चौथा पत्र
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ठण्ड के बारे में, पीटर के विश्वासघात के बारे में, वेलिमीर ख्लेब्निकोव
और उसकी मृत्यु के बारे में. उसके सलीब पर लिखी इबारत के बारे में. यहाँ वर्णन है
: ख्लेब्निकोव की मोहब्बत का, न चाहने वालों की क्रूरता का, कीलों के बारे में, जाम
के बारे में और समूची मानव संस्कृति के बारे में, जो प्यार की राह पर ही बनी है.
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मैं प्यार के बारे में नहीं लिखूंगा, मैं सिर्फ मौसम के बारे में
लिखूंगा.
बर्लिन में आज मौसम अच्छा है.
आसमान नीला है और सूरज घरों के ऊपर चमक रहा
है. सूरज सीधे मरत्सान-गेस्ट हाऊस में झांक रहा है, आइखनवाल्ड1 के कमरे
में.
बाहर अच्छा और तरोताज़ा महसूस हो रहा है.
इस साल बर्लिन में बर्फ क़रीब-क़रीब गिरी ही
नहीं.
आज 5 फ़रवरी है....कुछ भी प्यार के बारे
में नहीं है.
मैं हल्की सर्दियों वाले कोट में घूमता
हूँ, और अगर बर्फ गिरी होती, तो इसी को सर्दियों वाला कोट कहना पड़ता.
मुझे बर्फ अच्छी नहीं लगती और ठण्ड भी
अच्छी नहीं लगती.
ठण्ड के कारण ही धर्मदूत पीटर ने जीज़स
क्राइस्ट को जानने से इनकार कर दिया था. रात ताज़गी भरी थी, और वह अलाव के निकट
आया, मगर अलाव के पास पूछताछ हो रही थी, सेवकों ने पीटर से क्राइस्ट के बारे में
पूछा, मगर पीटर ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया.
तभी मुर्गे ने बांग दी.
पेलेस्टाइन में कड़ाके की ठण्ड नहीं पड़ती.
वहाँ, शायद, बर्लिन के मुक़ाबले मौसम गरम ही होता है.
अगर वो रात गरम होती, तो पीटर अंधेरे में
होता, मुर्गा बेकार ही में बांग देता, बाक़ी मुर्गों की तरह, और हॉली बाइबल में
व्यंग्य न होता.
ये तो अच्छा हुआ कि क्राइस्ट को रूस में सूली
पर नहीं चढ़ाया गया: हमारे यहाँ मौसम काँटिनेंटल होता है, बर्फ भरी आंधियाँ चलती हैं;
जीज़स के शिष्यों के झुण्ड के झुण्ड चौराहे के अलावों पास आते और जीज़स का त्याग
करने के लिए लाइन में खड़ी हो जाते.
मुझे माफ़ करना, वेलिमीर ख्लेब्निकोव2,
इसलिए कि मैं पराए प्रकाशन गृहों की आग सेंक रहा हूँ. इसलिए, कि मैं तुम्हारी
नहीं, बल्कि अपनी किताब प्रकाशित कर रहा हूँ. हमारे यहाँ का मौसम, गुरू,
काँटिनेंटल है.
लोमड़ियों के अपने बिल होते हैं, क़ैदी को
एक खटिया दी जाती है, चाकू अपनी म्यान में रात बिताता है, मगर तुझे अपना सिर
टिकाने के लिए कोई जगह नहीं मिली.
तूने “व्ज़्याल(ले लिया)” पत्रिका
के लिए जो ‘यूटोपिया’ लिखा था, उसमें अन्य कल्पनाओं के साथ एक है - हर इन्सान को किसी भी शहर में एक कमरा पाने का
अधिकार है.
ये सच है, कि ‘यूटोपिया’ में यह कहा गया
है कि इन्सान के पास काँच का कमरा होना चाहिए, मगर मेरा ख़याल है कि वेलिमीर साधारण
कमरे के लिए भी तैयार हो जाता.
ख्लेब्निकोव मर गया, और किसी बेवकूफ़ आदमी
ने ‘लिटररी नोट्स’ में अलसाई हुई भाषा में ‘असफ़ल’ व्यक्ति के बारे में कुछ लिखा
था.* 3
कब्रिस्तान में कब्र के ऊपर सलीब पर
कलाकार मितूरिच ने लिखा:
”वेलिमीर ख्लेब्निकोव – प्रेसिडेंट ऑफ़ द
ग्लोब”
आख़िर उस घुमक्कड़ को रहने की जगह मिल ही
गई, बेशक, काँच वाली नहीं.
वेलिमीर, मुझे नहीं लगता कि फिर से, सिर्फ
भटकने के लिए, तुम दुबारा जन्म लेना पसन्द करोगे.
और, दूसरे सलीब पर लिखा था: “जीज़स
क्राइस्ट यहूदियों का सम्राट”.
तुम्हारे लिए बड़ा कठिन रहा होगा स्तेपियों
में चलना, और, कभी सैनिक की नौकरी करना, कभी रात में गोदामों की रखवाली करना, या,
अर्धकैदी की तरह, खार्कोव में ‘इमाजिनिस्टों’ की शोरगुल भरी सभा में हिस्सा लेना.
हमें माफ़ करो अपने लिए और औरों के लिए.
इसलिए कि हम पराई आग सेंक रहे हैं.
पहले मैं ऐसा सोचता था कि ख्लेब्निकोव को
इस बात का एहसास ही नहीं है कि वह कैसे जी रहा है, कि उसकी कमीज़ की आस्तीनें कंधों
तक फट गई हैं, कि उसके जाली वाले पलंग पर गद्दा नहीं है, कि पाण्डुलिपियाँ, जिनसे
वह तकिये का खोल भरता था, खो गई हैं. मगर मृत्य से पहले ख्लेब्निकोव को अपनी
पाण्डुलिपियों की याद आई थी.
वह
बड़ी भयानक मौत मरा. खून के संक्रमण से.
उसके पलंग पर चारों ओर फूल सजा दिए थे.
आसपास कोई डॉक्टर नहीं था, सिर्फ एक
महिला-डॉक्टर थी, मगर महिला को उसने अपने पास नहीं फटकने दिया.
गुज़रे ज़माने को याद करता हूँ.
किस्सा है कुओक्कल का, शिशिर ऋतु का आगमन
हो चुका था, जब रातें अंधेरी होती हैं.
सर्दियों में एक आर्किटेक्ट के घर में
ख्लेब्निकोव से मिला था.
घर शानदार था, करेलिया की बर्च का
फर्नीचर, मेज़बान एकदम सफ़ेद झक्, काली दाढ़ी वाला और बुद्धिमान. उसकी – लड़कियाँ थीं.
ख्लेब्निकोव यहाँ अक्सर आया करता था. मेज़बान उसकी कविताएँ पढ़ता था और उन्हें समझता
था. ख्लेब्निकोव किसी बीमार पंछी की तरह था, इस बात से अप्रसन्न कि सब लोग उसकी
तरफ़ देखते हैं.
बीमार पंछी की तरह बैठा रहता था वह, अपने
डैनों को झुकाए, पुराने कोट में, और मेज़बान की बेटी की ओर देखता रहता.
वह उसके लिए फूल लाता और अपनी चीज़ें उसे
पढ़कर सुनाता.
उसने उन सब चीज़ों को नकार दिया, सिवाय
“कुँआरे ख़ुदा” के.
वह उससे पूछता कि कैसे लिखना चाहिए.
ये किस्सा है कुओक्कल का, शिशिर ऋतु का.
वहाँ ख्लेब्निकोव कुल्बिन 4 और
इवान पूनि 5 की बगल में रहता था.
मैं वहाँ गया था, मैंने ख्लेब्निकोव को
ढूँढ़ा और उससे कहा कि उस लड़की की शादी हो गई है, एक आर्किटेक्ट के साथ जो उसके
पिता का असिस्टेंट था.
बात इतनी सीधी थी.
ऐसी मुसीबत में अनेक लोग पड़ते हैं.
ज़िन्दगी अच्छी तरह से ही बनी है, वैनिटी-बैग की तरह, मगर हम सबको वहाँ अपनी जगह
नहीं मिल पाती. ज़िन्दगी हमें एक दूसरे के पास रखकर परखती है, और जब हम उस व्यक्ति
की ओर आकर्षित होते हैं, जो हमसे प्यार नहीं करता, तो वह हँसती है. ये सब इतना
आसान है – जैसे डाक के टिकट.
खाड़ी की लहरें भी साधारण ही थीं.
वे अभी भी वैसी ही हैं. लहरें कलई किए हुए
ऊबड़-खाबड़ लोहे के समान थीं. ऐसे लोहे पर धोते हैं. बादल थे ऊन जैसे. ख्लेब्निकोव ने
मुझसे कहा था:
“क्या
आपको मालूम है कि मुझे आहत किया गया है?”
मुझे मालूम था.
“बताइये,
वो क्या चाहते हैं? औरतें हमसे क्या उम्मीद करती हैं? क्या चाहती हैं वे? मैं सब करता.
मैं दूसरी तरह से लिखता. हो सकता है, शोहरत की ज़रूरत हो?”
सागर साधारण था. समर-कॉटेजेस में लोग सो रहे
थे.
इस पीड़ा का मैं क्या जवाब देता?
पियो, दोस्तों, पियो, छोटे और बड़े, प्यार का
कड़वा जाम पियो! यहाँ किसीको भी, किसी भी चीज़ की ज़रूरत नहीं है. प्रवेश सिर्फ फ्री-पास
वालों को है. कठोर होना आसान है, बस, सिर्फ प्यार करना मना है. प्यार भी न तो अरबी,
न ही रूसी समझता है. वो कीलों के समान है, जिन्हें ठोंका जाता है.
हिरन को अपने संघर्ष में सींगों की ज़रूरत पड़ती
है, बुलबुल यूँ ही नहीं गाती है, मगर हमारी किताबों की हमें ज़रूरत नहीं पड़ती. इस अपमान
का कोई इलाज नहीं है.
हमारे लिए बची हैं घरों की पीली दीवारें, जो
सूरज से आलोकित हैं, हमारी किताबें और प्यार की राह पर हमारे द्वारा निर्मित मानवीय
संस्कृति.
और आदेश ये है कि सीधे-सादे रहें.
मगर अगर दर्द बहुत ज़्यादा हो?
तो हर चीज़ ब्रह्माण्ड के स्तर तक ले जाओ, दिल को
दांतों में पकडो, किताब लिखो.
मगर, वो कहाँ है, जो मुझसे प्यार करती है?
मैं उसे सपने में देखता हूँ, मैं उसका हाथ
पकड़ता हूँ, ल्यूसी कहकर पुकारता हूँ, मेरी ज़िन्दगी के नीली आँखों वाले कप्तान, और गश
खाकर उसके पैरों पर गिर जाता हूँ, और सपना से बाहर गिर पड़ता हूँ.
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* ये गोर्नफेल्ड है.
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