सोमवार, 10 अगस्त 2015

Thirtieth Letter

पत्र तीसवाँ

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अंतिम. यह रशियन सेंटृल एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी को लिखा गया है.
इसमें फिर से बारह लोहे के पुलों के बारे में कहा गया है.
इस पत्र में रूस वापस लौटने की अनुमति देने की प्रार्थना भी शामिल है.
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रशियन सेंट्रल एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी को दरख़्वास्त.

मैं बर्लिन में नहीं रह सकता.

अपने समूचे अस्तित्व, सारी आदतों समेत मैं आज के रूस से जुड़ा हूँ. सिर्फ उसी के लिए काम कर सकता हूँ.

ये सही नहीं है कि मैं बर्लिन में रहता हूँ.

क्रांति ने मुझे पुनर्जन्म दिया है, उसके बगैर मैं साँस ही नहीं ले सकता. यहाँ तो सिर्फ दम घुट सकता है.

बर्लिन की वेदना कार्बाईड की धूल जैसी कड़वी है. चौंकिए नहीं, कि मैं ये पत्र एक औरत को कई पत्र लिखने के बाद लिख रहा हूँ.

प्यार के लफ़ड़े में मैं पड़ना ही नहीं चाहता.

वह औरत, जिसे मैं ख़त लिखता रहा, कभी थी ही नहीं. हो सकता है, कोई दूसरी हो, अच्छी कॉम्रेड और मेरी दोस्त, जिससे मैं दिल की बात कह नहीं सका. आल्या – सिर्फ एक रूपक का निष्पादन है. मैंने एक औरत और उसके प्यार की कल्पना की - सिर्फ मेरी किताब के लिए, जो समझ न पाने के बारे में, पराए लोगों के बारे में, पराए देश के बारे में है. मैं अपना रूस ही चाहता हूँ.

वो सब, जो था – गुज़र चुका है, लोहे के बारह पुलों ने मेरी जवानी और आत्मविश्वास को छीन लिया है.

मैं हाथ उठाकर आत्मसमर्पण करता हूँ.


मुझे और मेरे सीधे सादे सामान को : छह कमीज़ें (तीन मेरे पास, तीन लाँड्री में), पीले जूते, जिन्हें गलती से काले पॉलिश से साफ़ किया था, और पुरानी नीली पतलून, जिस पर मैंने सफ़ाई से पैच लगाने की कोशिश की थी.

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