बुधवार, 15 जुलाई 2015

Eighteenth Letter

पत्र अठारहवाँ
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जापानी, तारात्सुकी, के बारे में, और माशा के प्रति उसके प्यार के बारे में. सभी रंगों के लोगों के बीच दुखद साम्यता के बारे में. फ़ुजियामा के बारे में. पत्र के अंत में – उलाहना.
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 मैं बहुत भावुक हूँ, आल्या. वो इसलिये कि मैं पूरी संजीदगी से जीता हूँ. हो सकता है कि पूरी दुनिया ही भावुक है. वो दुनिया, जिसका पता मैं जानता हूँ. वह फॉक्सट्रॉट नहीं करती.

सन् 1913 में मॉस्को में मेरा एक जापानी विद्यार्थी था. उसका उपनाम था तारात्सुकी.
वह जापानी दूतावास में सेक्रेटरी था.

और, उस घर में, जहाँ वह रहता था, सोल्त्सा शहर की रहने वाली माशा नामक नौकरानी थी. माशा को सब प्यार करते थे – सारे चौकीदार, बिल्डिंग में रहने वाले, पोस्टमैन, सिपाही.

मगर उसे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं थी. सोल्त्सा में उसकी छह साल की बेटी थी, जो मम्मा को बेवकूफ़ कहती थी.

तारात्सूकी के कमरे में गर्माहट थी. मैं अक्सर उसके पास बैठकर उसे टॉल्स्टॉय पढ़कर सुनाया करता.
हमेशा काफ़ी जल्दी पढ़ता था.

दीवार पर टंगे आईने में तारात्सूकी का और मेरा चेहरा प्रतिबिम्बित होते.

मेरे चेहरे के भाव हमेशा बदलते रहते, उसका चेहरा भावहीन रहता, जैसे वह चमड़े से नहीं, बल्कि किसी खोल से ढंका हो.

मुझे ऐसा लगता कि हम दोनों में से – इन्सान, शायद, सिर्फ एक है.

उसकी दुनिया मेरे लिए बिना पते की थी.

तारात्सूकी को माशा से प्यार हो गया था. जब वह इस बारे में बताती, तो चीत्कार करते हुए हँसती.
जब वह सफ़ेद कुत्ते के साथ घूमती, तो वह उसके साथ हो लेता. तारात्सूकी सन् 1914, 1915, 1916, 1917, 1918 में उससे प्यार करता रहा.

पांच साल.

एक बार वह माशा के पास आया और बोला:
 “सुन, माशा. मेरी एक दादी है, वह बड़े पर्वत फुजियामा पर, बाग में रहती है. वह काफ़ी जानी-मानी है और मुझे बहुत चाहती है, और उस बाग में उसका प्यारा सफ़ेद बन्दर भागता रहता है.
(तारात्सूकी की शैली से हैरान मत होना – उसे रूसी तो मैंने ही सिखाई थी.)
 - कुछ दिन पहले सफ़ेद बन्दर दादी को छोड़कर भाग गया.
दादी ने इस बारे में मुझे लिखा था.
मैंने जवाब दिया कि मैं माशा नाम की लड़की से प्यार करता हूँ और शादी की इजाज़त चाहता हूँ.
मैं चाहता था, कि परिवार तुम्हें स्वीकार कर ले.
दादी ने जवाब दिया कि बन्दर लौट आया है, कि, वह बेहद ख़ुश है और शादी के लिए अपनी सहमति देती है.

मगर माशा को बड़ा मज़ेदार लग रहा था कि तारात्सुकी की एक पीली दादी है, जो फुजियामा में रहती है.                     

वह हँसने लगी और उसने कोई ख़्वाहिश ज़ाहिर नहीं की.

फिर क्रांति हो गई.

तारात्सूकी ने माशा को ढूँढा, जिसके पास कोई काम नहीं था, और फिर से कहने लगा:
 “माशा, यहाँ कोई कुछ समझ नहीं पा रहा है. ये ऐसे ही नहीं ख़त्म हो जाएगा, यहाँ काफ़ी खून बहेगा.
चलो, मेरे साथ जापान चलो.”

क्रांति जारी रही.

तारात्सूकी ने माशा को दूतावास में बुलाया. दूतावास में सामान रखा. माशा गई.

वहाँ राजदूत उनसे मिला और उसने जल्दी-जल्दी कहा:
 “मैडम, आप समझ नहीं रहीं, कि क्या करने जा रही हैं, - आपका मंगेतर बेहद अमीर और जाना-माना है, उसकी दादी भी तैयार है.
सोचिए, सौभाग्य को हाथ से न जाने दीजिए.”

माशा ने कोई जवाब नहीं दिया.

और जब वे बाहर आए तो उसने अपने जापानी से कहा: “मैं कहीं नहीं जाऊँगी” – और उसके सफ़ाचट सिर को चूमा.

तारात्सूकी और एक बार उसके पास गया. वह बड़ा दुखी था. उसने कहा:
 “प्यारी माशा. अगर तुम नहीं आ रही हो, तो अपना छोटा सा सफ़ेद कुत्ता मुझे दे दो, जिसके साथ तुम घूमती हो.”

चूँकि हर जगह भुखमरी थी और कुत्ते को खिलाने के लिए माशा के पास कुछ भी नहीं था, इसलिए उसने कुत्ता दे दिया.

तारात्सूकी का आख़िरी ख़त व्लादीवोस्तोक से था. ख़त में लिखा था:
 “मैं तुम्हारे कुत्ते को यहाँ लाया हूँ और जल्दी ही उसके साथ आगे निकल जाऊँगा, तुम्हें काफ़ी मुश्किल दिनों का सामना करना पड़ेगा, मुझे जवाब का इंतज़ार रहेगा, लिखना, मैं तुम्हें लेने आ जाऊँगा.”

मगर ख़त मुश्किल से पहुँचा ही था कि रेल की पटरियाँ सैंकड़ों जगहों पर टूट गईं.

माशा वैसे भी जवाब नहीं देती. वह रुक गई.

उससे पहले ही की तरह सब प्यार करते थे. वह क्रांति से नहीं डरती थी, क्योंकि उसके पास जानी-मानी, पीली दादी नहीं थी.

आजकल वह ‘मिलिट्री-सेनिटरी स्टोर’ में काम करती है – ऐसा लगता है.

जब वह जापानी को याद करती है, तो उसे अफ़सोस होता है.

उसे सब प्यार करते हैं. वह एक असली औरत है, वह घास के समान है, मानो उसका कोई नाम नहीं है, अपने आप से उसे जैसे प्यार ही नहीं है, वह जैसे अपने आप को देखे बिना जिए जाती है.

मुझे भी जापानी पर दया आती है.

और मैं सोचता हूँ कि मैं बेकार में ही आईने में देखता रहा और ग़लत सोचता रहा कि मैं और जापानी – अलग-अलग हैं.

वह मुझसे काफ़ी मिलता जुलता है, वो जापानी.

मुझे नहीं लगता कि इससे उसके देश की सैनिक ताक़त बढ़ेगी.

 मगर तुम – माशा नहीं हो.


तुम्हारे आसमान में तारों के स्थान पर है – तुम्हारा पता. ख़ैर, ये सब उतना अच्छा नहीं है, जितना कि दयनीय है.

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