पत्र बाईसवाँ
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अप्रत्याशित और,
मेरी राय में, फ़ालतू ही है. इस पत्र का मज़मून, ज़ाहिर है, इसी लेखक की दूसरी किताब
से भाग कर आया है, मगर, हो सकता है, कि इस किताब के संयोजक को विविधता की दृष्टि
से ये ख़त ज़रूरी प्रतीत हुआ हो.
ये ख़त ताहिती वाले
ख़त के साथ कहीं इधर-उधर हो गया था.
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कुछ दिन पहले
मुझे «Scala» थियेटर में जाने का मौका मिला. ये Lutherstrasse पर है. अलग-अलग तरह के आईटम्स थे: एक कलाबाज़ दूसरे कलाबाज़ के कंधे पर रखे
खम्भे पर कलाबाज़ी दिखा रहा था, दो जिम्नास्ट ट्रेपेज़ी के ऊपर इतनी तेज़ी से घूम रहे
थे, कि नीचे से ऐसा लग रहा था, जैसे वे हरे गुलदानों में परिवर्तित हो गए हों, मगर
उनकी परछाईयाँ, जो परदे पर पड़ रही थीं, पूरे समय मानवीय ही रहीं. इतने बड़े
कार्यक्रम को एक वाक्य में समेटना असंभव है. वहाँ पर एक घृणित किस्म का आदमी भी
था, जिसने पहले दाँतों में दो मन के वज़न को उठाकर ग्राऊण्ड पर करतब दिखाए, और फिर
दाँतों से ही तीन-चार, एक दूसरे से बंधी हुई कुर्सियाँ फ़र्श से उठा लीं. मुझ जैसे
इन्सान को, जिसके दाँत ख़राब हैं, ये पसन्द नहीं आया.
सबसे ज़्यादा ख़ुश नज़र आ रहे थे साइकल सवार: वे अपनी साइकिलों को सिर्फ
पिछले पहिए पर सीधा खड़ा करके स्टेज पर गोल-गोल घूम रहे थे, और अंत में वे स्टेज के
पीछे चले गए, गोल घेरा बनाते हुए, बिना जल्दी मचाए, और साथ ही वे भोंपू भी बजा रहे
थे.
टॉम सॉयर को ये बहुत पसन्द आता.
फिर बलालाइका वाले अपना बाजा बजाने लगे.
रूसी कलाकार डान्स कर रहे थे.
आशु-कलाकार ने विभिन्न कार्टून्स बनाए.
उसने सट्टेबाज़ का
चित्र बनाया, और फिर उसके चारों ओर जाली बना दी.
इस पूरे वेराइटी कार्यक्रम में मुझे उसके
प्रोग्राम की असंबद्धता अच्छी लगी.
कला के बारे दो तरह के दृष्टिकोण होते हैं.
पहला यह कि, साहित्यिक रचना को दुनिया में
झांकने वाली खिड़की समझा जाता है.
शब्दों से, बिम्बों से हम वह प्रदर्शित करना
चाहते हैं, जो शब्दों और बिम्बों से परे होता है.
इस तरह के कलाकारों के लिए ‘अनुवादक’ शब्द ठीक
रहता है.
कला की ओर देखने का दूसरा तरीका ये है – कि उसे
स्वतंत्र रूप से विद्यमान वस्तुओं की दुनिया समझा जाए.
शब्द, शब्दों का एक दूसरे से संबंध, विचार,
विचारों की व्यंगात्मकता, उनका एक दूसरे से मेल न खाना ही कला की विषय-वस्तु है.
अगर कला की तुलना खिड़की से की जाए, तो सिर्फ ड्राईंग वाली खिड़की से ही की जा सकती
है.
जटिल साहित्यिक रचनाएँ अक्सर, पहले से विद्यमान
कुछ ज़्यादा सरल और, अंशतः छोटी रचनाओं के परस्पर संयोग और प्रतिक्रियाओं का परिणाम
होती हैं.
उपन्यास टुकड़ों से – लघु उपन्यासों से बनता है.
नाटक बनता है शब्दों से, पैनेपन से, अभिनय से,
अभिनय और शब्दों के संयोग से, स्टेज की रचना से. शेक्सपियर के लिए किसी एक्टर का
पैनापन – अपने आप में उद्देश्य है, न कि किसी ख़ास टाईप को दर्शाने का माध्यम.
आरंभिक उपन्यास में नायक का व्यक्तित्व – उसके
भागों को जोड़ने का विधान था. साहित्यिक कृतियों के परिवर्तन की प्रक्रिया में
दिलचस्पी इन जोड़ने वाले भागों पर चली गई.
संबद्ध भागों की सफ़लता की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक
प्रेरणा, परिस्थितियों के परिवर्तन की सत्यता की ओर दिलचस्पी ज़्यादा दिखाई देने
लगी. मनोवैज्ञानिक उपन्यास और नाटकों का जन्म हुआ और पुराने नाटकों एवम् उपन्यासों
के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का प्रादुर्भाव हुआ.
इसका स्पष्टीकरण, शायद, यूँ दिया जा सकता है कि
“ये भाग” इस समय तक आते-आते घिस गए हैं.
साहित्य में अगली सीढ़ी है – मनोवैज्ञानिक
प्रेरणा के घिस जाने की.
तब उसे “दूर रखना” पड़ता है.
इस संदर्भ में स्तेण्डाल का उपन्यास “लाल और
काला” काफ़ी दिलचस्प है, जिसमें हीरो, जैसे अपने आप पर ज़बर्दस्ती करते हुए, अपने आप
से विरोध करते हुए काम करता है; उसके कार्य करने की मनोवैज्ञानिक प्रेरणा काम के
विपरीत है.
हीरो रोमॅंटिक-एडवेंचरिस्ट प्लान के अनुसार काम
करता है, मगर सोचता अपने ढंग से है.
लेव टॉल्स्टॉय के नायक कार्य के अनुसार
मनोविज्ञान का चयन करते हैं.
दोस्तोयेव्स्की अपने पात्रों के मनोविज्ञान को
उनके नैतिक और सामाजिक महत्व के विरोध में रखते हैं.
उपन्यास किसी चोर-पुलिस स्टाईल में आगे बढ़ता
है, और मनोदशा का वर्णन दार्शनिक स्तर पर किया जाता है.
आख़िर में सारे विरोधी तत्वों का इस्तेमाल हो
जाता है.
तब फिर एक ही बात शेष बचती है – “अलग-अलग
भागों” पर आया जाए, सारे जोड़ तोड़ लिए जाएँ, जो सिर्फ पैबन्द जैसे हो चुके हैं.
आधुनिक साहित्य में सबसे जीवंत है – लेख-संग्रह
और वेरायटी थियेटर, जिसका अलग अलग हिस्सों के प्रति आकर्षण से उद्गम होता है, न कि
उनके एक दूसरे से संबंधित होने से. इसी तरह का कुछ वेराइटी के ‘साइड-शोज़’ में देखा
जाता है.
मगर इस टाईप के थियेटरों में एक नई एक्शन देखी
जाती है, हिस्सों को संबंधित करने की एक्शन.
«Scala» जैसे ही एक चेकोस्लोवाकियन वेराइटी थियेटर में मुझे एक और प्रकार देखने को
मिला, जो सर्कस में बहुत पहले से प्रचलित है. प्रोग्राम के अंत में एक मनमौजी सभी
कार्यक्रमों की नकल करते हुए उनकी पोल खोलता है. उदाहरण के लिए, वह अपनी ट्रिक्स
पब्लिक की तरफ़ पीठ करके दिखाता है, जो देखती है कि ग़ायब हुआ कार्ड कहाँ जाकर गिरता
है.
इस लिहाज़ से जर्मन थियेटर्स विकास के काफ़ी निचले
स्तर पर हैं.
इस लिहाज़ से काफ़ी दिलचस्प चीज़ है वह पुस्तक, जो
मैं आजकल लिख रहा हूँ. उसका शीर्षक है “ज़ू”, “अ-प्रेमपत्र” या “तीसरी एलोइज़ा”; उसमें
अलग-अलग एक्शन्स उस सूत्र से जोड़े गए हैं, कि सब कुछ एक इन्सान के एक औरत से प्यार
के किस्से से जुड़ा है. ये किताब – सामान्य उपन्यास की चौख़ट से बाहर निकलने का प्रयास
है.
किताब मैं अपने लिए लिख रहा हूँ, और उसे लिखने में
मुझे बड़ा शारीरिक कष्ट हो रहा है.
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