पत्र दसवाँ
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उस औरत के बारे में, जो ड्रेस चुनती है;
और उन वस्तुओं के बारे में जिनके हाथ होते हैं.
यहाँ फ्रॉक-कोट के बारे में एक ग़लतफ़हमी का
ज़िक्र है. मगर पत्र का मुख्य सारांश – वह किस्सा है कि प्योत्र बगातीरेव की हैट
में केरेन्का* मिला, कैसे वह
मॉस्को में रो नहीं सकता था और कैसे प्राग के रेस्टारेंट में रो पड़ा.
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तो, मैं पराई संस्कृति और पराई औरत के
बारे में लिख रहा हूँ.
औरत, हो सकता है, कि एकदम पराई न भी हो.
मैं तुम्हारी शिकायत नहीं कर रहा हूँ, आल्या. सिर्फ तुम – बेहद औरत हो.
तुम कहती हो: “जब लम्बे समय से किसी ड्रेस की ख़्वाहिश होती हो, तो फिर उसे ख़रीदना ही नहीं चाहिए – जैसे तुमने उसे पहन लिया हो और पहन-पहन कर पुराना कर दिया हो.”
दुकान में तो औरत, बेशक, चीज़ों से फ्लर्ट करती है, उसे हर चीज़ अच्छी लगती है.
ये यूरोपियन मानसिकता है.
अगर कोई चीज़ पसन्द नहीं आती, तो इसमें, निःसन्देह, उस चीज़ का ही क़ुसूर होता है.
ख़ास तौर से वे चीज़ें जिनके हाथ होते हैं.
मगर हर सैनिक अपने ज़ख़्म में अपनी हार ही लिए होता है.
युद्ध के मैदान में, जब शहीद होता है, तभी वह अपने भाग्य को पहचानता है.
हमें छिछोरे होना नहीं आता.
सुप्रसिद्ध सर्जन इवान ग्रेकोव की बीबी मुझ पर और मीशा स्लोनीम्स्की12 पर नाराज़ हो गई, क्योंकि हम उसके यहाँ पार्टी में ट्यूनिक और नमदे के जूतों में गए थे. बाकी सब लोग फ्रॉक-कोट्स में थे.
हमारी असभ्यता का कारण सीधा सा था:
उन लोगों के पास पुराने फ्रॉक-कोट्स थे: फ्रॉक-कोट जल्दी पुराना नहीं होता और वह क्रांति को बर्दाश्त कर लेता है. मगर, हमने तो फ्रॉक-कोट्स कभी पहने ही नही थे. पहले हमने स्कूल वाले और कॉलेज वाले कोट्स पहने, फिर सैनिकों के ग्रेट कोट्स और ट्यूनिक्स, जो इन्ही ओवरकोट्स में से सिले गए थे. हमें किसी और लाइफ़-स्टाइल की आदत ही नहीं थी, सिवा युद्ध की और क्रांति की लाइफ-स्टाइल के. वो हमारा अपमान कर सकती है, मगर हम उससे नहीं निकल सकते.
मॉल-संस्कृति हमारे लिए पराई है, हम काफ़ी कम चीज़ों से गुज़ारा कर लेते हैं, अतिरिक्त सामान या तो किसी को दे देते हैं, या बेच देते हैं. हमारी बीबियाँ बोरों जैसे कपड़े पहनती थीं, और उनके पैर का नाप एक नंबर बड़ा होता था.
यूरोप हमें तोड़ देता है, हम यहाँ जोश में आ जाते हैं और हर चीज़ को संजीदगी से ले लेते हैं. तुम सफ़ेद बालों वाले प्योत्र बगातीरेव13 को तो जानती हो. उसकी आँखें नीली हैं, क़द छोटा है, पतलून ऊँची है; छोटे पैर वालों की पतलूनें ख़ास तौर से छोटी होती हैं. बगातीरेव के जूते बिना लेस के हैं.
सड़कों पर या तो वो धीरे-धीरे पंजों के बल
चलता है, या हिरन की तरह तिरछे-तिरछे भागता है, - वह बोलता नहीं, बल्कि भुनभुनाता है.
इस सनकी व्यक्ति का जन्म वोल्गा तट के पोक्रोव्स्कोए गाँव में एक मैकेनिक के परिवार में हुआ था. वक्तृत्वकला में निपुण होने के कारण उसे स्कूल में एडमिशन मिल गया. उसने स्कूल ख़त्म कर लिया. विश्वविद्यालय में भाषाशास्त्र विभाग में गया और यहाँ उसने चुटकुलों के सिद्धांत पर काम किया.
बगातीरेव लिखता ख़ूब है और फिर
पाण्डुलिपियाँ खो देता है.
भूखे मॉस्को में बगातीरेव को मालूम ही नहीं था कि वह बुरी तरह से जी रहा है. वह बस, जी रहा था, लिख रहा था, चलती-पुर्ज़ी चीज़ें लिखता था, जैसा कि सभी करते थे, मगर कहीं कड़वाहट नहीं थी.
शाम को बगातीरेव थियेटर से निकलकर मॉस्को
के बर्फीले टीलों से होते हुए घर जा रहा है, थक गया है, हैट उतारता है, माथा
पोंछता है.
और अचानक हैट में गिरती है एक केरेन्का* .
इधर-उधर नज़र घुमाई, देखा – कोई फ़ौजी जा रहा है.
भागकर उसे पकड़ा.
“कॉम्रेड, मुझे नहीं चाहिए.”
“अरे, आप शरमाइए नहीं, ले लीजिए.”
बगातीरेव ने नोट नहीं लिया, और उसे अपमान का अनुभव भी नहीं हुआ.
हमारा अपमान कोई नहीं कर सकता, क्योंकि हम काम करते हैं.
कोई हमें मज़ाक का पात्र भी नहीं बना सकता, क्योंकि हम काम करते हैं.
कोई हमें मज़ाक का पात्र नहीं बना सकता, क्योंकि हम अपना मूल्य जानते हैं.
और हमारे प्यार को, कभी भी फ्रॉक-कोट न पहनने वाले लोगों के प्यार को, कोई भी औरत, जिसने हमारे साथ हमारी ज़िन्दगी की मुश्किलों को नहीं झेला है, नहीं समझ सकती.
बगातीरेव संस्थाओं में भाषण देता, क्रांति की कथाएँ इकट्ठा करते हुए उसकी दोस्ती रोमान याकोब्सन14 से हो गई.
जब रोमान प्राग चला गया तो उसने बगातीरेव को अपने पास बुला लिया.
बगातीरेव आया, पतलून छोटी, जूतों में लेस नहीं, सूटकेस में सिर्फ पाण्डुलिपियाँ ही पाण्डुलिपियाँ और फटे हुए कागज़, और हर चीज़ इतनी गड्ड-मड्ड हो गई थी कि पता ही नहीं चला कि उसका शोध-निबन्ध कहाँ है और पतलूनें कहाँ हैं.
बगातीरेव शक्कर के क्यूब्स ख़रीदता, उन्हें जेबों में रख लेता और खाता, मतलब, रूसी लाइफ़-स्टाइल को बनाए रखने की कोशिश करता.
मगर भूरे बालों, नीली आँखों और छोटे-छोटे पैरों वाला रोमान यूरोप से प्यार करता था.
वह वाक़ई में तुम्हारे भाई जैसा है.
रोमान बगातीरेव को रेस्टारेंट ले गया: बिन-खुरची दीवारों, कई तरह के पकवानों, शराब, औरतों के बीच बैठा प्योत्र. रोने लगा.
वह बर्दाश्त न कर पाया. ये लाइफ़-स्टाइल हमें पिघला देती है.
हमें इसकी ज़रूरत नहीं है. मगर, ‘अनुरूपताओं’ के लिए हर चीज़ ज़रूरी होती है.
प्योत्र ने किताब लिखी “चेक पपेट-थियेटर और रूसी फ़ोक-थियेटर”, फिर वह बर्लिन आ गया, और मैंने वह किताब प्रकाशित की, क्योंकि तुम इतनी ज़्यादा व्यस्त हो कि मेरे पास पर्याप्त ख़ाली समय है. और, इसलिए भी, कि मैं काम करना जानता हूँ.
बगातीरेव ने अपने लिए तीन सूट सिलवाए, वह किसी चौथे सूट में घूमता है – ज़ाहिर है, ये राष्ट्रीय, मॉस्को वाला सूट है.
अब वह प्राग के रेस्टारेंट को भी बर्दाश्त कर लेता है.
मगर वह भावुक होकर नहीं रोया था, बल्कि ऐसे रोया था जैसे कमरे में रखा हुआ काँच काफ़ी बड़े अंतराल के बाद गर्म करने पर रोता है.
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* केरेन्का सन्
1917 की क्रांति के बाद की अस्थाई सरकार द्वारा छापे गए नोट को बोलचाल में
केरेन्का कहते थे. इस सरकार के प्रमुख थे अलेक्सान्द्र केरेन्की.
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