मंगलवार, 21 जुलाई 2015

Nineteenth Letter

पत्र उन्नीसवाँ
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
जिसे न पढ़ें. इसे अलीना ने तब लिखा था, जब वह बीमार थी, पत्र के लिए लाईनों वाला कागज़ मिला, मगर पत्र इस किताब में सबसे अच्छा है, मगर उसे न पढ़ें, क्योंकि उसे काट दिया गया है.
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

स्टूडेंट्स वाले इस कागज़ पर क्या लिखूँ?

सिर्फ गलतियाँ मत गिनना और नंबर मत देना. एस्पिरीन की तीन गोलियाँ निगलीं, खूब सारी गरम-गरम चीज़ें पीं, ओवरकोट पहने नंगे पाँव फ्लैट में घूमी, टेलिफोन पर किसी से बातें कीं, आलू के साथ मछली खाई, काफ़ी देर तक कुछ भी नहीं किया, और अब तुम्हें लिख रही हूँ.

उस औरत के पास, जब उसने तुम्हें फ़ोन किया, तो तुम तीर की तरह भागे थे. ये छैलापन था या ओछापन, या दोनों एक साथ!

अगर तुम औरत होते तो मेरा तथाकथित छोटा सा ब्यूटी-पार्लर तुम्हारे ऑफ़िस के पास ही होता. 

मगर तुम्हारे प्यार के जडत्व से मुझे कुछ डर सा लगता है. बिल्कुल डरावना. तुम अपनी ही आवाज़ पे चीख़ते हो, तैश में आ जाते हो और बेकार में ही चिल्लाते हो. इस जडत्व के चलते तुम पूरी तरह अनुपयुक्तता से प्यार का इज़हार कैसे करोगे? सिर्फ ग़ुस्सा न करना.

अपने लिए नया सूट सिलवाओ, छह कमीज़ें होनी चाहिए – तीन लाँड्री में, तीन तुम्हारे पास, टाई मैं गिफ़्ट कर दूंगी, जूते साफ़ कर लो.

और मुझसे, किताबों के बारे में बात करो, मैं पिछले पंजों पर एकदम सीधी खड़ी रहूँगी और सुनूँगी.

अब मैं सोऊँगी. कहीं मैं बीमार न हो जाऊँ और कल डान्स ही न कर पाऊँ?

इतना अच्छा अंग्रेज़ और डान्सर है (दो समान गुण). क्या मैं बीमार हो जाऊँगी?

इत्ती ठण्ड है. मुझे बूट्स चाहिए या फिर कार.

क्या शैतान के पास रूह गिरवी रख दूँ? हो सकता है, शायद गिरवी रहने में कोई बुराई नहीं है.

कल पूरे दिन अपनी आया स्तेशा के बारे में सोचती रही. 

सोच रही हूँ और ट्राम में बैठकर वापस जा रही हूँ, - फिर मैं रोने लगती हूँ.   
मैं मम्मी की अपेक्षा स्तेशा से ज़्यादा मिलती-जुलती हूँ. स्तेशा गोरी और गुलाबी है, भरी-भरी, खिलखिलाती हुई, उसमें ज़रा भी कटुता नहीं है, मर्दों को प्यार करती है. इसीलिए कई बार दूध पिलाने वाली आया बनी थी.

हर बार, जब बच्चा-घर जाने का समय आता, पापा के पास आती – पैसे नहीं हैं.
पापा उसे डाँटते हैं, कि उसने उस निकम्मे से क्यों नहीं लिए.
 “ख़ुदा उसे ख़ुश रखे, मालिक!”

मुझे वह अपनी बच्ची की तरह प्यार करती है. मैं दो महीने की थी, जब उसने मुझे सब्ज़ियों का सूप पिलाया और ख़ुद चेरीज़ के जॅम में पड़ी गुठली खाकर बीमार हो गई थी, जॅम समर-कॉटेज में बनाया था.

जब मैं कुछ बड़ी हो गई, तो वह कभी-कभी मुझसे मिलने आती, मिठाईयाँ लाती, खड़ी रहती और “आप” कहकर संबोधित करती; जब लोग चले जाते तो मेरे साथ बैठकर चाय पीती और “तू” कहती. जब मैं एकदम बड़ी हो गई, तो मैं उसकी ख़ुशमिजाज़ी को समझने लगी. “मेरी मालकिन के यहाँ उसकी सहेली रहती है, मैं समझ नहीं पाती – बिल्कुल ‘नन’ जैसी!” और, ख़ुद खिलखिलाती और इतनी ज़िन्दादिल रहती, उससे स्तेशा की ख़ुशबू आती, जैसी ढक्कन खोलने पर उसके लकड़ी के सन्दूक से आती: कपड़ों की और सेबों की. नाक ऊपर की ओर, आँखों में चालाकी.

रसोईन का ख़याल था कि मेरे पास काफ़ी सारे जवान लोग आते हैं, और वह सोचती, कि बन्द दरवाज़े के पीछे बेहूदगियाँ होती हैं. “तू भी क्या,” वह कहती, “स्तेशा, कहते हैं कि तूने अवैध बच्चे को जन्म दिया, क्या वो लोग तुझे इस हद तक पहुँचाते हैं!”

एक बार वह किसी बहुत अमीर घर में काम कर रही थी. घर में चोरी हो गई.

हमेशा की तरह, स्तेशा आँखों में आँसू लिए पापा के पास आई, कि उसे थाने ले जाएँगे.
पापा ने उससे पूछा:
 “और जब चोरी हुई, तो तू कहाँ थी?”
 “नोवो-देविच्यी मॉनेस्ट्री में, नन से मिलने गई थी.”
 “तू ये बात बता दे, तुझे छोड़ देंगे.”
 “क्या कहते हैं, मालिक, नन को ऐसे काम में घसीटूँ!”

उसने कुछ भी नहीं बताया, कुछ समय जेल में बैठी, फिर असली चोर मिल गए और उसे छोड़ दिया गया.

मगर, जब क्रांति के बाद मम्मा ने उसे वोट देने के इस लिए मनाया, तो वह बोली कि चांदी के चम्मचों वाले उस कांड के बाद वह किसी भी हालत में थाने नहीं जाएगी.        

मेरी शादी में उसे सिल्क की ड्रेस देने का वादा बहुत पहले किया गया था.

मगर उसे वह मिली ही नहीं...

नींद भी उड़ गई, मैं उसे इतना प्यार करती हूँ, स्तेशा को.

तुम्हें चूमती हूँ, प्यारे, बस, बीमार न पड़ जाऊँ.

आल्या



मैं ये स्तेशा का किस्सा तुम्हें क्यों सुनाने लगी?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें