पत्र छब्बीसवाँ
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मास्क के बारे
में, बैटरी वाली मोटर के बारे में, ‘हिस्पानो सुइज़ा’ मोटर के बोनेट की लम्बाई के
बारे में, आम तौर से इंटर्नल कम्बस्शन इंजिनों के बारे में और इस बारे में, कि यदि
कार ‘हिस्पानो सुइज़ा’ इन्सान होती तो वह कानों में बालियाँ पहनती.
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एक मोटरिस्ट होने के नाते कहता हूँ : यह ख़त ख़ामोश तैश और निन्दा से भरपूर है.
आज रात में नींद खुल गई. एक अजीब सी चीज़ ने, जो मेरे हाथों में थी, मुझे जगा
दिया था.
ये चीज़ थी – कागज़ का काला मास्क, और मैं ख़ुद था कमरे के बीचोंबीच.
ज़ाहिर है, मेरे लिए बेहतर होता सेनेटोरियम जाना.
प्यार के बारे में बात करना मेरे लिए ख़तरनाक है.
कारों के बारे में बात करेंगे.
टैक्सी में जाना बड़ा उदास लगता है!
सबसे ज़्यादा बुरा लगता है इलेक्ट्रिक मोटर में जाना. उसका दिल धड़कता नहीं है,
वह चार्ज्ड होती है, भारी-भारी बैटरियों से भरी होती है, मगर बैटरी डिस्चार्ज होते
ही – वह खड़ी हो जाती है.
अपने ज़माने में मैंने कई कारें चलाई हैं, कभी तो उन्होंने ही मुझे टक्कर मारी;
कई आदमियों को मैंने भी उठाया.
कभी कभी बर्लिन में कार चलाने को जी चाहता है, ऐसी कार जिस पर ड्राइवर का बस
नहीं चलता, एक दो बार ऐसा किया भी, मगर तीसरी बार बुरी तरह से ग़लती कर बैठा.
कार स्टार्ट करने चला, मगर कार तो इलेक्ट्रिक वाली थी, उसका रेडियेटर कृत्रिम
था, और हैंडल, बेशक, थे ही नहीं. ऐसी कार को कैसे चलाऊँ जिसके पास दिल ही नहीं है,
जो चलाई ही नहीं जा सकती? उसका रूप भी झूठा है, जैसे शर्ट का सामने का हिस्सा और
कफ़-लिंक्स; सामने बोनेट बना है, मानो इंजिन के लिए हो, मगर उसमें भरे हैं चीथड़े.
इंटर्नल कम्बस्शन इंजिन होने का नाटक करते हैं.
बेचारे रूसी शरणार्थी!
उसका दिल धड़कता नहीं है.
बर्लिन में रास्तों पर ज़ोर-ज़ोर से रूसी में बोलना मना है, इसे बदतमीज़ी समझा
जाता है. ख़ुद जर्मन भी तो फ़ुसफ़ुसाकर ही बात करते हैं.
जिओ, मगर ख़ामोश रहो.
कार की मुर्दा बैटरी की तरह, बिना शोर के, बिना उम्मीद के, शहर में भटकते रहो.
सांस रोककर, वो मिटाते रहो, जो तुम्हारे पास था, और मिटाने के बाद, मर
जाओ.
हम रूस में चार्ज्ड हुए थे, और यहाँ सिर्फ बैटरी डाऊन हो रही है, डाऊन हो रही
है और जल्दी ही हम खड़े हो जाएँगे.
बैटरियों की जस्ते की पट्टियाँ सिर्फ फ़ालतू वज़न में परिवर्तित हो जाएँगी.
एसिड खट्टा हो जाएगा.
खट्टे बोझिलपन से गंधाते हैं बर्लिन के रूसी अख़बार.
मैंने खट्टे और भारी-भरकम शब्द लिख दिए हैं.
बेहतर है कि हम कारों के ब्राण्ड्स के बारे में बातें करें.
क्या तुम्हें ‘हिस्पानो सुइज़ा’17 पसन्द है?
बकवास! अपना राज़ मत खोलो.
तुम्हें महंगी
चीज़ें पसन्द हैं और अगर रात को दुकान में चीज़ों के मूल्य वाली स्लिप गड़बड़ कर दी
जाए, तो भी तुम उन्हें ढूँढ़ लोगी. “हिस्पानो सुइज़ा’? बुरी कार है. ईमानदार, भली
कार - भरोसेमन्द स्पीड वाली, जिसमें ड्राइवर तिरछा होकर बैठता है, अपनी शक्तिहीनता
पर अकड़ते हुए – वो है ‘मर्सिडीज़’, ‘बेंज़’, ‘फ़िएट’, ‘देलोन-बेल्विल’, ‘पेक्कार्ड’,
‘’रेनो’, ‘देलाझ’ और बेहद महंगी, मगर संजीदा ‘रोल्स-रॉयस’, असाधारण रूप से आसानी से
चलने वाली.
इन सभी कारों में इनके
ढाँचे की रचना मोटर की संरचना को और ट्रांसमिशन को प्रकट करती है और, साथ ही, वह
हवा के न्यूनतम प्रतिरोध के लिए की गई है. रेसिंग-कार्स की अक्सर नाक लम्बी होती
है, वे सामने से ऊँची होती हैं; इसे इस तरह समझना चाहिए कि खूब तेज़ वेग के चलते,
सिर्फ ऐसा ही आकार वातावरण से न्यूनतम प्रतिरोध करता है. तुमने देखा ही है, आल्या,
कि पंछी आगे की ओर पूँछ की तरफ़ से नहीं, बल्कि चौड़े सीने की ओर से उड़ता है.
बोनेट की लम्बाई,
बेशक, इंजिन के सिलिण्डर्स की संख्या ( 4, 6, या कभी-कभार 8,12) और उनके व्यास पर
निर्भर करती है. पब्लिक को लम्बी नाक वाली कारों की आदत हो गई है. ‘हिस्पानो
सुइज़ा’ – लम्बे स्ट्रोक वाली कार है, मतलब उसके निचले और ऊपरी डेड-पॉइन्ट्स के बीच
काफ़ी दूरी है.
ये तेज़ गति वाली, तैश
में चलने वाली कार है , जैसे – कोकीन सूंघकर आई हो. उसका इंजिन ऊँचा और पतला है.
ये उसका अपना
मामला है.
मगर कार का बोनेट
लम्बा है.
इस तरह, “हिस्पानो
सुइज़ा” अपने बोनेट का मास्क पहने हुए होती है, उसमें रेडियेटर और इंजिन के बीच 28
इंच की भी जगह नहीं है. ये झूठ के 28 इंच हैं, जो अकडू लोगों के लिए छोड़े गए हैं,
संरचना के विनाश के इन 28 इंचों से मैं तैश में आ जाता हूँ.
अगर मैं तुमसे
नफ़रत करने लगूँ, अगर मैं कभी गा सकूँ:
लुप्त हो जाओ ऐ राहों,
जिन पर मैं चलता था! -
तो मैं तुम्हारी
याद को शैतानों के पास नहीं, बल्कि “हिस्पानो सुइज़ा” की उस ख़ाली जगह पर फ़ेंक
दूँगा.
तुम्हारी “हिस्पानो
सुइज़ा” महंगी तो है, मगर बकवास है.
उसमें दरवाज़े के
बदले एक किनारे को झुकने वाली सीट्स लगाई जाती हैं. अल्फोन्सों 18 को
पसन्द आएँगी.
उसकी स्टीयरिंग का
झुकाव अच्छा नहीं है और अगर वह इन्सान होती तो उसके कानों में ज़रूर बालियाँ होतीं.
तुम्हारी “हिस्पानो सुइज़ा” का रेडियेटर भी अपनी जगह पर नहीं है, उसके ‘कफ़-लिंक्स’
हमेशा बन्द होते हैं. वह तुम्हें कभी भी प्यार नहीं करेगी. मेरे लिए ये रूसी
शरणार्थियों के भाग्य से ज़्यादा दिलचस्प है. ख़ैर, “हिस्पानो सुइज़ा” का पहाड़ी
इलाकों में सबसे लम्बी दूरी तय करने का रेकॉर्ड है.
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