दूसरा पत्र
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प्यार,
ईर्ष्या, टेलिफोन और प्रेम की अवस्थाओं के बारे में
यह पत्र समाप्त
होता है रूसियों की चाल के बारे में टिप्पणी से.
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प्रिय आल्या!
दो दिनों से
तुम्हें देखा ही नहीं.
फ़ोन करता हूँ. टेलिफोन
फुफकारता है, मैं सुन रहा हूँ कि मैं किसी और पर चढ़ गया हूँ.
आख़िरकार तुम्हारा
नंबर लग जाता है, - तुम व्यस्त हो – दिन में, शाम को.
एक बार फिर लिखता
हूँ. मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँ.
तुम वो शहर हो,
जिसमें मैं रहता हूँ, तुम महीने और दिन का नाम हो.
मैं तैर रहा हूँ,
आँसुओं से नमकीन और भारी हो गया हूँ, पानी से ऊपर क़रीब-क़रीब निकलता ही नहीं हूँ.
ऐसा लगता है कि
शीघ्र ही डूब जाऊँगा, मगर वहाँ भी, पानी ने नीचे, जहाँ टेलिफ़ोन की घंटी नहीं बजती और
आवाज़ें नहीं पहुँचतीं, जहाँ तुमसे मिलना मुमकिन नहीं है, मैं तुमसे प्यार करता रहूँगा.
मैं तुमसे प्यार
करता हूँ, आल्या, और तुम मुझे अपनी ज़िन्दगी की देहलीज़ पे टंगे रहने को मजबूर करती हो.
मेरे हाथ सुन्न
पड़ रहे हैं.
मुझे लोगों से ईर्ष्या
नहीं होती है, मुझे तुम्हारे समय से ईर्ष्या होती है.
तुम्हें देखे बिना
मैं रह नहीं सकता. मैं कर भी क्या सकता हूँ, अगर प्यार को किसी और चीज़ से बदलना संभव
ही नहीं है?
तुम चीज़ों का मोल
ही नहीं जानतीं. तुम्हारी नज़रों में सब लोग एक जैसे हैं, जैसे ख़ुदा की नज़रों में होते
हैं. मैं करूँ तो क्या करूँ?
मैं तुमसे बेहद
प्यार करता हूँ.
पहले मैं तुम्हारी
तरफ़ ऐसे झुकता था, जैसे एक कम्पार्टमेंट में नींद से बोझिल यात्री का सिर पड़ोसी के
कंधे पर झुक जाता है.
फिर मैं
तुम्हें देखता ही रहा.
जानता हूँ तुम्हारा
मुँह, तुम्हारे होंठ.
अपनी पूरी ज़िन्दगी
तुम्हारे ख़याल के इर्द गिर्द ही घूमता रहा. मुझे यक़ीन है कि तुम पराई नहीं हो, - अच्छा, मेरी ओर
देखो.
मैंने अपने प्यार
से तुम्हें डरा दिया; जब, शुरू में, जब मैं ख़ुश रहता था, मैं तुम्हें ज़्यादा अच्छा
लगता था. ये रूसी आदत है, माय डियर. हमारी चाल बोझिल है. मगर रूस में मैं मज़बूत था,
और यहाँ मैंने रोना शुरू कर दिया है.
4 फरवरी
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