सोमवार, 22 जून 2015

Fifteenth Letter

पत्र पन्द्रहवाँ
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आल्या का ये चौथा पत्र है, इस बारे में, कि वह कुछ नहीं चाहती.
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प्यारे, मैं उस दीवान पर बैठी हूँ, जो तुम्हें पसन्द नहीं है, और महसूस कर रही हूँ कि जब गर्माहट हो, सुख-सुविधा हो और कहीं भी दर्द नहीं हो रहा हो, तो कितना अच्छा लगता है!

अच्छी आदतों वाले बच्चों के समान सारी चीज़ें नियंत्रित-मौन धारण किए हैं.

फूल तो सीधे-सीधे कह रहे हैं : हमें मालूम है, मगर हम कहेंगे नहीं, - मगर वो क्या जानते हैं – ये पता नहीं!

ढेर किताबों का, जिन्हें मैं पढ़ सकती हूँ और नहीं पढ़ती; टेलिफ़ोन, जिसमें मैं बात कर सकती हूँ, और नहीं करती; पियानो, जिसे मैं बजा सकती हूँ, और नहीं बजाती; लोग, जिनसे मैं मिल सकती हूँ और नहीं मिलती; और तुम, जिससे मुझे प्यार करना चाहिए था और प्यार नहीं करती.

मगर बग़ैर किताबों के, बग़ैर फूलों के, बग़ैर पियानो के और बग़ैर तुम्हारे, मेरे अपने और प्यारे, मैं कितना रोती.

मैं गुड़ी-मुड़ी होकर बैठी हूँ, और पूरब की सच्ची औरत की तरह, मनन कर रही हूँ:

भट्टी के बेहूदा पैटर्न पर ध्यान लगाती हूँ, फूहड़पन से केतली की नकल करती हूँ – एक हाथ कमर पे, दूसरा मोड़ लेती हूँ, केतली की टोंटी जैसा, - और ख़ुश हो जाती हूँ, कि कितनी समानता है, आँखें सिकोड़ कर न जाने क्यों थरथराते सफ़ेद अज़ालिया के पौधे को देखती हूँ.

न तो किसी चीज़ के बारे में सोचती हूँ, न ही सपने देखती हूँ.

प्यारे, मैं तुम्हारा अपमान नहीं करती, प्लीज़, ऐसा मत सोचो कि मैं तुम्हें अपमानित करती हूँ. मुझे महसूस होता है कि मैं तुम्हें आत्मविश्वासपूर्ण लगने लगी हूँ; नहीं, मुझे मालूम है कि मैं किसी लायक नहीं हूँ, इस बात पर बहस करना बेकार है.

ख़रीदी हुई चीज़ें, बिना खुले, मेज़ पर  पड़ी हैं. कुछ दिन पहले तक तो मैं घर आते ही कपड़े उतार कर नई नाइट शर्ट पहन लेती थी, मगर अब वह, कागज़ में ही लिपटी हुई, मेज़ पर पड़ी है.

आल्या 

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