पत्र तेरहवाँ
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पत्र रूस के मित्रों को
लिखा गया है; इससे स्पष्ट होता है कि लेखक पर कोई सनक सवार है. पत्र में इस बारे
में बताया गया है कि आइन्स्टीन के आविष्कार के बाद भी स्थल-काल घेरे बिना जीना
कितना मुश्किल है. पत्र समाप्त होता है बर्लिन में सर्वनाम ‘हम’ के गलत प्रयोग पर
अप्रसन्नता से.
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प्यारे
दोस्तों, तुम मुझे इतना कम क्यों लिखते हो?
कहीं तुमने मुझे
अपने दिल से तो नहीं निकाल दिया?
मुझे
लोगों-परछाइयों से बचाइए, उन लोगों से बचाइए जो मुक्त हो चुके हैं शैफ़्ट (बम) से,
ज़ंग से,
पूरी ज़िन्दगी से, जो (यहाँ ज़िन्दगी से तात्पर्य है – अनु.) मुझसे एक ही बात कहती है:
“तू रह सकता
है, मगर मुझसे जगह और समय न मांग”.
और कहती है:
“ये रहा तेरे लिए दिन और ये रही रात, और तू इनके
दरम्यान जी ले. सिर्फ सुबह और शाम को मेरे पास न आ”.
मेरे दोस्तों,
भाईयों! कितनी गलत बात है कि मैं यहाँ हूँ!
तुम सब लोग
बाहर जाओ, नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट पर, निवेदन करो, मांग करो कि मुझे वापस लौटने की
इजाज़त दी जाए.
अप्रिय
प्रसंगों से बचने के लिए, नेव्स्की पर ट्राम में जा सकते हो.
मगर अपने पाँव
ज़मीन पर ही रहने दो, दोस्तों.
मैं बर्लिन से
जुड़ गया हूँ, मगर यदि मुझसे कहा जाता: “वापस लौट सकते हो”, - तो, मैं OPOYAZ की क़सम खाकर कहता हूँ कि बिना पीछे मुड़ कर देखे, बिना अपनी पाण्डुलिपियाँ साथ
लिए घर वापस चला जाता. फोन किए बिना.
मुझे फोन करने की इजाज़त नहीं है.
तुम लोग आजकल क्या लिख रहे हो?
क्या कल्चरल हाउस के सामने वाली मोर्स्काया के पुल की मरम्मत कर दी गई है?
बिना किसी मक़सद के जीने से बेहतर होगा इस गड्ढ़े में मुर्दे की तरह लेट जाना,
जिससे लॉरियों के लिए रास्ता सुधारा जा सके.
क्या पीटर्सबुर्ग में बहुत कारें हैं?
आप लोगों का प्रकाशन कैसे चल रहा है?
हम काफ़ी कुछ प्रकाशित कर लेते हैं.
सिर्फ यहाँ ‘हम’ अजीब सा शब्द प्रतीत होता है.
एक महिला ने मुझे फ़ोन किया. मैं बीमार था.
कुछ देर बात की. मैंने कहा कि घर में बैठा हूँ.
मगर, रिसीवर लटकाते हुए वह बोली:
“आज हम थियेटर जा रहे हैं”.
चूंकि मैंने अभी-अभी उससे बात की थी, इसलिए मैं समझ नहीं पाया:
“ये ‘हम’ कौन? मैं तो बीमार हूँ”.
कितनी अविश्वसनीय बात है! ‘हम’, मतलब - मैं और कोई और.
रूस में “हम” काफ़ी मज़बूत होता है.
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