पहला पत्र
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यह पत्र एक महिला
द्वारा बर्लिन से अपनी बहन को लिखा गया है जो मॉस्को में रहती है.
उसकी बहन बेहद ख़ूबसूरत
है, चमकीली आँखों वाली. ये पत्र प्रस्तावना के तौर पर दे रहा हूँ.
सुनिए महिला की
सुकूनभरी आवाज़.
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नए फ्लैट में मैं
बस गई हूँ. मुझे शक है कि मेरी मालकिन भूतपूर्व ‘गेशाओं’ में से है, इसलिए उसका स्वभाव
बुरा और नुस्ख निकालने वाला नहीं है.
मेरे मोहल्ले में
सिर्फ जर्मन में ही बात करते हैं; चाहे कहीं से भी आओ, बारह लोहे के पुलों के नीचे
से गुज़रना ही पड़ता है. ये ऐसी जगह है, कि बिना किसी ख़ास ज़रूरत के यहाँ कोई आता नहीं
है. उंटेर-डेन-लिंडेन के परिचित अपने रास्ते से यहाँ नहीं आएँगे!
मेरे साथ वाले सब
वही हैं, अपनी चौकी नहीं छोड़ रहे हैं. वो, तीसरा वाला, पूरी तरह मुझसे चिपक गया है.
उसे मैं अपना सबसे बढ़िया ‘मेडल’ समझती हूँ, हालाँकि प्यार में पड़ने की उसकी आदत से
मैं वाक़िफ़ हूँ. हर रोज़ मुझे एक-दो ख़त लिखता है, ख़ुद ही उन्हें मेरे पास लेकर आता है,
और जब तक मैं उन्हें पढ़ती हूँ, वह आज्ञाकारी की तरह पास में बैठकर इंतज़ार करता रहता
है.
पहला वाला अभी तक
फूल भेजता रहता है, मगर दुखी रहता है. दूसरा वाला, जिसे तुमने असावधानीवश मेरे पास
भेज दिया था, ज़ोर देकर कहता रहता है कि मुझसे प्यार करता है. बदले में ये मांग करता
है कि मैं अपनी सभी अप्रियताएँ लेकर उसके पास जाऊँ. ऐसा चालाक है.
वेहिकल-टैक्स अब
5000 गुना बढ़ने वाला है.
सुकून भरी ज़िन्दगी
के बावजूद मैं यहाँ – लन्दन को बहुत याद करती हूँ. अकेलापन, नपी-तुली ज़िन्दगी, सुबह
से शाम तक काम, बाथ-टब और ख़ूबसूरत नौजवानों के साथ डान्स. यहाँ इस सबकी आदत छूट गई
है. वैसे भी चारों ओर इतना दुख है, कि एक मिनट के लिए भी इसे भुलाया नहीं जा सकता.
अपने बारे में शीघ्र
ही लिखना. किस यू, माइ डियर, सबसे ख़ूबसूरत बहना, प्यार और दुलार के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.
आल्या
3 फरवरी 1923
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