरह, कोरल रीफ़ चारों ओर से द्वीप को घेरे हुए है; जाने-पहचाने शोर के साथ लहरें रीफ़ से टकराती हैं, और फ़ेन का विशाल सफ़ेद हार बनाती हैं; सफ़ेद फूल – तिआरे – साँवले मुस्कुराते चेहरे पर कान के पीछे और वनिला निरंतर महकते रहते हैं; किनारे पर केंकडों के गुच्छे-गुच्छे तेज़ी से लपकते हैं; मूरिआ के पीछे सूरज डूब रहा है. ये मैं जानती हूँ, देखती हूँ, महसूस करती हूँ.

ख़ैर, बात उसके बारे में नहीं है; मैं तुम्हें तान्यूशा के बारे में बताना चाहती थी. आन्द्रे ने मुझे एक छोटा सा घोड़ा भेंट में दिया. मानो भूमध्य रेखा, ऊँचे तापमान और नारियल को चिढ़ाने के लिए मैंने उसका नाम रखा तान्यूशा. जब बूढ़ा, काला तापू उसे ‘तान्यूसा’ कहकर पुकारता तो मुझे बड़ी ख़ुशी होती. उसकी देखभाल मैं ख़ुद ही करती थी, उसकी सफ़ाई करती, उसे खिलाती, पिलाती. वह भी मुझसे अच्छे से पेश आती. केलों के लिए टेरेस के पास आती और हौले से हिनहिनाती. जब तान्यूशा खा-पीकर होशियार और ख़ूबसूरत हो गई, तो उसका स्वभाव एकदम बदल गया: कोई उसकी सवारी करे ये उसे अच्छा नहीं लगता था, और जैसे ही बैठो, तो वह गोल-गोल घूमने लगती, पीछे-पीछे हटने लगती, चाहे फिर उसके पीछे कुछ भी क्यों न हो – पानी, कंटीली फेन्सिंग, लोग. और, फिर वह एकदम भाग गई, घने टापू के बीच में – ढूँढ़ते रहो उसे! आन्द्रे उन दिनों वहाँ था नहीं, वह अक्सर दूसरे द्वीपों को देखने चला जाता. मेरे बेडरूम में थे पाँच दरवाज़े और एक खिड़की! सब पूरे खुले हुए! ताहिती की रातें इतनी निःशब्द, संतृप्त, इतनी साफ़ होती हैं कि ख़ुद काले लोग भी रात को घर से दूर नहीं जाते. मैं पागलपन की हद तक डरती थी, आँसू निकल आते थे. आख़िरकार मैंने दरवाज़े के पास तापू को तैनात कर दिया. तान्यूशा के भाग जाने के बाद मैं पूरी रात रोती रही. उन दिनों मैं अक्सर रोती रहती थी. तापू ने सुना और सोचा, कि मैं डर रही हूँ -   पति आयेगा और घोड़ा गुम जाने के कारण मुझे मारेगा. सुबह बोला: “तू मत रो, मैं तान्यूसा को ढूँढ़ लूँगा, और तेरे मरद को कुछ भी पता नहीं चलेगा.” उसने मुस्कुराते, काले लड़कों को चारों ओर भेज दिया, और तान्यूशा को वापस अपनी जगह पर बांध दिया गया.

जब आन्द्रे वापस आया और उसे तान्यूशा के भाग जाने के बारे में पता चला, तो उसने फ़ौरन उसे बेच दिया. वह घोड़ों से इन्सानों की ही तरह पेश आता था और उसने ये फ़ैसला किया कि तान्यूशा ने निहायत घटिया दर्जे की नमकहरामी की है, जिसे बर्दाश्त करना नामुमकिन है. तान्यूशा को स्टीमर में लाद दिया गया और मूरिआ पे एक अंग्रेज़ के पास ले गए. वो ग़रीब, कितने हिचकोले खा रही थी!

तुम मेरे बारे में लिखते हो – अपने लिए, मैं अपने बारे में लिखती हूँ – तुम्हारे लिए.

आल्या       


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