प्रस्तावना
उन्नीसवें पत्र की
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
अलीना के पत्र के
बारे में, एस्पिरीन के बारे में, हैरिंग मछली के, टेलिफोन के बारे में, प्यार के
जड़त्व के बारे में, अंग्रेज़-डान्सर के बारे में और दूध-आया स्तेशा के बारे में.
प्रस्तावना में विस्तार से समझाया गया है कि अलीना का पत्र क्यों नहीं पढ़ना चाहिए.
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
अलीना का पत्र पूरी किताब में सबसे अच्छा
है. मगर उसे अभी न पढ़िए. फ़िलहाल इसे छोड़ दीजिए और किताब पूरी ख़त्म करने के बाद ही
पढ़िए. मैं आपको अभी समझाता हूँ कि ऐसा क्यों करना चाहिए.
मैंने भी उसे उसी समय नहीं पढ़ा. उसे चूमा,
उस पर यहाँ-वहाँ नज़र दौड़ाई, मगर वह पेन्सिल से लिखा था, और मैंने नहीं पढ़ा.
अभी समझाता हूँ कि क्यों. मैं – बहरा हूँ.
मतलब, मैं बॉयलर्स की मरम्मत करता था, भीतर घुस कर प्यायर्स से जोड़ों को पकड़े
रहता. कानों में हमेशा, बस शोर ही रहता. मैं सिर्फ देखता था कि लोगों के होंठ कैसे
हिलते हैं, मगर मैं कुछ भी सुन नहीं सकता था. ज़िन्दगी ने बहरा कर दिया था – बहरे
आदमी अपने आप में ही सिमटे रहते हैं.
आल्या का ख़त अभी हाल ही में पढ़ पाया, 10
मार्च को, किताब पूरी लिखने के बाद. उसे चार घंटे पढ़ता रहा. सबसे पहले, ख़त बड़ी
अच्छी तरह लिखा हुआ है. ईमानदारी से कह रहा हूँ, मैंने उसे नहीं लिखा. प्यार के
जड़त्व के बारे में उसमें बिल्कुल सच्ची बात कही गई है और एक और अलिखित सत्य –
दुर्भाग्य के जड़त्व के बारे में.
मुझे विदेश में आकर टूटना था, और मुझे
टूटता हुआ प्यार मिला. मैंने उस औरत की ओर देखा भी नहीं और यही विचार मन में लिए
उसके पास आया कि वह मुझे प्यार नहीं करती है. मैं यह नहीं कहता, कि वर्ना वह मुझसे
प्यार करने लगती. मगर हर चीज़ पूर्वनियोजित थी. ये ख़त दो संस्कृतियों के बारे में
प्लान को बर्बाद कर रहा है, क्योंकि वह औरत जिसने स्तेशा के बारे में इस तरह लिखा
है – अपनी है.
इसलिए, प्यारे दोस्तों, इस पत्र को न
पढ़ें, इसीलिए मैंने जानबूझकर उस पर लाल क्रॉस बना दिया है. ताकि आप गलती न करें.
इस पत्र की बनावट को कैसे समझा जाए? क्योंकि
उसे मैंने यहाँ रखा तो है.
मगर, बताईये तो, आपको बनावट की ज़रूरत क्यों
पड़ गई? और अगर ज़रूरत है – तो प्लीज़, शौक से!
किसी रचना की व्यंग्यात्मकता के लिए कार्यकलाप
को समझने की दुहरी कुंजी की आवश्यकता पड़ती है. अक्सर इसे दबे-दबे अंदाज़ में दिखाया
जाता है, उदाहरणार्थ, “येव्गेनी ओनेगिन” में, इस वाक्य से : “ये आदमी कहीं पैरोडी तो
नहीं?”
अपनी किताब में उस औरत के लिए, जिसे मैं पत्र
लिखता था, दूसरी – अतिशयोक्ति की – कुंजी का इस्तेमाल कर रहा हूँ, और अपने लिए भी वैसी
ही कुंजी का प्रयोग कर रहा हूँ.
मैं – बहरा हूँ.
अगर आपको बनावट के बारे में दी गई मेरी सफ़ाई
पर विश्वास नहीं है, तो आपको यह भी विश्वास करना पड़ेगा कि अपने लिए अलीना का पत्र मैंने
ख़ुद ही लिखा है.
मैं सलाह दूंगा कि विश्वास करें....ये अलीना
का ही पत्र है.
ख़ैर, आप वैसे ही कुछ भी नहीं समझ पाएंगे, क्योंकि
सुधार करते समय सब गड्ड—मड्ड हो गया है.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें