सोमवार, 25 मई 2015

Eighth Letter

पत्र आठवाँ
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तीन कामों के बारे में जो मुझे दिए गए हैं, “प्यार करते हो?” सवाल के बारे में, मेरे सुपरवाइज़र के बारे में, उस बारे में कि “डॉन-किखोत” कैसे बना; फिर पत्र महान रूसी लेखक के बारे में भाषण के बारे में बदल जाता है और मेरी सेवा की अवधि पर चिंतन से समाप्त होता है.  
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तुमने मुझे दो काम दिए हैं:
1) तुम्हें फ़ोन न करूँ, 2) तुमसे न मिलूँ.

और अब मैं व्यस्त इन्सान हूँ.

एक तीसरा काम भी है: तुम्हारे बारे में सोचूँ भी नहीं. मगर तुमने वह काम मुझे नहीं थमाया.
तुम ख़ुद ही कभी-कभी मुझसे पूछती हो: “प्यार करते हो?”

तब मैं जान जाता हूँ कि गार्ड्स की रोल-कॉल हो रही है. मैं इंजीनियरिंग कोर के सिपाही की लगन से, जो गैरिसन के तौर-तरीकों से अच्छी तरह वाक़िफ़ नहीं होता, जवाब देता हूँ:
 “गार्ड नंबर 3, शायद नंबर नहीं जानता, प्लेस ऑफ़ ड्यूटी – टेलिफोन के पास और Gedächtniskirche सड़क से Jorckstrasse ब्रिज तक, उसके आगे नहीं. ड्यूटी: प्यार करना, मुलाक़ात न करना, चिट्ठियाँ नहीं लिखना. और ये याद रखना कि ‘डॉन-किखोत” कैसे बनाया गया था.

 “डॉन-किखोत” गलती से बन गया, जेल में. उपहासात्मक नायक का उपयोग सेर्वान्तेस ने न सिर्फ मज़ाक़िया कारनामों को अंजाम देने के लिए किया, बल्कि बुद्धिमत्तापूर्ण सूक्तियों को बुलवाने में भी किया. तुम ख़ुद ही जानती हो, मिस्टर सुपरवाइज़र, कि अपने ख़तों को कहीं न कहीं तो भेजना ही पड़ता है ना. डॉन-किखोत को उपहार में मिली बुद्धिमत्ता, उपन्यास में उसके अलावा कोई और बुद्धिमान हो ही नहीं सकता था; बुद्धिमानी और बुद्धिहीनता के संयोग से ही डॉन-किखोत जैसे टाइप के पात्र का जन्म हुआ.

मैं और भी बहुत कुछ कह सकता था, मगर देख रहा हूँ कुछ झुकी हुई पीठ और ऊदबिलाव के छोटे स्कार्फ के सिरे. तुम उसे इस तरह बांधती हो जिससे गला ढंका रहे.

मैं अपनी ‘ड्यूटी वाली पोस्ट’ छोड़कर नहीं जा सकता.

सुपरवाइज़र फुर्ती से जाता है, कभी कभार वह दुकानों के पास ठहर जाता है.

शीशे से तीखी नोक वाले जूतों, लम्बे जनाना-दस्तानों, सफ़ेद पाइपिंग वाले काले रेशमी कुर्तों की ओर देखता है, जैसे बच्चे दुकान के शीशे से बड़ी ख़ूबसूरत गुड़िया को देखते हैं.

मैं आल्या की ओर इसी तरह देखता हूँ.

सूरज ऊपर-ऊपर जा रहा है, जैसा सेर्वान्तेस लिखता है: “अगर बेचारे स्पेनी सामंत के पास दिमाग़ होता, तो वह उसे पिघला देता.”

सूरज मेरे सिर के ऊपर है.

मैं नहीं डरता, मुझे मालूम है कि डॉन-किखोत को कैसे बनाया जाता है.

वह सशक्त बन पड़ा है.

हँसेगा तो सिर्फ वही, जो सबसे ज़्यादा सशक्त है.

किताब हँसती रहेगी.

और अब, जब मैं टेलिफोन के निकट अपनी ड्यूटी पर हूँ और उसे इस तरह छूता हूँ, जैसे बिल्ली बेहद गरम दूध को अपने पंजे से छूती है, मैं अपने डॉन-किखोत में एक और बुद्धिमत्तापूर्ण वाक्य घुसेड़ देता हूँ. बर्लिन में एक बड़ा आदमी जा रहा है. मैं उसे जानता हूँ, कई बार ग़लती से उससे अपना मफ़लर भी बदल लिया था.

जब वह बोलता है तो उसकी शांत आवाज़ एकदम अचानक ही किसी ओझा की चीख़ में बदल जाती है.

ऐसे ओझा को एक बार मॉस्को लाया गया था, ऐतिहासिक संग्रहालय में. सदियों पुरानी ओझाओं की संस्कृति से भली-भांति वाक़िफ़ होने के कारण, ओझा ज़रा भी नहीं घबराया. उसने अपनी लम्बी ढोलक उठाई और प्रोफेसरों के सामने जादू किया, आत्माएँ देखीं, समाधि अवस्था में चला गया.
फिर वह साइबेरिया चला गया जादू करने, मगर अब प्रोफेसरों के सामने नहीं.

उस इन्सान में, जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूँ, तन्मयता इस तरह रहती है जैसे फ्लैट में हो, न कि समर कॉटेज में. और कमरे के एक कोने में, चमड़े के बंधे हुए सूटकेस में, पड़ा है – बवण्डर.

उसका उपनाम है आन्द्रे बेली9.

दुनिया के लिए – बोरिस निकोलायेविच बुगायेव.

प्रोफेसर का बेटा है.

वेल्स ज़िन्दगी का वर्णन इस तरह करता है कि साफ़ पता चल जाता है कि वस्तुएँ इन्सान को नियंत्रित करती हैं.

वस्तुओं ने इन्सान को पुनर्जन्म दिया है, ख़ास तौर से कारों ने.

इन्सान उनमें सिर्फ चाभी भरना जानता है, और आगे वे ख़ुद-ब-ख़ुद चली जाती हैं. जाती हैं, जाती हैं और इन्सान को कुचल देती हैं.

विज्ञान के साथ, बात ज़रा संजीदा किस्म की है.

तर्क की आवश्यकता और प्रकृति में आवश्यकता अपनी-अपनी राहों पर चल दीं.

’ऊपर’ और ‘नीचे’ था, ‘समय’ था, भौतिक पदार्थ था.

अब कुछ भी नहीं है. दुनिया में राज करती है ‘विधा’.

इन्सान ने ‘विधा’ का आविष्कार किया.

विधा.

विधा घर से निकल गई और अपने आप रहने लगी.

”ईश्वरों का भोजन” * मिल गया है, मगर हम उसे खाते नहीं हैं.

वस्तुएँ और सब वस्तुओं में सबसे क्लिष्ट – विज्ञान – धरती पर चलती हैं.

हमारे लिए काम करने पर उन्हें कौन मजबूर करता है?

और क्या ये ज़रूरी है?

बेहतर है कि अनुपयोगी और अदृश्य, मगर नई वस्तुएँ बनाएँ.

कला में ‘विधा’ भी अलग-थलग चलती है.

एक इन्सान जो कोई बड़ी चीज़ लिख रहा है – तीन सौ हॉर्स-पॉवर वाली कार के ड्राइवर के समान है, जो, मानो ख़ुद ही उसे दीवार की ओर खींच कर ले जा रही है. ऐसी कारों के बारे में ड्राइवर्स कहते हैं: “ये तुम्हें बर्बाद कर देगी.”

मैंने कई बार आन्द्रे बेली – बोरिस बुगायेव – को देखा, और सोचा कि वह बहुत डरपोक है, आसानी से हर चीज़ से सहमत हो जाता है.

साँवले चेहरे के चारों ओर आधे-सफ़ेद बाल पूरे सफ़ेद नज़र आते हैं. जिस्म, शायद, मज़बूत है.
देख रही हो ना कि कैसे कमीज़ की आस्तीनें उसकी बाँहों से भरी-भरी हैं.

आँखें कुछ तिरछी-सी.

आन्द्रे बेली की विधा – बड़ी सशक्त थी, इतनी सशक्त कि ख़ुद उसे भी समझ में नहीं आती थी.

मेरा ख़याल है कि आन्द्रे बेली ने मज़ाक-मज़ाक में लिखना शुरू किया होगा.

 “सिम्फोनी”** भी मज़ाक ही था.   

शब्दों की बगल में शब्द रखता गया, मगर कलाकार ने उन्हें वैसे नहीं देखा, जैसे आम तौर से देखते हैं. मज़ाक ग़ायब हो गया, विधा का प्रादुर्भाव हुआ.

आख़िर में उसने इस प्रेरणा के लिए एक नाम भी ढूँढ़ लिया.

ये नाम है एंथ्रोपोसोफ़ी ***.

एंथ्रोपोसोफ़ी – छोटी सी चीज़ है और सिरों को जोड़ने के लिए बनाई गई है.

सम्राज्ञी कैथेरीन के शासनकाल में इसाकियेव्स्की कैथीड्रल का निर्माण किया गया, और सम्राट पावेल के शासनकाल में ईंटों की कमानें बनाई गईं, बिना अनुपातों, पैमानों का ध्यान रखे.

सिर्फ इसलिए कि कोई परेशान न हो.

और जान जाए – कैथीड्रल का निर्माण पूरा हो चुका है.

आजकल समांतर रेखाओं को झुका कर और उसके सिरों को मिलाने के शौकीन बहुत मिल जाएँगे.
एंथ्रोपोसोफ़ी – ये शब्द वर्तमान समय के लिए बिल्कुल उचित नहीं है.

आजकल सत्ता की रेखाएँ हमारे भीतर नहीं छेदती हैं.

नई दुनिया का निर्माण तो आजकल हमारे लिए एक देखने भर की चीज़ है, वह हमारा काम नहीं है. क्रमशः खुलती जाती “सनकी आदमी की डायरी” में, जिसमें पद्य-गद्यकार भटकता है और किसी लक्ष्य को तलाशता है, मगर देखता नहीं है, असफ़ल, किंतु महत्वपूर्ण “बिलौटा लेताएव” में आन्द्रे बेली कई धरातलों का निर्माण करते हैं. एक मज़बूत है, लगभग वास्तविक, अन्य धरातल उस पर से गुज़रते हैं और उसकी छायाएँ प्रतीत होते हैं, फिर रोशनी के स्त्रोत बहुतेरे हैं, मगर ऐसा लगता है कि वे बहुत सारे धरातल ही वास्तविक हैं, और ये आख़िर वाला यूँ ही आ गया है. आत्मा की वास्तविकता न तो इसमें है, न ही औरों में, बस विधा है, वस्तुओं को क़तारों में रखने का तरीक़ा है.
ये है वह बुद्धिमत्तापूर्ण बात जिससे मैं ड्यूटी पर अपने आपको व्यस्त रखता हूँ. खड़ा हूँ, उकता रहा हूँ, नौजवान सैनिक की तरह, आने जाने वालों को गिनता हूँ. प्यार भरे शब्दों से अपने आपको मनाता हूँ:
 “सब्र कर, किसी और चीज़ के बारे में सोच, दूसरे बड़े और अभागे लोगों के बारे में. प्यार में अपमान नहीं होता. और कल, हो सकता है, सुपरवाइज़र फिर से आ जाए.

और मेरी ड्यूटी का टाइम?

कोई टाइम नहीं है – मैं अपनी ड्यूटी के साथ-साथ ही हूँ.
                  
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* H.G.Wells के उपन्यास The Food of The Gods से तात्पर्य है.
** आन्द्रे बेली की “उत्तरी सिम्फनी” से तात्पर्य है.

*** रुडोल्फ़ स्टैनर द्वारा प्रतिपादित एक दार्शनिक सिद्धांत. 

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