गुरुवार, 28 मई 2015

Ninth Letter


पत्र नौंवा
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बर्लिन की एक बाढ़ के बारे में; असल में पूरा पत्र रूपक के क्रियान्वयन को दर्शाता है: इसमें लेखक हल्के-फुल्के और प्रसन्न मूड में रहने की कोशिश करता है, मगर मुझे, शायद मालूम है कि इस पत्र में वह झूठ बोल रहा है.
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कैसी हवा चल रही है, आलिक! कैसी हवा है!

ऐसी हवा में पीटर्सबर्ग में पानी ऊपर चढ़ने लगता है, आलिक.

ऐसे में पेत्रोपाव्लोव्स्की बुर्ज़ में हर पन्द्रह मिनट बाद घण्टे बजाये जाते हैं, मगर उन्हें कोई सुनता ही नहीं है.

लोग तोप के गोलों को सुनते हैं.

तोप के गोले दागे जाते हैं. एक. एक, दो. एक, दो, तीन...

ग्यारह बार.

बाढ़.

गर्म हवा, पीटर्स की ओर लपकते हुए, उसकी ओर पानी नेवा से ले जाती है.

मैं ख़ुश हूँ. और, पानी बढ़ता ही जा रहा है. और, सड़क पर हवा, आलिक, मेरी हवा, हमारी बसन्ती, पीटर्स की हवा!

पानी उफ़न रहा है.

उसने पूरे बर्लिन को डुबो दिया, और अण्डरग्राउण्ड रेल टनल में तैरने लगी, मरी हुई मछली के समान, पेट ऊपर किए.

वह एक्वेरियम से सारी मछलियों और मगरमच्छों को बहा ले गई.

मगरमच्छ तैर रहे हैं, बिना जागे, सिर्फ जबड़े भींचते हैं, कि ठण्ड है, और पानी सीढ़ियों पर चढ़ रहा है.

ग्यारह फुट. वह तुम्हारे कमरे में आ गया. आल्या के कमरे में पानी चुपके से घुस रहा है: सीढ़ियों पर पानी को कहीं और उछलने के लिए जगह ही नहीं है. मगर कमरे के भीतर पानी का स्वागत करती हैं आलिना की जूतियाँ.

आगे नाटक है.

जूतियाँ: तुम क्यों आये हो? आलिक सो रही है! (वे भी तुमसे प्यार करती हैं.)
पानी (धीमी आवाज़ में): ग्यारह फुट, जूतियों महोदया! पूरा बर्लिन पेट ऊपर किए तैर रहा है, लहरों पर सिर्फ हज़ार-हज़ार मार्क्स के नोट्स ही नज़र आ रहे हैं. हम – रूपक को कार्यान्वित कर रहे हैं. आल्या से कहना कि वह फिर से टापू पर है, अपयाज़ (OPOYAZ) 11 ने उसके घर की घेराबन्दी कर दी है * .
जूतियाँ: मज़ाक मत करो! आल्या सो रही है. बेवकूफ़ ऊँचे पानी! आल्या थक गई है. आल्या को फूल नहीं, फूलों की ख़ुशबू चाहिए. प्यार में से आल्या को सिर्फ प्यार की ख़ुशबू और नज़ाकत चाहिए. उसके कंधों पर इसके अलावा कोई और बोझ नहीं डाला जा सकता.
पानी: ओह, मेरी प्यारी मैडमों, आल्या की जूतियों! ग्यारह फुट. पानी बढ़ता ही जा रहा है. तोप के गोले दागे जा रहे हैं. गरम हवा यहाँ घुसी चली आ रही है, और हमें समुन्दर की ओर नहीं जाने दे रही है. वास्तविक प्यार की गरम हवा. ग्यारह फुट. हवा इतनी तेज़ है कि पेड़ ज़मीनदोस्त हो गए हैं.
जूतियाँ: ओ, पराई पनचक्की वाले पानी. प्यार में ताक़त के अधिकार का इस्तेमाल करना अच्छी बात नहीं है!
पानी: ताक़तवर प्यार का अधिकार?
जूतियाँ: ताक़तवर प्यार का भी नहीं. हाँ. उसे ताक़त से मत सताओ. उसे ज़िन्दगी की भी ज़रूरत नहीं है. वो, मेरी आलिक, डान्स करना इसलिए पसन्द करती है, क्योंकि वह प्यार की परछाई होता है. प्यार आल्या से करो, अपने प्यार से नहीं.

और पानी वापस जाने लगता है, अपने साथ संशोधित पाण्डुलिपियों वाली सूटकेस लिए हुए. जब पानी चला जाता है, तो जूतियाँ एक दूसरे से कहती हैं:

 “ओह, परेशान कर दिया इन साहित्यकारों ने!”

जूतियाँ बुरी नहीं हैं, मगर वे दो हैं, और दो औरतें, अगर एक दूसरे की बगल में इतनी देर तक खड़ी रहेंगी, तो वे बकवाद किए बिना नहीं रहेंगी.

इस ख़त को मैंने लिखा और फिर से लिखा. अब तुम्हारे सम्मान में मैं इसकी नकल करूँगा.

इस तरह से ख़ुदा ने  “महाप्रलय” के सम्मान में इन्द्रधनुष दर्ज कर लिया.
     
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* रूसी में यह वाक्य है: opoyasan (घिर गया है) opoyazom(अपयाज़ से)

सोमवार, 25 मई 2015

Eighth Letter

पत्र आठवाँ
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तीन कामों के बारे में जो मुझे दिए गए हैं, “प्यार करते हो?” सवाल के बारे में, मेरे सुपरवाइज़र के बारे में, उस बारे में कि “डॉन-किखोत” कैसे बना; फिर पत्र महान रूसी लेखक के बारे में भाषण के बारे में बदल जाता है और मेरी सेवा की अवधि पर चिंतन से समाप्त होता है.  
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तुमने मुझे दो काम दिए हैं:
1) तुम्हें फ़ोन न करूँ, 2) तुमसे न मिलूँ.

और अब मैं व्यस्त इन्सान हूँ.

एक तीसरा काम भी है: तुम्हारे बारे में सोचूँ भी नहीं. मगर तुमने वह काम मुझे नहीं थमाया.
तुम ख़ुद ही कभी-कभी मुझसे पूछती हो: “प्यार करते हो?”

तब मैं जान जाता हूँ कि गार्ड्स की रोल-कॉल हो रही है. मैं इंजीनियरिंग कोर के सिपाही की लगन से, जो गैरिसन के तौर-तरीकों से अच्छी तरह वाक़िफ़ नहीं होता, जवाब देता हूँ:
 “गार्ड नंबर 3, शायद नंबर नहीं जानता, प्लेस ऑफ़ ड्यूटी – टेलिफोन के पास और Gedächtniskirche सड़क से Jorckstrasse ब्रिज तक, उसके आगे नहीं. ड्यूटी: प्यार करना, मुलाक़ात न करना, चिट्ठियाँ नहीं लिखना. और ये याद रखना कि ‘डॉन-किखोत” कैसे बनाया गया था.

 “डॉन-किखोत” गलती से बन गया, जेल में. उपहासात्मक नायक का उपयोग सेर्वान्तेस ने न सिर्फ मज़ाक़िया कारनामों को अंजाम देने के लिए किया, बल्कि बुद्धिमत्तापूर्ण सूक्तियों को बुलवाने में भी किया. तुम ख़ुद ही जानती हो, मिस्टर सुपरवाइज़र, कि अपने ख़तों को कहीं न कहीं तो भेजना ही पड़ता है ना. डॉन-किखोत को उपहार में मिली बुद्धिमत्ता, उपन्यास में उसके अलावा कोई और बुद्धिमान हो ही नहीं सकता था; बुद्धिमानी और बुद्धिहीनता के संयोग से ही डॉन-किखोत जैसे टाइप के पात्र का जन्म हुआ.

मैं और भी बहुत कुछ कह सकता था, मगर देख रहा हूँ कुछ झुकी हुई पीठ और ऊदबिलाव के छोटे स्कार्फ के सिरे. तुम उसे इस तरह बांधती हो जिससे गला ढंका रहे.

मैं अपनी ‘ड्यूटी वाली पोस्ट’ छोड़कर नहीं जा सकता.

सुपरवाइज़र फुर्ती से जाता है, कभी कभार वह दुकानों के पास ठहर जाता है.

शीशे से तीखी नोक वाले जूतों, लम्बे जनाना-दस्तानों, सफ़ेद पाइपिंग वाले काले रेशमी कुर्तों की ओर देखता है, जैसे बच्चे दुकान के शीशे से बड़ी ख़ूबसूरत गुड़िया को देखते हैं.

मैं आल्या की ओर इसी तरह देखता हूँ.

सूरज ऊपर-ऊपर जा रहा है, जैसा सेर्वान्तेस लिखता है: “अगर बेचारे स्पेनी सामंत के पास दिमाग़ होता, तो वह उसे पिघला देता.”

सूरज मेरे सिर के ऊपर है.

मैं नहीं डरता, मुझे मालूम है कि डॉन-किखोत को कैसे बनाया जाता है.

वह सशक्त बन पड़ा है.

हँसेगा तो सिर्फ वही, जो सबसे ज़्यादा सशक्त है.

किताब हँसती रहेगी.

और अब, जब मैं टेलिफोन के निकट अपनी ड्यूटी पर हूँ और उसे इस तरह छूता हूँ, जैसे बिल्ली बेहद गरम दूध को अपने पंजे से छूती है, मैं अपने डॉन-किखोत में एक और बुद्धिमत्तापूर्ण वाक्य घुसेड़ देता हूँ. बर्लिन में एक बड़ा आदमी जा रहा है. मैं उसे जानता हूँ, कई बार ग़लती से उससे अपना मफ़लर भी बदल लिया था.

जब वह बोलता है तो उसकी शांत आवाज़ एकदम अचानक ही किसी ओझा की चीख़ में बदल जाती है.

ऐसे ओझा को एक बार मॉस्को लाया गया था, ऐतिहासिक संग्रहालय में. सदियों पुरानी ओझाओं की संस्कृति से भली-भांति वाक़िफ़ होने के कारण, ओझा ज़रा भी नहीं घबराया. उसने अपनी लम्बी ढोलक उठाई और प्रोफेसरों के सामने जादू किया, आत्माएँ देखीं, समाधि अवस्था में चला गया.
फिर वह साइबेरिया चला गया जादू करने, मगर अब प्रोफेसरों के सामने नहीं.

उस इन्सान में, जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूँ, तन्मयता इस तरह रहती है जैसे फ्लैट में हो, न कि समर कॉटेज में. और कमरे के एक कोने में, चमड़े के बंधे हुए सूटकेस में, पड़ा है – बवण्डर.

उसका उपनाम है आन्द्रे बेली9.

दुनिया के लिए – बोरिस निकोलायेविच बुगायेव.

प्रोफेसर का बेटा है.

वेल्स ज़िन्दगी का वर्णन इस तरह करता है कि साफ़ पता चल जाता है कि वस्तुएँ इन्सान को नियंत्रित करती हैं.

वस्तुओं ने इन्सान को पुनर्जन्म दिया है, ख़ास तौर से कारों ने.

इन्सान उनमें सिर्फ चाभी भरना जानता है, और आगे वे ख़ुद-ब-ख़ुद चली जाती हैं. जाती हैं, जाती हैं और इन्सान को कुचल देती हैं.

विज्ञान के साथ, बात ज़रा संजीदा किस्म की है.

तर्क की आवश्यकता और प्रकृति में आवश्यकता अपनी-अपनी राहों पर चल दीं.

’ऊपर’ और ‘नीचे’ था, ‘समय’ था, भौतिक पदार्थ था.

अब कुछ भी नहीं है. दुनिया में राज करती है ‘विधा’.

इन्सान ने ‘विधा’ का आविष्कार किया.

विधा.

विधा घर से निकल गई और अपने आप रहने लगी.

”ईश्वरों का भोजन” * मिल गया है, मगर हम उसे खाते नहीं हैं.

वस्तुएँ और सब वस्तुओं में सबसे क्लिष्ट – विज्ञान – धरती पर चलती हैं.

हमारे लिए काम करने पर उन्हें कौन मजबूर करता है?

और क्या ये ज़रूरी है?

बेहतर है कि अनुपयोगी और अदृश्य, मगर नई वस्तुएँ बनाएँ.

कला में ‘विधा’ भी अलग-थलग चलती है.

एक इन्सान जो कोई बड़ी चीज़ लिख रहा है – तीन सौ हॉर्स-पॉवर वाली कार के ड्राइवर के समान है, जो, मानो ख़ुद ही उसे दीवार की ओर खींच कर ले जा रही है. ऐसी कारों के बारे में ड्राइवर्स कहते हैं: “ये तुम्हें बर्बाद कर देगी.”

मैंने कई बार आन्द्रे बेली – बोरिस बुगायेव – को देखा, और सोचा कि वह बहुत डरपोक है, आसानी से हर चीज़ से सहमत हो जाता है.

साँवले चेहरे के चारों ओर आधे-सफ़ेद बाल पूरे सफ़ेद नज़र आते हैं. जिस्म, शायद, मज़बूत है.
देख रही हो ना कि कैसे कमीज़ की आस्तीनें उसकी बाँहों से भरी-भरी हैं.

आँखें कुछ तिरछी-सी.

आन्द्रे बेली की विधा – बड़ी सशक्त थी, इतनी सशक्त कि ख़ुद उसे भी समझ में नहीं आती थी.

मेरा ख़याल है कि आन्द्रे बेली ने मज़ाक-मज़ाक में लिखना शुरू किया होगा.

 “सिम्फोनी”** भी मज़ाक ही था.   

शब्दों की बगल में शब्द रखता गया, मगर कलाकार ने उन्हें वैसे नहीं देखा, जैसे आम तौर से देखते हैं. मज़ाक ग़ायब हो गया, विधा का प्रादुर्भाव हुआ.

आख़िर में उसने इस प्रेरणा के लिए एक नाम भी ढूँढ़ लिया.

ये नाम है एंथ्रोपोसोफ़ी ***.

एंथ्रोपोसोफ़ी – छोटी सी चीज़ है और सिरों को जोड़ने के लिए बनाई गई है.

सम्राज्ञी कैथेरीन के शासनकाल में इसाकियेव्स्की कैथीड्रल का निर्माण किया गया, और सम्राट पावेल के शासनकाल में ईंटों की कमानें बनाई गईं, बिना अनुपातों, पैमानों का ध्यान रखे.

सिर्फ इसलिए कि कोई परेशान न हो.

और जान जाए – कैथीड्रल का निर्माण पूरा हो चुका है.

आजकल समांतर रेखाओं को झुका कर और उसके सिरों को मिलाने के शौकीन बहुत मिल जाएँगे.
एंथ्रोपोसोफ़ी – ये शब्द वर्तमान समय के लिए बिल्कुल उचित नहीं है.

आजकल सत्ता की रेखाएँ हमारे भीतर नहीं छेदती हैं.

नई दुनिया का निर्माण तो आजकल हमारे लिए एक देखने भर की चीज़ है, वह हमारा काम नहीं है. क्रमशः खुलती जाती “सनकी आदमी की डायरी” में, जिसमें पद्य-गद्यकार भटकता है और किसी लक्ष्य को तलाशता है, मगर देखता नहीं है, असफ़ल, किंतु महत्वपूर्ण “बिलौटा लेताएव” में आन्द्रे बेली कई धरातलों का निर्माण करते हैं. एक मज़बूत है, लगभग वास्तविक, अन्य धरातल उस पर से गुज़रते हैं और उसकी छायाएँ प्रतीत होते हैं, फिर रोशनी के स्त्रोत बहुतेरे हैं, मगर ऐसा लगता है कि वे बहुत सारे धरातल ही वास्तविक हैं, और ये आख़िर वाला यूँ ही आ गया है. आत्मा की वास्तविकता न तो इसमें है, न ही औरों में, बस विधा है, वस्तुओं को क़तारों में रखने का तरीक़ा है.
ये है वह बुद्धिमत्तापूर्ण बात जिससे मैं ड्यूटी पर अपने आपको व्यस्त रखता हूँ. खड़ा हूँ, उकता रहा हूँ, नौजवान सैनिक की तरह, आने जाने वालों को गिनता हूँ. प्यार भरे शब्दों से अपने आपको मनाता हूँ:
 “सब्र कर, किसी और चीज़ के बारे में सोच, दूसरे बड़े और अभागे लोगों के बारे में. प्यार में अपमान नहीं होता. और कल, हो सकता है, सुपरवाइज़र फिर से आ जाए.

और मेरी ड्यूटी का टाइम?

कोई टाइम नहीं है – मैं अपनी ड्यूटी के साथ-साथ ही हूँ.
                  
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* H.G.Wells के उपन्यास The Food of The Gods से तात्पर्य है.
** आन्द्रे बेली की “उत्तरी सिम्फनी” से तात्पर्य है.

*** रुडोल्फ़ स्टैनर द्वारा प्रतिपादित एक दार्शनिक सिद्धांत. 

गुरुवार, 21 मई 2015

Seventh Letter


पत्र सातवाँ
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पत्र के साथ भेजे गए फूलों के लिए धन्यवाद के साथ.
ये आल्या का तीसरा पत्र है. 
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तो, तुम्हें ख़त लिख रही हूँ, प्यारे तातार्चुक, फूलों के लिए धन्यवाद.

कमरा ख़ुशबू से भर गया है, बेतहाशा महक रहा है, मैं सोने नहीं गई, उनसे जुदा होने में इत्ता दुख हो रहा था.

स्तंभों वाले, हथियारों वाले, उल्लू वाले इस बेहूदा कमरे में मुझे ऐसा लगता है, जैसे अपने घर में हूँ.
यहाँ की गर्माहट, ख़ुशबू, और ख़ामोशी - मेरी है.

मैं उन्हें ले जाऊँगी, आईने के प्रतिबिम्ब की तरह; जब चली जाऊँगी – वे नहीं होंगे, वापस आऊँगी, देखूंगी – वे फिर वहीं नज़र आएँगे.  

 यक़ीन नहीं होता कि आईने में वे तुम्हारी वजह से ही रहते हैं.

मेरी सबसे बड़ी ख़्वाहिश ये है कि गर्मियाँ हों, कि वो सब, जो था, - न हो.

कि मैं जवान और तन्दुरुस्त होती.

तब तो मगरमच्छ और बच्चे की जुगलबन्दी में सिर्फ बच्चा बचा रहता, और मैं सुखी हो जाती.

मैं अभागी औरत नहीं हूँ, मैं – आल्या हूँ, गुलाबी और भरे-भरे बदन वाली.

बस, इतना ही.

’किस’ यू, गुड नाइट.

आल्या

Sixth Letter


छठा पत्र
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हमारे आदिपुरुष की वेदना और क़ैद के बारे में. पत्र समाप्त होता है उसके लिए एक अख़बार छापने के विलम्बित प्रस्ताव से.
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ज़ू-पार्क के पिंजरों में बन्द जानवर बहुत ज़्यादा दुखी नहीं दिखाई देते.

वे पिल्ले भी पैदा करते हैं.

बब्बर शेर के पिल्लों को दूध पिलाकर बड़ा किया कुतियों ने, और बब्बर शेर के पिल्ले अपने ऊंचे वंश के बारे में जानते ही नहीं थे.

लकडबग्घे रात-दिन पिंजरों में घूमते रहते हैं.

लकड़बग्घे के चारों पंजे पेल्विस के काफ़ी नज़दीक होते हैं.

बूढ़े बब्बर शेर ‘बोर’ होते रहते हैं. शेर पिंजरे की बागड़ से लगे-लगे घूमते हैं.

हाथी अपनी चमड़ी की सरसराहट करते हैं.

रोएँ वाले ऊँट बेहद ख़ूबसूरत हैं. उनकी खाल गरम, ऊनी कोट जैसी है और सिर हल्का है. तुमसे मिलते जुलते हैं.

सर्दियों में सब बन्द होता है.

जानवरों की दृष्टि में यह कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं है.

एक्वेरियम बच गया.

बिजली से प्रकाशित और लेमोनेड जैसे नीले पानी में मछलियाँ तैर रही हैं. कुछ कुछ शीशों के पीछे तो बहुत भयानक नज़ारा है. सफ़ेद टहनियों वाला एक पैड़ बैठा है, और वह अपनी टहनियाँ हिला रहा है. दुनिया में इतनी पीड़ा का निर्माण करने की क्या ज़रूरत थी? इन्सान जैसे बन्दर को बेचा नहीं, बल्कि एक्वेरियम की ऊपरी मंज़िल पर बन्द करके रख दिया है. तुम बेहद व्यस्त हो, इतनी ज़्यादा व्यस्त हो कि अब मेरे पास पूरा समय ख़ाली है. मैं एक्वेरियम में जा रहा हूँ.

मुझे उसकी ज़रूरत है. अनुरूपता के लिए मुझे ज़ू की ज़रूरत होगी.

बन्दर, आल्या, क़रीब मेरे ही क़द का है, मगर उसके कंधे चौड़े हैं, वह झुका हुआ है और उसके हाथ लम्बे-लम्बे हैं. ऐसा नहीं लगता कि वह पिंजरे में बन्द है.

उसके रोएँ और नाक, जैसे टूटी हुई है. वह मुझे ऐसा प्रतीत होता है, मानो कोई क़ैदी हो.

और पिंजरा – पिंजरा नहीं, बल्कि जेलख़ाना हो.

पिंजरा दुहरी जालियों वाला है, और जालियों के बीच में, याद नहीं है कि आदमी चलता है या नहीं चलता?

बन्दर (वो मर्द बन्दर है) पूरे दिन उकताता रहता है. तीन बजे उसे खाना दिया जाता है. वह प्लेट में खाता है. कभी-कभी इसके बाद वह बन्दरोंवाला बोरिंग काम करता है. ये अपमानजंक और शर्मनाक है. तुम तो उससे ऐसे बर्ताव करते हो, जैसे इन्सानों के साथ करते हो, मगर वह बेशरम है.

बचे हुए समय में बन्दर पिंजरे पर चढ़ता है, पब्लिक पर नज़र डालते हुए. मुझे शक है, कि क्या हमारे इस दूर के रिश्तेदार को बिना मुक़दमे के जेल में बन्द रखने का अधिकार हमें है या नहीं. और, उसका काँसुल कहाँ है?

आख़िर, उकता रहा है बन्दर - बिना काम के. लोग उसे दुष्टात्माओं की तरह नज़र आते हैं. और पूरा दिन ये बेचारा ग़रीब विदेशी भीतरी ज़ू में उकताता रहता है.

उसके लिए कम से कम अख़बारों का प्रकाशन भी नहीं किया जाता.


P.S.  बन्दर मर गया.

Fifth Letter

पांचवाँ पत्र


----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------जिसमें अलेक्सेई मिखाइलोविच रेमिज़ोव का वर्णन है और उसका बोतलों में पानी भर-भरकर चौथी मंज़िल पर ले जाने का तरीका बताया गया है. यहीं महान बन्दरों के समाज की लाइफ़-स्टाइल और उसके तौर-तरीके बताए गए हैं. यहाँ मैंने कला की विषय-वस्तु के रूप में व्यक्तिगत पहलू की भूमिका पर अपनी सैद्धांतिक टिप्पणियाँ भी शामिल की हैं.
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तुम्हें मालूम है, कि बन्दरों के सम्राट असिकी – अलेक्सेई रेमिज़ोव6 – के साथ फिर अप्रिय घटनाएँ हो रही हैं: उसे फ्लैट से बाहर निकाल रहे हैं.

आदमी को अपनी मन मर्ज़ी के मुताबिक चैन से जीने भी नहीं देते. सन् 1919 की सर्दियों में रेमिज़ोव पीटर्सबुर्ग में रहता था, और उसके घर का नल अचानक टूट गया.

ऐसी हालत में कोई भी आदमी परेशान हो जाता. मगर रेमिज़ोव ने अपने सभी परिचितों के पास से बोतलें इकट्ठा कीं, हर तरह की बोतलें: छोटी- दवा वाली, वाइन वाली और जैसी भी मिलीं. उन्हें लाईन से कमरे में कालीन पर रख दिया, फिर दो-दो बोतलें लेकर पानी के लिए सीढ़ियों से नीचे भागता. इस तरह से सप्ताह के हर दिन के लिए पानी लाना होता है.

कितना असुविधाजनक है, मगर – है दिलचस्प!

रेमिज़ोव की ज़िन्दगी, - उसने ख़ुद ही अपनी पूँछ से उसे बनाया, - बेहद असुविधाजनक, मगर दिलचस्प है.          

उसका क़द छोटा है, बाल खूब घने और किसी साही की तरह ऊपर को उठाए हैं. झुक कर चलता है, मगर होंठ लाल-लाल हैं. नाक छोटी और चपटी, और हर चीज़ – जैसे जानबूझकर बनाई गई हो.

उसका पासपोर्ट बन्दरों जैसे चिह्नों से भर गया है. पानी का नल टूटने से पहले ही, रेमिज़ोव लोगों से दूर हो गया था, - उसे पहले ही से मालूम था कि वे कैसे पंछी हैं, - और वह महान बन्दर-लोक में चला गया.

बन्दर-समाज की नींव रेमिज़ोव ने रूसी-फ्री-मेसन पद्धति के आधार पर डाली थी. उसमें ब्लॉक7 था, फ़िलहाल इस महान और स्वतंत्र बन्दर-महल का संगीतज्ञ कुज़्मिन8 है, और ग्र्झेबिन9 – वो, गॉडफादर-बन्दर है, और अकाल और युद्धकालीन समय के दौरान इस समाज में उसका रैंक और ओहदा है सामान्य-प्रिन्स का.

मुझे भी इस बन्दर-पैक्ट में शामिल किया गया है, मैंने अपनी रैंक ख़ुद ही चुनी “छोटी पूँछ वाला छोटा बन्दर”. हेर्सोन में रेड-आर्मी में जाने से पहले अपनी पूँछ मैंने ख़ुद ही काट दी. चूंकि तुम एक सामान्य- विदेशन हो और तुम्हारे सूटकेस ये नहीं जानते कि उनकी मालकिन को लाल गालों वाली साइबेरियन स्तेशा ने दूध पिलाया था, तो तुम्हें यह भी बताना पड़ेगा कि बन्दर-लोक में सचमुच का सम्राट है. क़ाबिल सम्राट.

रेमिज़ोव की पत्नी है, बेहद रूसी, बेहद हल्के-भूरे बालों वाली, मज़बूत - सेराफ़िमा पाव्लोव्ना रेमिज़ोवा-दोव्गेल्लो; बर्लिन में वो ऐसे लगती है, जैसे सम्राट अलेक्सेइ मिखाइलोविच के समय के मॉस्को का कोई नीग्रो हो, इत्ती सफ़ेद और रूसी है वो.

ख़ुद रेमिज़िव का नाम भी अलेक्सेइ मिखाइलोविच है. उसने एक बार मुझसे कहा था:
 “मैं अपना उपन्यास “इवान इवानोविच मेज़ पर बैठा था” शुरू नहीं कर सकता.”

चूंकि मैं तुम्हारी इज़्ज़त करता हूँ, इसलिए तुम्हारे सामने भेद खोल रहा हूँ.

जैसे गाय घास खाती है, उसी तरह साहित्यिक विषय भी खाये जाते हैं, साहित्यिक विधाएँ जन्म लेती हैं और लुप्त हो जाती हैं.

लेखक हल जोतने वाला तो नहीं न हो सकता: वो बंजारा है और अपने झुण्ड और बीबी के साथ नई घास पर चला जाता है. हमारी बन्दरों की महान फ़ौज किप्लिंग की बिल्ली* की तरह छतों पर रहती है – “अपने आप”. 

आप ड्रेस पहनकर घूमती हैं, दिन पर दिन बीतते जाते हैं; किसी की हत्या करने या किसी से प्यार करने में आप पारंपरिक हैं. बन्दरों की फ़ौज उस जगह रात नहीं बिताती, जहाँ उसने दोपहर में भोजन किया हो, और सुबह की चाय उस जगह नहीं पीती, जहाँ वह सोई हो. वो हमेशा बिना क्वार्टर की होती है.

उसका काम है – नई चीज़ों का निर्माण करना. इस समय रेमिज़ोव बिना कथानक की किताब का निर्माण करना चाहता है, बिना इन्सान के भाग्य के, जो कथानक के मूल में होता है. कभी वह ऐसी किताब लिखता है, जो टुकड़ों से बनाई गई है, - ये “पत्रों में रूस” है, ये कई किताबों के उद्धरणों से बनी है, या फिर ऐसी किताब लिखता है, जो रोज़ानोव के पत्रों के आधार पर बढ़ती है.

पुराने तरीके से किताब नहीं लिखना चाहिए. इसे ब्लॉक जानता है, रोज़ानोव अच्छी तरह जानता था, गोर्की जानता है, जब वह समन्वय के बारे में नहीं सोच रहा होता है, और मैं, छोटी पूँछ वाला छोटा बन्दर, जानता हूँ.                 

हमने अपनी रचनाओं में नाम और पिता के नाम से परिचित, घनिष्ठता को सिर्फ इसी वजह से शामिल किया, कि कला में नई सामग्री की आवश्यकता होती है. रेमिज़ोव की नई कहानी में सोलोमन काप्लून, अन्द्रेयेव के ब्लॉक की मृत्यु पर विलाप में मारिया फ़्योदोरोव्ना – साहित्यिक रूप की आवश्यकता है.

बन्दरों की फ़ौज अपना काम साथ में ले जाती है. घोड़े की चाल से, तिरछे-तिरछे, मैंने तुम्हारी ज़िंदगी को पार कर लिया है, ये कैसे हुआ और अब कैसा है – तुम जानती हो; मगर आलिक, तुम मेरी किताब में इस तरह प्रकट होगी, जैसे अब्राम के बनाए अलाव पर था इसाक. और, क्या तुम्हें मालूम है कि अब्राम के नाम में ये एक अतिरिक्त ‘a’, ईश्वर ने उसे बड़े प्यार से दिया है? (रूसी में इस नाम को Abram के बदले Abraam लिखा गया है – अनु.)  ये अतिरिक्त स्वर ईश्वर को भी अच्छा उपहार प्रतीत हुआ.

आलिक, क्या तुम्हें ये मालूम है?

वैसे, तुम शिकार नहीं बनोगी, तुम्हारे बदले मैंने बलि का बकरा बन कर अपने सींग झाड़ियों में उलझा लिए हैं.

रेमिज़ोव का कमरा गुड़ियों से, ड्राईंग्स से भरा है, और रेमिज़ोव बैठा-बैठा सबको श्-श् करता है  “धीरे, - मालकिन” और ऊँगली ऊपर उठाता है. वह मालकिन से डरता नहीं है – वो खेलता है.
आज़ाद बन्दरों के लिए फुटपाथों पर चलना मुश्किल है, पराई ज़िन्दगी है. इन्सानी औरतें समझ में नहीं आतीं. इन्सानी लाइफ़-स्टाइल – भयानक, बेवकूफ़, ठस है, वह लचीली नहीं है.

हम लाइफ-स्टाइल को चुटकुलों में बदल देते हैं.

दुनिया के और अपने बीच छोटी-छोटी, अपनी-अपनी दुनियाएँ – ज़ू-पार्क्स बना लेते हैं.

हम आज़ादी चाहते हैं.

रेमिज़ोव कला की विधाओं से ज़िन्दगी जीता है.

अब लिखना बन्द करता हूँ, मुझे बेकरी भागना है केक के लिए. अभी मेरे पास कोई आने वाला है, फिर मुझे केक लाना है, फिर और किसी के घर जाना है, फिर पैसे ढूँढ़ना है, किताब बेचनी है, युवा लेखकों से बातचीत करनी है. कोई बात नहीं, बन्दरों की अर्थव्यवस्था में हर चीज़ ज़रूरी है. बाबेल की अव्यवस्था (बेमतलब का शोरगुल – अनु.) हमें पर्लियामेंट के मुक़ाबले ज़्यादा समझ में आती है, नोट करने के लिए हमारे अपने अपमान हैं, गुलाब और सैलाब हमारे यहाँ साथ-साथ चलते हैं, क्योंकि – तुकबन्दी है.

नहीं छोडूँगा मैं अपना लेखक का व्यवसाय, अपना छतों वाला आज़ाद रास्ता किसी यूरोपियन सूट, चमचमाते जूतों, विदेशी मुद्रा के लिए, आल्या के लिए भी नहीं.
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 *रुडयार्ड किप्लिंग की कहानी से.