शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

Twenty Fourth Letter

पत्र चौबीसवाँ
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दुखभरा, जिससे यह दूसरे पत्रों से अलग प्रतीत नहीं होता. इसमें बताया गया है जर्मनों के बारे में जो मरना जानते हैं, औरतों के बारे में जिन्हें हम खोते जा रहे हैं, मार्क शगाल के बारे में, फ़ोर्क पकड़ने की योग्यता के बारे में और साहित्य के इतिहास में प्रांतीय भावना के बारे में. 
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तुम अपने आप को सांस्कृतिक दुनिया से जुड़ा हुआ महसूस करती हो.

कौनसी दुनिया से, आल्या? - वे अनेक हैं.

हर देश की अपनी संस्कृति होती है, और किसी विदेशी को उसे नहीं अपनाना चाहिए.

मेरा दिल पीटर्सबर्ग के लिए तड़पता है, मैं उसके पुलों के बारे में सोचता रहता हूँ, और तुम रूस वापस नहीं लौट सकतीं, तुम्हें फ़्रान्स अच्छा लगता है, मगर उसके ग़म में तुम मर नहीं जाओगी.

तुम – काफ़ी यूरोपियन संस्कृति वाली हो.

अगर कार का कोई वज़न ही न होता तो वह चल ही नहीं सकती थी, वज़न उसके पहियों को सहारा देता है.

मैं ये बात तुम्हें न लिखता, अगर प्यार न करता होता.

मगर तुम मुझे इसी बात से परेशान करती रहो, कि तुम्हारे लिए मेरा कोई वज़न नहीं है, आल्या के चारों ओर की दुनिया का कोई वज़न नहीं है.

बगातीरेव के पड़ोस में एक जर्मन परिवार ने ज़हरीली गैस सूंघकर आत्महत्या कर ली. माँ ने चिट्ठी छोड़ी: “जर्मन मज़दूर के लिए दुनिया में कोई जगह नहीं है.”

जर्मनों, मैं शर्मिन्दा हूँ, कि आपकी कोई मदद नहीं कर सकता!

आल्या मेरे उदास प्यार के लिए मुझे क्षमा करो; बताओ तो, कि मरते हुए अंतिम शब्द तुम कौन सी भाषा में कहोगी?”

मैं तुमसे कितने जादुई शब्द कहता हूँ, हरेक से तुम्हारी तुलना करता हूँ. कहते हैं कि लोग सोच-समझ कर मानसिक बीमारी की ओर जाते हैं, जैसे मॉनेस्ट्री में जाते हैं. इन्सान के रूप में जीने की बजाय अपने आपको कुत्ता समझना ज़्यादा अच्छा है.

अपनी प्यारी चीज़ के टुकड़े-टुकड़े करके शहर में फेंक देने का मन होता है.          
नहीं कर सकता.

कुछ दिन पहले हम एक स्टूडियो में इकट्ठा हुए थे.

कमरे में पीटर्सबुर्ग के और मॉस्को के लोग थे.

किसी ने वीज़ा की बात छेड़ी. कहते हैं कि पहले, साल-दो साल पहले, रूसी एक दूसरे से पासपोर्टों के बारे में इतने शौक से बात करते थे, जैसे एक शादी-शुदा औरत प्रसव के बारे में बात करती है.

इस बार भी बात चल पड़ी. मर्द – उनमें से ज़्यादातर बगैर पासपोर्ट वाले थे, इसलिए रहते हैं, क्योंकि उन्हें यहाँ की आदत हो गई है.

मगर औरतें!

फ्रेंच, स्विस, अल्बानियन (ईमानदारी से), इटालियन, चेक – और सभी – पूरी संजीदगी से और हमेशा के लिए.

अपनी औरतों को खोना मर्दों के लिए अपमानजनक है. कल्पना करता हूँ कि कोन्स्तान्तिनोपोल में कैसा था!

इसी तरह का हश्र देखना भयानक है. हमारा प्यार, हमारी शादियाँ, पलायन – सिर्फ एक उद्दीपन है.
हम अपने आपको खोते जा रहे हैं, एक पैबन्द बनते जा रहे हैं.

मगर साहित्य में ज़रूरत है स्थानीय, जीवित, विशिष्ट (ये है शब्द ख़त के लिए!) की.

हम अपनी योग्यता भी उसी तरह खोते जा रहे हैं, जैसे औरतों को खो रहे हैं.

तुम अपने आपको संस्कृति से जुड़ा हुआ महसूस करती हो, जानती हो, कि तुम्हारी पसन्द बढ़िया है, मगर मुझे दूसरी तरह की चीज़ें पसन्द हैं. मुझे मार्क शगाल पसन्द है.

मार्क शगाल को मैंने पीटर्सबुर्ग में देखा था. मुझे लगा कि वह एन.एन. एव्रिनोव से मिलता है, वह छोटी सी जगह के एक नाई की प्रतिकृति था.

रंगीन जैकेट पर मोतियों के बटन. बड़ा हास्यास्पद आदमी है.

अपने सूट के रंगों और अपने स्थानीय रोमांटिज़्म को वह तस्वीरों में उतारता है.     
अपने चित्रों में वह यूरोपियन नहीं, बल्कि वितेब्स्कियन प्रतीत होता है.
मार्क शगाल ‘सुसंस्कृत समाज’ का नहीं है.
वह छोटे से, कस्बाई शहर वितेब्स्क में पैदा हुआ था.
बाद में, क्रांति के दौरान वितेब्स्क फ़ैल गया, वहाँ एक बड़ा आर्ट-स्कूल था. उस दौरान कभी एक तो कभी दूसरा शहर फ़ैलता रहता था: कभी किएव, कभी फ़िओदोसिया, कभी तिफ़्लिस, एक बार तो वोल्गा का एक छोटा सा गाँव मार्क्सश्ताद्त – भी दर्शन-अकादमी से सुशोभित हो गया.

तो, वितेब्स्क में सारे बच्चे ड्राईंग्स बनाते हैं, शगाल की तरह, और ये उसके लिए प्रशंसनीय है, वह पैरिस और पीटर्सबर्ग में वितेब्स्कियन रह सकता था.

ये अच्छी बात है कि आपको फ़ोर्क पकड़ना आता है, हालाँकि यूरोप में तो ये नाईट-क्लब की औरत भी कर सकती है. इससे भी अच्छा है ये पता होना कि किस डिनर-जैकेट पे कौनसा जूता पहना जाए और रेशम की कमीज़ पर कौन से कफ़-लिंक्स इस्तेमाल किए जाएँ. मेरे लिये तो इस जानकारी का ज़्यादा महत्त्व नहीं है.

मगर मुझे याद है कि यूरोप में सभी – जन्मसिद्ध अधिकार से, यूरोपियन हैं.

मगर साहित्य में अपनी ख़ुद की महक होनी चाहिए, और फ़्रांसीसी की गंध से सिर्फ फ़्रांसीसी महकता है.

यहाँ दुनिया को बचाने के विचार का कोई उपयोग नहीं होगा.

प्रांतीयता का सूत्रपात करना, उसका पारंपरिक साहित्य से मेल करना फ़ायदेमन्द है. “बालालाइका-वादक” “घोड़ों वाले झूले” इत्यादि इसलिए बुरे हैं क्योंकि ये सब रूसी प्रांतीयता को दर्शाते हैं.  

ये लोगों को उलझा देता है. भावी काम में रुकावट डालता है. तस्वीरों में, उपन्यासों में.

मगर अच्छा लिखना – मुश्किल है, दोस्त मुझसे हमेशा ऐसा ही कहते थे.

असल ज़िन्दगी जीना दुखदायी है.

इसमें तुम मेरी मदद करती   हो.

गुरुवार, 30 जुलाई 2015

Twenty Third Letter

पत्र तेईसवाँ
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ताहिती वाले ख़त का जवाब. ख़त शुरू होता है यादों से. जनवरी की याद आती है, पत्र फ़रवरी के मध्य में लिखा गया है. मगर यादें विश्वसनीय नहीं प्रतीत होतीं. भाप, बिजली और जिम्मी की शताब्दी ने ज़िन्दगी की रफ़्तार को तेज़ कर दिया है. पत्र ‘समर्पण’ लिखने की कोशिश से समाप्त होता है, अंतिम परिच्छेद आवेशपूर्ण शैली के अनुभव के रूप में दिये गए हैं. उन्हें उसी तरह देखें.
(ये उसी दिन का दूसरा पत्र है).
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तुमने अपने बारे में मेरे लिये लिखा है.

तुम मेरे लिए मुस्कुरा सकती हो, मेरे लिए लंच कर सकती हो या मेरे लिए कहीं भी, किसी के भी साथ आ सकती हो. मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकता.

तुम्हें शायद वे शब्द याद नहीं हैं, जो तुमने नोट-बुक के पन्ने पर लिखे थे.

अगर वे एक मिनट के लिए भी सच होते, अगर तुम उन्हें भूल गई हो, तो मैं भी तुम्हारे लिए अपने बारे में लिखता, या कम से कम तुम्हारे बारे में तुम्हारे लिए लिखता.

मगर नोट-बुक खो चुकी है, और पत्रों को ढूँढ़ा नहीं जा सकता.

माफ़ करना, आल्या “प्यार” शब्द फिर से मेरे ख़त में अनावृत्त रूप से फ़िसल कर आ गया है. प्यार के बारे में न लिखते-लिखते मैं थक गया हूँ. मेरे ख़तों में पराये लोग ही होते हैं, या तो तुमसे मुलाक़ात करते हुए, तीन-तीन, चार-चार, और कभी तो उनका पूरा झुण्ड ही होता है.

मेरे शब्दों को आज़ाद कर दो, आल्या, जिससे वे तुम्हारे पास आ सकें.

मुझे प्यार के बारे में लिखने की इजाज़त दे दो.

मगर, रोने की ज़रूरत नहीं है, मुझे ख़ुद भी हल्का-हल्का और प्रसन्न महसूस हो रहा है, गर्मियों वाली छतरी की तरह.

तुम्हारा ख़त ज़्यादा अच्छा है. तुम्हारे लहज़े में आत्मविश्वास है – तुम आवाज़ ऊँची नहीं करती हो.
मुझे कुछ ईर्ष्या भी होती है.

तुम ताहिती गई थीं, और इसके अलावा, तुम्हारे लिए इसके बारे में लिखना आसान है.

तुम्हें मालूम नहीं है – और ये अच्छा भी है, - कि कई शब्दों पर पाबन्दी है.
फूलों से संबंधित शब्दों पर पाबन्दी है. बसंत पर पाबन्दी है. आम तौर से सारे अच्छे शब्द बेहोशी की  हालत में होते हैं.

बुद्धिमत्ता और व्यंग्य से मैं उकता गया हूँ.

तुम्हारे ख़त ने मेरे भीतर ईर्ष्या को जगा दिया.

कितना दिल चाहता है कि चीज़ों का वर्णन इस तरह सरलता से करूँ, जैसे साहित्य कभी था ही नहीं और इसलिए साहित्यिक तरह से लिखा जा सकता है.

लम्बे वाक्यों का इस्तेमाल करके कुछ इस तरह से लिखा जा सकता था: “आश्चर्यजनक है द्नेप्र शांत ख़ामोश मौसम में’.      

मैं भी “अनमुरझाए”, - नहीं, बेहतर है “अनकुम्हलाए” पुष्प-हार के बारे में लिखना चाहता हूँ.

पुष्प- हारों के बारे में लिखूँगा, और प्रेरणा तुम्हारे पत्र से लूँगा.

आल्या, मैं शब्दों को रोक नहीं सकता!

मैं तुमसे प्यार करता हूँ. पूरे जोशोख़रोश से, ऑर्गन बजाते हुए.

ये – शब्द हैं.

तुमने मेरे प्यार को टेलिफ़ोन के चोगे में भगा दिया है. ये मैं कह रहा हूँ.

मगर शब्द कहते हैं: “वो – तेरे लिए और तेरी ज़िन्दगी के लिए इकलौता द्वीप है. वहाँ से तू वापस नहीं आ सकता. बस, उसके चारों ओर का समुद्र रंगीन है.”

और हम सब एक साथ कहते हैं.


वह औरत, जो मुझे अपने पास नहीं आने देती! तेरी देहलीज़ पे, काले तापू की तरह, मेरी किताब को पड़ा रहने दे! मगर वह सफ़ेद है. नहीं, बल्कि इसका उल्टा है. ताना देने की ज़रूरत नहीं है. प्यारी! मेरी किताब तेरे नाम को घेर ले, उसके चारों ओर सफ़ेद, चौड़े, अनमुरझाए, अनकुम्हलाए, अनशिथिल पुष्प-हार की तरह पड़ी रहे.

शनिवार, 25 जुलाई 2015

Twenty second Letter

पत्र बाईसवाँ

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अप्रत्याशित और, मेरी राय में, फ़ालतू ही है. इस पत्र का मज़मून, ज़ाहिर है, इसी लेखक की दूसरी किताब से भाग कर आया है, मगर, हो सकता है, कि इस किताब के संयोजक को विविधता की दृष्टि से ये ख़त ज़रूरी प्रतीत हुआ हो.
ये ख़त ताहिती वाले ख़त के साथ कहीं इधर-उधर हो गया था.
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कुछ दिन पहले मुझे «Scala» थियेटर में जाने का मौका मिला. ये Lutherstrasse पर है. अलग-अलग तरह के आईटम्स थे: एक कलाबाज़ दूसरे कलाबाज़ के कंधे पर रखे खम्भे पर कलाबाज़ी दिखा रहा था, दो जिम्नास्ट ट्रेपेज़ी के ऊपर इतनी तेज़ी से घूम रहे थे, कि नीचे से ऐसा लग रहा था, जैसे वे हरे गुलदानों में परिवर्तित हो गए हों, मगर उनकी परछाईयाँ, जो परदे पर पड़ रही थीं, पूरे समय मानवीय ही रहीं. इतने बड़े कार्यक्रम को एक वाक्य में समेटना असंभव है. वहाँ पर एक घृणित किस्म का आदमी भी था, जिसने पहले दाँतों में दो मन के वज़न को उठाकर ग्राऊण्ड पर करतब दिखाए, और फिर दाँतों से ही तीन-चार, एक दूसरे से बंधी हुई कुर्सियाँ फ़र्श से उठा लीं. मुझ जैसे इन्सान को, जिसके दाँत ख़राब हैं, ये पसन्द नहीं आया.

सबसे ज़्यादा ख़ुश नज़र आ रहे थे साइकल सवार: वे अपनी साइकिलों को सिर्फ पिछले पहिए पर सीधा खड़ा करके स्टेज पर गोल-गोल घूम रहे थे, और अंत में वे स्टेज के पीछे चले गए, गोल घेरा बनाते हुए, बिना जल्दी मचाए, और साथ ही वे भोंपू भी बजा रहे थे.

टॉम सॉयर को ये बहुत पसन्द आता.

फिर बलालाइका वाले अपना बाजा बजाने लगे.

रूसी कलाकार डान्स कर रहे थे.

आशु-कलाकार ने विभिन्न कार्टून्स बनाए.

उसने सट्टेबाज़ का चित्र बनाया, और फिर उसके चारों ओर जाली बना दी.

इस पूरे वेराइटी कार्यक्रम में मुझे उसके प्रोग्राम की असंबद्धता अच्छी लगी.

कला के बारे दो तरह के दृष्टिकोण होते हैं.
पहला यह कि, साहित्यिक रचना को दुनिया में झांकने वाली खिड़की समझा जाता है.
शब्दों से, बिम्बों से हम वह प्रदर्शित करना चाहते हैं, जो शब्दों और बिम्बों से परे होता है.
इस तरह के कलाकारों के लिए ‘अनुवादक’ शब्द ठीक रहता है.
कला की ओर देखने का दूसरा तरीका ये है – कि उसे स्वतंत्र रूप से विद्यमान वस्तुओं की दुनिया समझा जाए.

शब्द, शब्दों का एक दूसरे से संबंध, विचार, विचारों की व्यंगात्मकता, उनका एक दूसरे से मेल न खाना ही कला की विषय-वस्तु है. अगर कला की तुलना खिड़की से की जाए, तो सिर्फ ड्राईंग वाली खिड़की से ही की जा सकती है.

जटिल साहित्यिक रचनाएँ अक्सर, पहले से विद्यमान कुछ ज़्यादा सरल और, अंशतः छोटी रचनाओं के परस्पर संयोग और प्रतिक्रियाओं का परिणाम होती हैं.

उपन्यास टुकड़ों से – लघु उपन्यासों से बनता है.

नाटक बनता है शब्दों से, पैनेपन से, अभिनय से, अभिनय और शब्दों के संयोग से, स्टेज की रचना से. शेक्सपियर के लिए किसी एक्टर का पैनापन – अपने आप में उद्देश्य है, न कि किसी ख़ास टाईप को दर्शाने का माध्यम.

आरंभिक उपन्यास में नायक का व्यक्तित्व – उसके भागों को जोड़ने का विधान था. साहित्यिक कृतियों के परिवर्तन की प्रक्रिया में दिलचस्पी इन जोड़ने वाले भागों पर चली गई.

संबद्ध भागों की सफ़लता की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक प्रेरणा, परिस्थितियों के परिवर्तन की सत्यता की ओर दिलचस्पी ज़्यादा दिखाई देने लगी. मनोवैज्ञानिक उपन्यास और नाटकों का जन्म हुआ और पुराने नाटकों एवम् उपन्यासों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का प्रादुर्भाव हुआ.

इसका स्पष्टीकरण, शायद, यूँ दिया जा सकता है कि “ये भाग” इस समय तक आते-आते घिस गए हैं.
साहित्य में अगली सीढ़ी है – मनोवैज्ञानिक प्रेरणा के घिस जाने की.
तब उसे “दूर रखना” पड़ता है.

इस संदर्भ में स्तेण्डाल का उपन्यास “लाल और काला” काफ़ी दिलचस्प है, जिसमें हीरो, जैसे अपने आप पर ज़बर्दस्ती करते हुए, अपने आप से विरोध करते हुए काम करता है; उसके कार्य करने की मनोवैज्ञानिक प्रेरणा काम के विपरीत है.
हीरो रोमॅंटिक-एडवेंचरिस्ट प्लान के अनुसार काम करता है, मगर सोचता अपने ढंग से है.

लेव टॉल्स्टॉय के नायक कार्य के अनुसार मनोविज्ञान का चयन करते हैं.

दोस्तोयेव्स्की अपने पात्रों के मनोविज्ञान को उनके नैतिक और सामाजिक महत्व के विरोध में रखते हैं.

उपन्यास किसी चोर-पुलिस स्टाईल में आगे बढ़ता है, और मनोदशा का वर्णन दार्शनिक स्तर पर किया जाता है.

आख़िर में सारे विरोधी तत्वों का इस्तेमाल हो जाता है.

तब फिर एक ही बात शेष बचती है – “अलग-अलग भागों” पर आया जाए, सारे जोड़ तोड़ लिए जाएँ, जो सिर्फ पैबन्द जैसे हो चुके हैं.

आधुनिक साहित्य में सबसे जीवंत है – लेख-संग्रह और वेरायटी थियेटर, जिसका अलग अलग हिस्सों के प्रति आकर्षण से उद्गम होता है, न कि उनके एक दूसरे से संबंधित होने से. इसी तरह का कुछ वेराइटी के ‘साइड-शोज़’ में देखा जाता है.

मगर इस टाईप के थियेटरों में एक नई एक्शन देखी जाती है, हिस्सों को संबंधित करने की एक्शन.           
«Scala» जैसे ही एक चेकोस्लोवाकियन वेराइटी थियेटर में मुझे एक और प्रकार देखने को मिला, जो सर्कस में बहुत पहले से प्रचलित है. प्रोग्राम के अंत में एक मनमौजी सभी कार्यक्रमों की नकल करते हुए उनकी पोल खोलता है. उदाहरण के लिए, वह अपनी ट्रिक्स पब्लिक की तरफ़ पीठ करके दिखाता है, जो देखती है कि ग़ायब हुआ कार्ड कहाँ जाकर गिरता है.

इस लिहाज़ से जर्मन थियेटर्स विकास के काफ़ी निचले स्तर पर हैं.

इस लिहाज़ से काफ़ी दिलचस्प चीज़ है वह पुस्तक, जो मैं आजकल लिख रहा हूँ. उसका शीर्षक है “ज़ू”, “अ-प्रेमपत्र” या “तीसरी एलोइज़ा”; उसमें अलग-अलग एक्शन्स उस सूत्र से जोड़े गए हैं, कि सब कुछ एक इन्सान के एक औरत से प्यार के किस्से से जुड़ा है. ये किताब – सामान्य उपन्यास की चौख़ट से बाहर निकलने का प्रयास है.


किताब मैं अपने लिए लिख रहा हूँ, और उसे लिखने में मुझे बड़ा शारीरिक कष्ट हो रहा है.

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

Twenty first Letter

पत्र इक्कीसवाँ
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अलीना का पाँचवा. इस पत्र में ताहिती द्वीप के बारे में लिखा गया है, जिस पर सब कुछ बुरा है.
द्वीप पर जहाज़ों से पेट्रोल की बू आती है, और ये भी बुरा है.
ये द्वीप बहुत दूर है, उसे प्यार नहीं किया जा सकता.
वह दूर ही रहेगा, उस पर रहने लगो, तब भी.
पत्र में तान्यूशा नामक घोड़े के बारे में और उसके मूरिया द्वीप पर भेजे जाने का ज़िक्र है. ताहिती से इस द्वीप तक डेढ़ घण्टे का सफ़र है. 
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प्यारे!

ताहिती के बारे में सोचना अच्छा लगता है, मगर उसके बारे में बताना उतना दिलचस्प नहीं है. मम्मा हमेशा कहती थी कि आसपास की दुनिया और घटनाओं के प्रति मेरा रवैया बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं है: मुझे ये नहीं मालूम कि ताहिती की आबादी कितनी है, उसमें कितने गोरे और कितने काले हैं, उसका क्षेत्रफ़ल कितना है, पहाड़ कितने ऊँचे हैं. मेरा दिल बस उस प्यारे द्वीप पर, उस जादुई समुद्र पर वापस जाना चाहता है. पानी नीला-नीला है, रंगीन स्याही की तरह, कोरल रीफ़ चारों ओर से द्वीप को घेरे हुए है; जाने-पहचाने शोर के साथ लहरें रीफ़ से टकराती हैं, और फ़ेन का विशाल सफ़ेद हार बनाती हैं; सफ़ेद फूल – तिआरे – साँवले मुस्कुराते चेहरे पर कान के पीछे और वनिला निरंतर महकते रहते हैं; किनारे पर केंकडों के गुच्छे-गुच्छे तेज़ी से लपकते हैं; मूरिआ के पीछे सूरज डूब रहा है. ये मैं जानती हूँ, देखती हूँ, महसूस करती हूँ.

ख़ैर, बात उसके बारे में नहीं है; मैं तुम्हें तान्यूशा के बारे में बताना चाहती थी. आन्द्रे ने मुझे एक छोटा सा घोड़ा भेंट में दिया. मानो भूमध्य रेखा, ऊँचे तापमान और नारियल को चिढ़ाने के लिए मैंने उसका नाम रखा तान्यूशा. जब बूढ़ा, काला तापू उसे ‘तान्यूसा’ कहकर पुकारता तो मुझे बड़ी ख़ुशी होती. उसकी देखभाल मैं ख़ुद ही करती थी, उसकी सफ़ाई करती, उसे खिलाती, पिलाती. वह भी मुझसे अच्छे से पेश आती. केलों के लिए टेरेस के पास आती और हौले से हिनहिनाती. जब तान्यूशा खा-पीकर होशियार और ख़ूबसूरत हो गई, तो उसका स्वभाव एकदम बदल गया: कोई उसकी सवारी करे ये उसे अच्छा नहीं लगता था, और जैसे ही बैठो, तो वह गोल-गोल घूमने लगती, पीछे-पीछे हटने लगती, चाहे फिर उसके पीछे कुछ भी क्यों न हो – पानी, कंटीली फेन्सिंग, लोग. और, फिर वह एकदम भाग गई, घने टापू के बीच में – ढूँढ़ते रहो उसे! आन्द्रे उन दिनों वहाँ था नहीं, वह अक्सर दूसरे द्वीपों को देखने चला जाता. मेरे बेडरूम में थे पाँच दरवाज़े और एक खिड़की! सब पूरे खुले हुए! ताहिती की रातें इतनी निःशब्द, संतृप्त, इतनी साफ़ होती हैं कि ख़ुद काले लोग भी रात को घर से दूर नहीं जाते. मैं पागलपन की हद तक डरती थी, आँसू निकल आते थे. आख़िरकार मैंने दरवाज़े के पास तापू को तैनात कर दिया. तान्यूशा के भाग जाने के बाद मैं पूरी रात रोती रही. उन दिनों मैं अक्सर रोती रहती थी. तापू ने सुना और सोचा, कि मैं डर रही हूँ -   पति आयेगा और घोड़ा गुम जाने के कारण मुझे मारेगा. सुबह बोला: “तू मत रो, मैं तान्यूसा को ढूँढ़ लूँगा, और तेरे मरद को कुछ भी पता नहीं चलेगा.” उसने मुस्कुराते, काले लड़कों को चारों ओर भेज दिया, और तान्यूशा को वापस अपनी जगह पर बांध दिया गया.

जब आन्द्रे वापस आया और उसे तान्यूशा के भाग जाने के बारे में पता चला, तो उसने फ़ौरन उसे बेच दिया. वह घोड़ों से इन्सानों की ही तरह पेश आता था और उसने ये फ़ैसला किया कि तान्यूशा ने निहायत घटिया दर्जे की नमकहरामी की है, जिसे बर्दाश्त करना नामुमकिन है. तान्यूशा को स्टीमर में लाद दिया गया और मूरिआ पे एक अंग्रेज़ के पास ले गए. वो ग़रीब, कितने हिचकोले खा रही थी!

तुम मेरे बारे में लिखते हो – अपने लिए, मैं अपने बारे में लिखती हूँ – तुम्हारे लिए.

आल्या       


Twentieth Letter

पत्र संक्षिप्त सा
बीसवाँ




तुम शौक से औरों को नीले-नीले ख़त लिखती रहो, मुझे तुमसे प्यार है, आल्या!

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

Nineteenth Letter

पत्र उन्नीसवाँ
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जिसे न पढ़ें. इसे अलीना ने तब लिखा था, जब वह बीमार थी, पत्र के लिए लाईनों वाला कागज़ मिला, मगर पत्र इस किताब में सबसे अच्छा है, मगर उसे न पढ़ें, क्योंकि उसे काट दिया गया है.
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स्टूडेंट्स वाले इस कागज़ पर क्या लिखूँ?

सिर्फ गलतियाँ मत गिनना और नंबर मत देना. एस्पिरीन की तीन गोलियाँ निगलीं, खूब सारी गरम-गरम चीज़ें पीं, ओवरकोट पहने नंगे पाँव फ्लैट में घूमी, टेलिफोन पर किसी से बातें कीं, आलू के साथ मछली खाई, काफ़ी देर तक कुछ भी नहीं किया, और अब तुम्हें लिख रही हूँ.

उस औरत के पास, जब उसने तुम्हें फ़ोन किया, तो तुम तीर की तरह भागे थे. ये छैलापन था या ओछापन, या दोनों एक साथ!

अगर तुम औरत होते तो मेरा तथाकथित छोटा सा ब्यूटी-पार्लर तुम्हारे ऑफ़िस के पास ही होता. 

मगर तुम्हारे प्यार के जडत्व से मुझे कुछ डर सा लगता है. बिल्कुल डरावना. तुम अपनी ही आवाज़ पे चीख़ते हो, तैश में आ जाते हो और बेकार में ही चिल्लाते हो. इस जडत्व के चलते तुम पूरी तरह अनुपयुक्तता से प्यार का इज़हार कैसे करोगे? सिर्फ ग़ुस्सा न करना.

अपने लिए नया सूट सिलवाओ, छह कमीज़ें होनी चाहिए – तीन लाँड्री में, तीन तुम्हारे पास, टाई मैं गिफ़्ट कर दूंगी, जूते साफ़ कर लो.

और मुझसे, किताबों के बारे में बात करो, मैं पिछले पंजों पर एकदम सीधी खड़ी रहूँगी और सुनूँगी.

अब मैं सोऊँगी. कहीं मैं बीमार न हो जाऊँ और कल डान्स ही न कर पाऊँ?

इतना अच्छा अंग्रेज़ और डान्सर है (दो समान गुण). क्या मैं बीमार हो जाऊँगी?

इत्ती ठण्ड है. मुझे बूट्स चाहिए या फिर कार.

क्या शैतान के पास रूह गिरवी रख दूँ? हो सकता है, शायद गिरवी रहने में कोई बुराई नहीं है.

कल पूरे दिन अपनी आया स्तेशा के बारे में सोचती रही. 

सोच रही हूँ और ट्राम में बैठकर वापस जा रही हूँ, - फिर मैं रोने लगती हूँ.   
मैं मम्मी की अपेक्षा स्तेशा से ज़्यादा मिलती-जुलती हूँ. स्तेशा गोरी और गुलाबी है, भरी-भरी, खिलखिलाती हुई, उसमें ज़रा भी कटुता नहीं है, मर्दों को प्यार करती है. इसीलिए कई बार दूध पिलाने वाली आया बनी थी.

हर बार, जब बच्चा-घर जाने का समय आता, पापा के पास आती – पैसे नहीं हैं.
पापा उसे डाँटते हैं, कि उसने उस निकम्मे से क्यों नहीं लिए.
 “ख़ुदा उसे ख़ुश रखे, मालिक!”

मुझे वह अपनी बच्ची की तरह प्यार करती है. मैं दो महीने की थी, जब उसने मुझे सब्ज़ियों का सूप पिलाया और ख़ुद चेरीज़ के जॅम में पड़ी गुठली खाकर बीमार हो गई थी, जॅम समर-कॉटेज में बनाया था.

जब मैं कुछ बड़ी हो गई, तो वह कभी-कभी मुझसे मिलने आती, मिठाईयाँ लाती, खड़ी रहती और “आप” कहकर संबोधित करती; जब लोग चले जाते तो मेरे साथ बैठकर चाय पीती और “तू” कहती. जब मैं एकदम बड़ी हो गई, तो मैं उसकी ख़ुशमिजाज़ी को समझने लगी. “मेरी मालकिन के यहाँ उसकी सहेली रहती है, मैं समझ नहीं पाती – बिल्कुल ‘नन’ जैसी!” और, ख़ुद खिलखिलाती और इतनी ज़िन्दादिल रहती, उससे स्तेशा की ख़ुशबू आती, जैसी ढक्कन खोलने पर उसके लकड़ी के सन्दूक से आती: कपड़ों की और सेबों की. नाक ऊपर की ओर, आँखों में चालाकी.

रसोईन का ख़याल था कि मेरे पास काफ़ी सारे जवान लोग आते हैं, और वह सोचती, कि बन्द दरवाज़े के पीछे बेहूदगियाँ होती हैं. “तू भी क्या,” वह कहती, “स्तेशा, कहते हैं कि तूने अवैध बच्चे को जन्म दिया, क्या वो लोग तुझे इस हद तक पहुँचाते हैं!”

एक बार वह किसी बहुत अमीर घर में काम कर रही थी. घर में चोरी हो गई.

हमेशा की तरह, स्तेशा आँखों में आँसू लिए पापा के पास आई, कि उसे थाने ले जाएँगे.
पापा ने उससे पूछा:
 “और जब चोरी हुई, तो तू कहाँ थी?”
 “नोवो-देविच्यी मॉनेस्ट्री में, नन से मिलने गई थी.”
 “तू ये बात बता दे, तुझे छोड़ देंगे.”
 “क्या कहते हैं, मालिक, नन को ऐसे काम में घसीटूँ!”

उसने कुछ भी नहीं बताया, कुछ समय जेल में बैठी, फिर असली चोर मिल गए और उसे छोड़ दिया गया.

मगर, जब क्रांति के बाद मम्मा ने उसे वोट देने के इस लिए मनाया, तो वह बोली कि चांदी के चम्मचों वाले उस कांड के बाद वह किसी भी हालत में थाने नहीं जाएगी.        

मेरी शादी में उसे सिल्क की ड्रेस देने का वादा बहुत पहले किया गया था.

मगर उसे वह मिली ही नहीं...

नींद भी उड़ गई, मैं उसे इतना प्यार करती हूँ, स्तेशा को.

तुम्हें चूमती हूँ, प्यारे, बस, बीमार न पड़ जाऊँ.

आल्या



मैं ये स्तेशा का किस्सा तुम्हें क्यों सुनाने लगी?

सोमवार, 20 जुलाई 2015

Introduction to Letter Ninteen

प्रस्तावना
उन्नीसवें पत्र की

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अलीना के पत्र के बारे में, एस्पिरीन के बारे में, हैरिंग मछली के, टेलिफोन के बारे में, प्यार के जड़त्व के बारे में, अंग्रेज़-डान्सर के बारे में और दूध-आया स्तेशा के बारे में. प्रस्तावना में विस्तार से समझाया गया है कि अलीना का पत्र क्यों नहीं पढ़ना चाहिए.
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अलीना का पत्र पूरी किताब में सबसे अच्छा है. मगर उसे अभी न पढ़िए. फ़िलहाल इसे छोड़ दीजिए और किताब पूरी ख़त्म करने के बाद ही पढ़िए. मैं आपको अभी समझाता हूँ कि ऐसा क्यों करना चाहिए.

मैंने भी उसे उसी समय नहीं पढ़ा. उसे चूमा, उस पर यहाँ-वहाँ नज़र दौड़ाई, मगर वह पेन्सिल से लिखा था, और मैंने नहीं पढ़ा.  

अभी समझाता हूँ कि क्यों. मैं – बहरा हूँ. मतलब, मैं बॉयलर्स की मरम्मत करता था, भीतर घुस कर प्यायर्स से जोड़ों को पकड़े रहता. कानों में हमेशा, बस शोर ही रहता. मैं सिर्फ देखता था कि लोगों के होंठ कैसे हिलते हैं, मगर मैं कुछ भी सुन नहीं सकता था. ज़िन्दगी ने बहरा कर दिया था – बहरे आदमी अपने आप में ही सिमटे रहते हैं.

आल्या का ख़त अभी हाल ही में पढ़ पाया, 10 मार्च को, किताब पूरी लिखने के बाद. उसे चार घंटे पढ़ता रहा. सबसे पहले, ख़त बड़ी अच्छी तरह लिखा हुआ है. ईमानदारी से कह रहा हूँ, मैंने उसे नहीं लिखा. प्यार के जड़त्व के बारे में उसमें बिल्कुल सच्ची बात कही गई है और एक और अलिखित सत्य – दुर्भाग्य के जड़त्व के बारे में.

मुझे विदेश में आकर टूटना था, और मुझे टूटता हुआ प्यार मिला. मैंने उस औरत की ओर देखा भी नहीं और यही विचार मन में लिए उसके पास आया कि वह मुझे प्यार नहीं करती है. मैं यह नहीं कहता, कि वर्ना वह मुझसे प्यार करने लगती. मगर हर चीज़ पूर्वनियोजित थी. ये ख़त दो संस्कृतियों के बारे में प्लान को बर्बाद कर रहा है, क्योंकि वह औरत जिसने स्तेशा के बारे में इस तरह लिखा है – अपनी है.

इसलिए, प्यारे दोस्तों, इस पत्र को न पढ़ें, इसीलिए मैंने जानबूझकर उस पर लाल क्रॉस बना दिया है. ताकि आप गलती न करें.

इस पत्र की बनावट को कैसे समझा जाए? क्योंकि उसे मैंने यहाँ रखा तो है.

मगर, बताईये तो, आपको बनावट की ज़रूरत क्यों पड़ गई? और अगर ज़रूरत है – तो प्लीज़, शौक से!

किसी रचना की व्यंग्यात्मकता के लिए कार्यकलाप को समझने की दुहरी कुंजी की आवश्यकता पड़ती है. अक्सर इसे दबे-दबे अंदाज़ में दिखाया जाता है, उदाहरणार्थ, “येव्गेनी ओनेगिन” में, इस वाक्य से : “ये आदमी कहीं पैरोडी तो नहीं?”

अपनी किताब में उस औरत के लिए, जिसे मैं पत्र लिखता था, दूसरी – अतिशयोक्ति की – कुंजी का इस्तेमाल कर रहा हूँ, और अपने लिए भी वैसी ही कुंजी का प्रयोग कर रहा हूँ.

मैं – बहरा हूँ.

अगर आपको बनावट के बारे में दी गई मेरी सफ़ाई पर विश्वास नहीं है, तो आपको यह भी विश्वास करना पड़ेगा कि अपने लिए अलीना का पत्र मैंने ख़ुद ही लिखा है.

मैं सलाह दूंगा कि विश्वास करें....ये अलीना का ही पत्र है.



ख़ैर, आप वैसे ही कुछ भी नहीं समझ पाएंगे, क्योंकि सुधार करते समय सब गड्ड—मड्ड हो गया है.

बुधवार, 15 जुलाई 2015

Eighteenth Letter

पत्र अठारहवाँ
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जापानी, तारात्सुकी, के बारे में, और माशा के प्रति उसके प्यार के बारे में. सभी रंगों के लोगों के बीच दुखद साम्यता के बारे में. फ़ुजियामा के बारे में. पत्र के अंत में – उलाहना.
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 मैं बहुत भावुक हूँ, आल्या. वो इसलिये कि मैं पूरी संजीदगी से जीता हूँ. हो सकता है कि पूरी दुनिया ही भावुक है. वो दुनिया, जिसका पता मैं जानता हूँ. वह फॉक्सट्रॉट नहीं करती.

सन् 1913 में मॉस्को में मेरा एक जापानी विद्यार्थी था. उसका उपनाम था तारात्सुकी.
वह जापानी दूतावास में सेक्रेटरी था.

और, उस घर में, जहाँ वह रहता था, सोल्त्सा शहर की रहने वाली माशा नामक नौकरानी थी. माशा को सब प्यार करते थे – सारे चौकीदार, बिल्डिंग में रहने वाले, पोस्टमैन, सिपाही.

मगर उसे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं थी. सोल्त्सा में उसकी छह साल की बेटी थी, जो मम्मा को बेवकूफ़ कहती थी.

तारात्सूकी के कमरे में गर्माहट थी. मैं अक्सर उसके पास बैठकर उसे टॉल्स्टॉय पढ़कर सुनाया करता.
हमेशा काफ़ी जल्दी पढ़ता था.

दीवार पर टंगे आईने में तारात्सूकी का और मेरा चेहरा प्रतिबिम्बित होते.

मेरे चेहरे के भाव हमेशा बदलते रहते, उसका चेहरा भावहीन रहता, जैसे वह चमड़े से नहीं, बल्कि किसी खोल से ढंका हो.

मुझे ऐसा लगता कि हम दोनों में से – इन्सान, शायद, सिर्फ एक है.

उसकी दुनिया मेरे लिए बिना पते की थी.

तारात्सूकी को माशा से प्यार हो गया था. जब वह इस बारे में बताती, तो चीत्कार करते हुए हँसती.
जब वह सफ़ेद कुत्ते के साथ घूमती, तो वह उसके साथ हो लेता. तारात्सूकी सन् 1914, 1915, 1916, 1917, 1918 में उससे प्यार करता रहा.

पांच साल.

एक बार वह माशा के पास आया और बोला:
 “सुन, माशा. मेरी एक दादी है, वह बड़े पर्वत फुजियामा पर, बाग में रहती है. वह काफ़ी जानी-मानी है और मुझे बहुत चाहती है, और उस बाग में उसका प्यारा सफ़ेद बन्दर भागता रहता है.
(तारात्सूकी की शैली से हैरान मत होना – उसे रूसी तो मैंने ही सिखाई थी.)
 - कुछ दिन पहले सफ़ेद बन्दर दादी को छोड़कर भाग गया.
दादी ने इस बारे में मुझे लिखा था.
मैंने जवाब दिया कि मैं माशा नाम की लड़की से प्यार करता हूँ और शादी की इजाज़त चाहता हूँ.
मैं चाहता था, कि परिवार तुम्हें स्वीकार कर ले.
दादी ने जवाब दिया कि बन्दर लौट आया है, कि, वह बेहद ख़ुश है और शादी के लिए अपनी सहमति देती है.

मगर माशा को बड़ा मज़ेदार लग रहा था कि तारात्सुकी की एक पीली दादी है, जो फुजियामा में रहती है.                     

वह हँसने लगी और उसने कोई ख़्वाहिश ज़ाहिर नहीं की.

फिर क्रांति हो गई.

तारात्सूकी ने माशा को ढूँढा, जिसके पास कोई काम नहीं था, और फिर से कहने लगा:
 “माशा, यहाँ कोई कुछ समझ नहीं पा रहा है. ये ऐसे ही नहीं ख़त्म हो जाएगा, यहाँ काफ़ी खून बहेगा.
चलो, मेरे साथ जापान चलो.”

क्रांति जारी रही.

तारात्सूकी ने माशा को दूतावास में बुलाया. दूतावास में सामान रखा. माशा गई.

वहाँ राजदूत उनसे मिला और उसने जल्दी-जल्दी कहा:
 “मैडम, आप समझ नहीं रहीं, कि क्या करने जा रही हैं, - आपका मंगेतर बेहद अमीर और जाना-माना है, उसकी दादी भी तैयार है.
सोचिए, सौभाग्य को हाथ से न जाने दीजिए.”

माशा ने कोई जवाब नहीं दिया.

और जब वे बाहर आए तो उसने अपने जापानी से कहा: “मैं कहीं नहीं जाऊँगी” – और उसके सफ़ाचट सिर को चूमा.

तारात्सूकी और एक बार उसके पास गया. वह बड़ा दुखी था. उसने कहा:
 “प्यारी माशा. अगर तुम नहीं आ रही हो, तो अपना छोटा सा सफ़ेद कुत्ता मुझे दे दो, जिसके साथ तुम घूमती हो.”

चूँकि हर जगह भुखमरी थी और कुत्ते को खिलाने के लिए माशा के पास कुछ भी नहीं था, इसलिए उसने कुत्ता दे दिया.

तारात्सूकी का आख़िरी ख़त व्लादीवोस्तोक से था. ख़त में लिखा था:
 “मैं तुम्हारे कुत्ते को यहाँ लाया हूँ और जल्दी ही उसके साथ आगे निकल जाऊँगा, तुम्हें काफ़ी मुश्किल दिनों का सामना करना पड़ेगा, मुझे जवाब का इंतज़ार रहेगा, लिखना, मैं तुम्हें लेने आ जाऊँगा.”

मगर ख़त मुश्किल से पहुँचा ही था कि रेल की पटरियाँ सैंकड़ों जगहों पर टूट गईं.

माशा वैसे भी जवाब नहीं देती. वह रुक गई.

उससे पहले ही की तरह सब प्यार करते थे. वह क्रांति से नहीं डरती थी, क्योंकि उसके पास जानी-मानी, पीली दादी नहीं थी.

आजकल वह ‘मिलिट्री-सेनिटरी स्टोर’ में काम करती है – ऐसा लगता है.

जब वह जापानी को याद करती है, तो उसे अफ़सोस होता है.

उसे सब प्यार करते हैं. वह एक असली औरत है, वह घास के समान है, मानो उसका कोई नाम नहीं है, अपने आप से उसे जैसे प्यार ही नहीं है, वह जैसे अपने आप को देखे बिना जिए जाती है.

मुझे भी जापानी पर दया आती है.

और मैं सोचता हूँ कि मैं बेकार में ही आईने में देखता रहा और ग़लत सोचता रहा कि मैं और जापानी – अलग-अलग हैं.

वह मुझसे काफ़ी मिलता जुलता है, वो जापानी.

मुझे नहीं लगता कि इससे उसके देश की सैनिक ताक़त बढ़ेगी.

 मगर तुम – माशा नहीं हो.


तुम्हारे आसमान में तारों के स्थान पर है – तुम्हारा पता. ख़ैर, ये सब उतना अच्छा नहीं है, जितना कि दयनीय है.