उद्धरण
ज़ू-पार्क
ओ, ज़ू-पार्क,
ज़ू-पार्क!
जहाँ फ़ौलाद
पिता के समान है, जो भाईयों को याद दिलाते हैं कि वे भाई हैं, और ख़ून-ख़राबे को
रोकते हैं.
जहाँ जर्मन्स
बीयर पीने जाते हैं.
और सुन्दरियाँ
जिस्म बेचने.
जहाँ फ़िलहाल,
शाम से महरूम, आज के दिन से समाप्त, शाश्वतता जैसे उक़ाब बैठे रहते हैं.
जहाँ ऊँट बौद्ध
धर्म का जवाब जानता है और चीनी हाव-भावों को अपने भीतर छुपाता है.
जहाँ हिरन भय है,
जो चौड़े पत्थर से निखरता है.
जहाँ लोग फ़ैशन से
चमकते हैं.
और जर्मन्स
स्वास्थ्य से दमकते हैं.
जहाँ हंस की
काली आँखें, जो बिल्कुल सर्दियों के समान है, और चोंच – शिशिर की क्यारी के समान,
ख़ुद उसके लिए भी कुछ सतर्क-सी है.
जहाँ नीला
ख़ूबसूरत मोर पूँछ का एक हिस्सा गिराता है, जो साइबेरिया के पाव्दीन्स्की पत्थर से
दिखाई दे रहे उस दृश्य के समान है, जब पतझड़ के सुनहरे रंग और जंगल की हरियाली पर
बादलों की नीली जाली फेंकी गई हो, और ज़मीन की असमतलता के कारण ये सब अलग-अलग तरह
से ताना गया हो.
जहाँ बन्दर
भिन्न-भिन्न प्रकार से क्रोधित होते हैं और अपने धड़ का आख़िरी सिरा दिखाते हैं.
जहाँ हाथी,
तिरछे होते हुए, जैसे भूकम्प के समय पहाड़ तिरछे होते हैं, बच्चे से खाने को माँगते
हैं, पुरानी कहावत को सच साबित करते हुए: भूख लगी है! खाना मिल जाता! और नीचे बैठ
जाते हैं, जैसे भीख माँग रहे हों.
जहाँ भालू
फुर्ती से ऊपर चढ़ जाते हैं, और चौकीदार के हुक्म के इंतज़ार में नीचे देखते हैं.
जहाँ चमगादड़
लटकते हैं आधुनिक रूसी के दिल की तरह.
जहाँ बाज़ का
सीना तूफ़ान से पहले के छितरे बादलों की याद दिलाता है.
जहाँ नीचे उड़ता
हुआ पंछी अपने पीछे सभी दहकते कोनों समेत सूर्यास्त को आकर्षित करता है.
जहाँ शेर के चेहरे
में, जो सफ़ेद दाढ़ी और बूढ़े मुसलमान जैसी आँखों से से मंडित है, हम पहले मोहम्मदन
का सम्मान करते हैं और इस्लाम के सार को पढ़ते हैं.
जहाँ हम ये
सोचना शुरू करते हैं कि सभी मज़हब हैं – लहरों की शांत होती बौछारें, जिनका बिखरना है
– जातियाँ.
और, दुनिया में
इसलिए इतने सारे जानवर हैं, कि वे ख़ुदा को अलग-अलग तरह से देख सकते हैं...
जहाँ दोपहर को
दागे गए तोप के गोले की आवाज़ गरजवाली आंधी के इंतज़ार में, बाज़ों को आसमान की ओर
देखने पर मजबूर कर देती है.
जहाँ बाज़ अपने
ऊँचे बसेरों से यूँ गिरते हैं जैसे भूकम्प के समय मंदिरों और इमारतों की छतों से
मूर्तियाँ गिरती हैं...
जहाँ एक किस्म
की बत्तख़ें थोड़ी सी बारिश के बाद एक सुर में चिल्लाती हैं, जैसे अपने, बत्तखों के
ईश्वर को – क्या वह पैरों और चोंच वाला है – धन्यवाद दे रही हों.
जहाँ हलके-सलेटी
रंग के तीतर कज़ान के अनाथों जैसे प्रतीत होते हैं.
जहाँ मलाया के
रीछ में मैं अपने उत्तरी साथी को पहचानने से इनकार करता हूं, और छुपे हुए मंगोल को
ढूँढ़ता हूँ.
जहाँ भेड़िए
तत्परता और वफ़ादारी प्रदर्शित करते हैं.
जहाँ, तोतों के
उमसभरे पिंजरे में घुसते ही मुझ पर एक सुर से “बे-व-कूफ़!” की बौछार होती है.
जहाँ मोटा वालरस,
थकी हुई सुन्दरी के समान, अपने चिकने, काले पंखे जैसे पैर को हिलाता है और फिर
पानी में कूद जाता है, और जब वह अपने प्लेटफॉर्म पर वापस लौटता है तो उसके चर्बी
चढ़े, भारी बदन पर चुभती हुई दाढ़ी और चिकने माथे वाला नीत्शे का सिर नज़र आता है.
जहाँ ऊँचे,
सफ़ेद, काली आँखों और समूरवाले ऊँट तथा चिकने सींगों वाले बैल के जबड़े निरंतर
दाएँ-बाएँ हिलते हैं, उस देश की ज़िन्दगी के समान जहाँ लोकतंत्र हो और उसके प्रति
जवाबदेह सरकार हो – जो न जाने कितनों के
लिए वांछित स्वर्ग है!
जहाँ गैण्डे की
सफ़ेद-लाल आँखों में किसी तख़्ता पलटे गए त्सार का ज्वलंत क्रोध दिखाई देता है और सब
जानवरों में वह एक ही है जो लोगों के प्रति अपने सन्देह को छुपाता नहीं है, मानो
गुलामों के विद्रोह के प्रति संदेह प्रकट कर रहा हो. और, उसमें कहीं छुपा है इवान-दि-टेरिबल.
जहाँ
समुद्री-पंछी अपनी लम्बी चोंच और ठण्डी नीली नज़र से, मानो चश्मा पहने हों, विदेशी
डीलरों जैसे प्रतीत होते हैं, जिसे कला में सराहा जाता है, जिससे वे सील मछलियों
को फेंका गया खाना चुरा लेते हैं.
जहाँ, ये याद
करते हुए कि रूसी लोग अपने क़ाबिल जनरलों को बाज़ कहकर सम्मानित करते थे, और ये याद
करते हुए कि इस पंछी की और कज़ाक की आँख बिल्कुल एक जैसी है, हम ये समझने लगते हैं
कि युद्ध की शिक्षा में रूसियों के शिक्षक कौन थे.
जहाँ हाथी
चिंघाड़ना भूल गए हैं और सिर्फ एक चीख़ निकालते हैं, मानो असुविधा की शिकायत कर रहे हों.
हो सकता है, हमें बिल्कुल ही हीन-दीन देखकर, वे भी दीन-चीख़ निकालने को अच्छी सभ्यता
का लक्षण समझते हों? पता नहीं.
जहाँ जानवरों की
बेहतरीन योग्यताएँ नष्ट हो रही हैं, जैसा ईगोर की फ़ौज की दास्तान की प्रार्थना-पुस्तिका
में लिखा गया है.
वेलिमीर ख्लेब्निकोव
सादोक सुदेय 1
1909
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