गुरुवार, 21 मई 2015

Sixth Letter


छठा पत्र
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हमारे आदिपुरुष की वेदना और क़ैद के बारे में. पत्र समाप्त होता है उसके लिए एक अख़बार छापने के विलम्बित प्रस्ताव से.
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ज़ू-पार्क के पिंजरों में बन्द जानवर बहुत ज़्यादा दुखी नहीं दिखाई देते.

वे पिल्ले भी पैदा करते हैं.

बब्बर शेर के पिल्लों को दूध पिलाकर बड़ा किया कुतियों ने, और बब्बर शेर के पिल्ले अपने ऊंचे वंश के बारे में जानते ही नहीं थे.

लकडबग्घे रात-दिन पिंजरों में घूमते रहते हैं.

लकड़बग्घे के चारों पंजे पेल्विस के काफ़ी नज़दीक होते हैं.

बूढ़े बब्बर शेर ‘बोर’ होते रहते हैं. शेर पिंजरे की बागड़ से लगे-लगे घूमते हैं.

हाथी अपनी चमड़ी की सरसराहट करते हैं.

रोएँ वाले ऊँट बेहद ख़ूबसूरत हैं. उनकी खाल गरम, ऊनी कोट जैसी है और सिर हल्का है. तुमसे मिलते जुलते हैं.

सर्दियों में सब बन्द होता है.

जानवरों की दृष्टि में यह कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं है.

एक्वेरियम बच गया.

बिजली से प्रकाशित और लेमोनेड जैसे नीले पानी में मछलियाँ तैर रही हैं. कुछ कुछ शीशों के पीछे तो बहुत भयानक नज़ारा है. सफ़ेद टहनियों वाला एक पैड़ बैठा है, और वह अपनी टहनियाँ हिला रहा है. दुनिया में इतनी पीड़ा का निर्माण करने की क्या ज़रूरत थी? इन्सान जैसे बन्दर को बेचा नहीं, बल्कि एक्वेरियम की ऊपरी मंज़िल पर बन्द करके रख दिया है. तुम बेहद व्यस्त हो, इतनी ज़्यादा व्यस्त हो कि अब मेरे पास पूरा समय ख़ाली है. मैं एक्वेरियम में जा रहा हूँ.

मुझे उसकी ज़रूरत है. अनुरूपता के लिए मुझे ज़ू की ज़रूरत होगी.

बन्दर, आल्या, क़रीब मेरे ही क़द का है, मगर उसके कंधे चौड़े हैं, वह झुका हुआ है और उसके हाथ लम्बे-लम्बे हैं. ऐसा नहीं लगता कि वह पिंजरे में बन्द है.

उसके रोएँ और नाक, जैसे टूटी हुई है. वह मुझे ऐसा प्रतीत होता है, मानो कोई क़ैदी हो.

और पिंजरा – पिंजरा नहीं, बल्कि जेलख़ाना हो.

पिंजरा दुहरी जालियों वाला है, और जालियों के बीच में, याद नहीं है कि आदमी चलता है या नहीं चलता?

बन्दर (वो मर्द बन्दर है) पूरे दिन उकताता रहता है. तीन बजे उसे खाना दिया जाता है. वह प्लेट में खाता है. कभी-कभी इसके बाद वह बन्दरोंवाला बोरिंग काम करता है. ये अपमानजंक और शर्मनाक है. तुम तो उससे ऐसे बर्ताव करते हो, जैसे इन्सानों के साथ करते हो, मगर वह बेशरम है.

बचे हुए समय में बन्दर पिंजरे पर चढ़ता है, पब्लिक पर नज़र डालते हुए. मुझे शक है, कि क्या हमारे इस दूर के रिश्तेदार को बिना मुक़दमे के जेल में बन्द रखने का अधिकार हमें है या नहीं. और, उसका काँसुल कहाँ है?

आख़िर, उकता रहा है बन्दर - बिना काम के. लोग उसे दुष्टात्माओं की तरह नज़र आते हैं. और पूरा दिन ये बेचारा ग़रीब विदेशी भीतरी ज़ू में उकताता रहता है.

उसके लिए कम से कम अख़बारों का प्रकाशन भी नहीं किया जाता.


P.S.  बन्दर मर गया.

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