तीसरी
प्रस्तावना
मैं सत्तर साल का
हो गया हूँ. मेरी आत्मा मेरे सामने पड़ी है.
वह झुक गई है, जर्जर
हो चुकी है.
उस किताब ने तब
उसे झुका दिया था. मैंने उसे सीधा कर दिया.
दोस्तों की मौत
ने आत्मा को झुका दिया. युद्ध ने. विवादों ने.
गलतियाँ. अपमान.
सिनेमा. और बुढ़ापा, जो आ ही गया. मुझे इस बात से आराम मिलता है कि मैं उन जगहों को
नहीं जानता, जहाँ तुम घूमती हो, तुम्हारे नए दोस्तों को नहीं जानता, तुम्हारी पनचक्की
के पास के पुराने पेड़ों को नहीं जानता.
स्मरण शक्ति तरंगों
के समान बिखर गई. तरंगें पथरीले किनारे से टकराईं. विगत नहीं है.
किनारे की ओर गईं
गोल-गोल लहरें, प्यार की अंगूठियाँ.
सागर के किनारे
नहीं बैठूँगा, अच्छे मौसम का इंतज़ार नहीं करूँगा, अपनी सुनहरे पंखों वाली मछली को नहीं
पुकारूँगा.
रात को सागर के
किनारे नहीं बैठूँगा, पुरानी फेल्ट हैट से पानी नहीं निकालूँगा.
नहीं कहूँगा: “मुझे
अंगूठियाँ दे, ऐ सागर.”
रात आ ही गई. आसमान
से अबूझ तारे समेट लिए गए.
सिर्फ एक वीनस ही,
शाम और सुबह का प्रमुख तारा, आसमान में लौट आया है. प्रेम के प्रति वफ़ादार: किसी और
को प्यार करता हूँ.
सुबह, उस समय, जब
सफ़ेद और नीले धागे में फर्क करना संभव होता है, मैं कहता हूँ वो शब्द – प्रेम.
सूरज आसमान में
बिखर गया है.
गीत की सुबह का
अंत नहीं होता, सिर्फ हम चले जाते हैं.
किताब से देखेंगे,
जैसे पानी से देखते हैं, किन-किन दर्रों से दिल गुज़रा है, विगत से कितना लहू और स्वाभिमान
बचा है, कितनी तथाकथित काव्यात्मकता बची है.
1963. मॉस्को
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