पत्र चौबीसवाँ
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दुखभरा, जिससे यह दूसरे पत्रों से अलग प्रतीत नहीं होता. इसमें बताया गया है
जर्मनों के बारे में जो मरना जानते हैं, औरतों के बारे में जिन्हें हम खोते जा रहे
हैं, मार्क शगाल के बारे में, फ़ोर्क पकड़ने की योग्यता के बारे में और साहित्य के
इतिहास में प्रांतीय भावना के बारे में.
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तुम अपने आप को सांस्कृतिक दुनिया से जुड़ा हुआ महसूस करती हो.
कौनसी दुनिया से, आल्या? - वे अनेक हैं.
हर देश की अपनी संस्कृति होती है, और किसी विदेशी को उसे नहीं अपनाना चाहिए.
मेरा दिल पीटर्सबर्ग के लिए तड़पता है, मैं उसके पुलों के बारे में सोचता रहता
हूँ, और तुम रूस वापस नहीं लौट सकतीं, तुम्हें फ़्रान्स अच्छा लगता है, मगर उसके ग़म
में तुम मर नहीं जाओगी.
तुम – काफ़ी यूरोपियन संस्कृति वाली हो.
अगर कार का कोई वज़न ही न होता तो वह चल ही नहीं सकती थी, वज़न उसके पहियों को
सहारा देता है.
मैं ये बात तुम्हें न लिखता, अगर प्यार न करता होता.
मगर तुम मुझे इसी बात से परेशान करती रहो, कि तुम्हारे लिए मेरा कोई वज़न नहीं
है, आल्या के चारों ओर की दुनिया का कोई वज़न नहीं है.
बगातीरेव के पड़ोस में एक जर्मन परिवार ने
ज़हरीली गैस सूंघकर आत्महत्या कर ली. माँ ने चिट्ठी छोड़ी: “जर्मन मज़दूर के लिए
दुनिया में कोई जगह नहीं है.”
जर्मनों, मैं शर्मिन्दा हूँ, कि आपकी कोई मदद
नहीं कर सकता!
आल्या मेरे उदास प्यार के लिए मुझे क्षमा करो;
बताओ तो, कि मरते हुए अंतिम शब्द तुम कौन सी भाषा में कहोगी?”
मैं तुमसे कितने जादुई शब्द कहता हूँ, हरेक से
तुम्हारी तुलना करता हूँ. कहते हैं कि लोग सोच-समझ कर मानसिक बीमारी की ओर जाते
हैं, जैसे मॉनेस्ट्री में जाते हैं. इन्सान के रूप में जीने की बजाय अपने आपको
कुत्ता समझना ज़्यादा अच्छा है.
अपनी प्यारी चीज़ के टुकड़े-टुकड़े करके शहर में
फेंक देने का मन होता है.
नहीं कर सकता.
कुछ दिन पहले हम एक स्टूडियो में इकट्ठा हुए थे.
कमरे में पीटर्सबुर्ग के और मॉस्को के लोग थे.
किसी ने वीज़ा की बात छेड़ी. कहते हैं कि पहले, साल-दो साल पहले, रूसी एक दूसरे
से पासपोर्टों के बारे में इतने शौक से बात करते थे, जैसे एक शादी-शुदा औरत प्रसव
के बारे में बात करती है.
इस बार भी बात चल पड़ी. मर्द – उनमें से ज़्यादातर बगैर पासपोर्ट वाले थे, इसलिए
रहते हैं, क्योंकि उन्हें यहाँ की आदत हो गई है.
मगर औरतें!
फ्रेंच, स्विस, अल्बानियन (ईमानदारी से), इटालियन, चेक – और सभी – पूरी
संजीदगी से और हमेशा के लिए.
अपनी औरतों को खोना मर्दों के लिए अपमानजनक है. कल्पना करता हूँ कि कोन्स्तान्तिनोपोल
में कैसा था!
इसी तरह का हश्र देखना भयानक है. हमारा प्यार, हमारी शादियाँ, पलायन – सिर्फ
एक उद्दीपन है.
हम अपने आपको खोते जा रहे हैं, एक पैबन्द बनते जा रहे हैं.
मगर साहित्य में ज़रूरत है स्थानीय, जीवित, विशिष्ट (ये है शब्द ख़त के लिए!)
की.
हम अपनी योग्यता भी उसी तरह खोते जा रहे हैं, जैसे औरतों को खो रहे हैं.
तुम अपने आपको संस्कृति से जुड़ा हुआ महसूस करती हो, जानती हो, कि तुम्हारी
पसन्द बढ़िया है, मगर मुझे दूसरी तरह की चीज़ें पसन्द हैं. मुझे मार्क शगाल पसन्द
है.
मार्क शगाल को मैंने पीटर्सबुर्ग में देखा था. मुझे लगा कि वह एन.एन. एव्रिनोव
से मिलता है, वह छोटी सी जगह के एक नाई की प्रतिकृति था.
रंगीन जैकेट पर मोतियों के बटन. बड़ा हास्यास्पद आदमी है.
अपने सूट के रंगों और अपने स्थानीय रोमांटिज़्म को वह तस्वीरों में उतारता
है.
अपने चित्रों में वह यूरोपियन नहीं, बल्कि वितेब्स्कियन प्रतीत होता है.
मार्क शगाल ‘सुसंस्कृत समाज’ का नहीं है.
वह छोटे से, कस्बाई शहर वितेब्स्क में पैदा हुआ था.
बाद में, क्रांति के दौरान वितेब्स्क फ़ैल गया, वहाँ एक बड़ा आर्ट-स्कूल था. उस
दौरान कभी एक तो कभी दूसरा शहर फ़ैलता रहता था: कभी किएव, कभी फ़िओदोसिया, कभी
तिफ़्लिस, एक बार तो वोल्गा का एक छोटा सा गाँव मार्क्सश्ताद्त – भी दर्शन-अकादमी
से सुशोभित हो गया.
तो, वितेब्स्क में सारे बच्चे ड्राईंग्स बनाते हैं, शगाल की तरह, और ये उसके
लिए प्रशंसनीय है, वह पैरिस और पीटर्सबर्ग में वितेब्स्कियन रह सकता था.
ये अच्छी बात है कि आपको फ़ोर्क पकड़ना आता है,
हालाँकि यूरोप में तो ये नाईट-क्लब की औरत भी कर सकती है. इससे भी अच्छा है ये पता होना कि
किस डिनर-जैकेट पे कौनसा जूता पहना जाए और रेशम की कमीज़ पर कौन से कफ़-लिंक्स
इस्तेमाल किए जाएँ. मेरे लिये तो इस जानकारी का ज़्यादा महत्त्व नहीं है.
मगर मुझे याद है कि यूरोप में सभी – जन्मसिद्ध अधिकार से, यूरोपियन हैं.
मगर साहित्य में अपनी ख़ुद की महक होनी चाहिए, और फ़्रांसीसी की गंध से सिर्फ
फ़्रांसीसी महकता है.
यहाँ दुनिया को बचाने के विचार का कोई उपयोग नहीं होगा.
प्रांतीयता का सूत्रपात करना, उसका पारंपरिक साहित्य से मेल करना फ़ायदेमन्द है.
“बालालाइका-वादक” “घोड़ों वाले झूले” इत्यादि इसलिए बुरे हैं क्योंकि ये सब रूसी प्रांतीयता
को दर्शाते हैं.
ये लोगों को उलझा देता है. भावी काम में रुकावट डालता है. तस्वीरों में, उपन्यासों
में.
मगर अच्छा लिखना – मुश्किल है, दोस्त मुझसे हमेशा ऐसा ही कहते थे.
असल ज़िन्दगी जीना दुखदायी है.
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