पत्र बारहवाँ
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यह सुबह छह से
दस बजे के बीच लिखा गया है.
समय की अधिकता
ने पत्र को लम्बा कर दिया है. उसमें तीन भाग हैं. उसमें महत्वपूर्ण है सिर्फ इस
बात का ज़िक्र कि बर्लिन के नाइट-क्लब की औरतों को फ़ोर्क पकड़ना आता है.
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सुबह के छह बजे
हैं,
खिड़की के बाहर,
कैसेराली पर, अभी अंधेरा है.
तुम्हें सिर्फ
साढ़े दस बजे ही फ़ोन कर सकता हूँ.
साढ़े चार
घण्टे, और फिर बीस ख़ाली घण्टे, जिनके दौरान – तुम्हारी आवाज़.
अपने कमरे से
मैं बेज़ार हो गया हूँ. मेरी राइटिंग टेबल, जिस पर मैं सिर्फ तुम्हें ख़त लिखता हूँ,
मुझे अच्छी नहीं लगती.
बैठा हूँ प्यार
में गिरफ़्तार, किसी टेलिग्राफ़िस्ट की तरह.
गिटार लेकर
गाना कितना अच्छा होता.
कम से कम बात
तो कर तू मुझसे,
सात तारों वाली
मेरी सहेली,
रूह है लबालब
ऐसे दर्द से,
और रात है कैसी
चाँद वाली.
रोज़ी-रोटी के
लिए कुछ तो लिखना होगा. मोटरबाईक्स के लिए कोई विज्ञापन.
तुम्हारे बारे
में, मोटरबाईक के बारे में, कार के बारे में ख़याल मेरे दिमाग़ में गड्ड-मड्ड हो रहे
हैं.
ख़त ही लिखूँगा.
फ़िल्म इंतज़ार कर सकती है.
मैं तुम्हें हर
रात लिखता हूँ, फिर उसे फ़ाड़ देता हूँ और डस्टबिन में डाल देता हूँ. ख़त सजीव हो
जाते हैं, बढ़ने लगते हैं, और मैं उन्हें नये सिरे से लिखता हूँ.
मेरा लिखा हुआ
हर ख़त तुम्हें मिल जाता है.
टूटे हुए
खिलौनों वाली तुम्हारी टोकरी में सबसे पहला वो है, जिसने तुम्हें, बिदा लेते हुए,
लाल फूल दिए थे. तुमने फ़ोन करके उसे धन्यवाद दिया था; और वो, जिसने तुम्हें पुखराज
का ताबीज़ दिया था, और वो, जिससे तुमने बड़े ख़ुश होकर स्टील के तारों का बुना हुआ छोटा
सा लेडीज़ पर्स स्वीकार किया था.
तुम्हारा आचरण
बिल्कुल एक जैसा है: प्रसन्नता से मुलाक़ात, फूल, आदमी का प्यार, जो (यहाँ
‘प्यार’ से तात्पर्य है – अनु.) हमेशा देर कर देता है, कार के सिलिंडर में
ताज़ी गैस के अवशोषण जैसा.
आदमी तब से एक
दिन बाद प्यार करना शुरू करता है, जब वह कहता है “आइ लव यू”.
इसलिए इस शब्द
को नहीं कहना चाहिए.
प्यार बढ़ता
जाता है, आदमी तपता रहता है, और तुम्हारा दिल उससे फिर जाता है.
कार की
टेक्नोलॉजी में इसे कहते हैं ‘प्री-रिलीज़”.
सिर्फ मैं, ख़त
की तरह फ़ाड़ा हुआ, तुम्हारे टूटे हुए खिलौनों की टोकरी से बाहर निकलता रहता हूँ.
मैं तुम्हारे दसियों शौक बर्दाश्त कर लूंगा, सुबह तुम मुझे फ़ाड देती हो, मगर रात
को मैं सजीव हो जाता हूँ, ख़तों की तरह.
अभी तक सुबह
नहीं हुई है, और मैं अभी से अपनी गार्ड-ड्यूटी पर आ गया हूँ.
सड़क की तरफ़ की
खिड़की खुली है.
कारें भी जाग
गई हैं, या अभी तक सोई नहीं हैं.
आल्, आल् एल्,
- वे चीख़ती हैं: उन्हें तुम्हारा नाम लेना अच्छा लगता है.
अपनी बीमारी
वाले कमरे में बैठा हूँ, तुम्हारे बारे में, कारों के बारे में सोच रहा हूँ. ये
ज़्यादा मज़ाहिया लगता है.
तुमने मेरी
ज़िन्दगी को उसी तरह घुमा दिया है, जैसे दाँतों वाला स्क्रू गियर घुमा देता
है.
गियर तो स्टीयरिंग व्हील नहीं घुमा सकता. टेक्नोलॉजी
में इसे कहते हैं: अ-पलट ड्राईव. अ-पलट है मेरा भाग्य.
सिर्फ समय ही,
जैसा कि ओडेसा के पहेली-गीत में गाते हैं, जिसे लीव्शित्स ने बनाया था, मेरा अपना
है: मैं इंतज़ार के समय को घण्टों में, मिनटों में, बाँट सकता हूँ, उन्हें गिन सकता
हूँ. मैं इंतज़ार कर रहा हूँ, इंतज़ार कर रहा हूँ. अफ़सोस, गिटार नहीं है.
मुझे किसका
इंतज़ार है? मैं सूरज का इंतज़ार करूँगा. सूरज क़रीब आठ बजे उठेगा. कैसेराली को रोशन
करेगा, और सड़क कामेन्नाओस्त्रोव्स्की-प्रॉस्पेक्ट जैसी लगने लगेगी.
पीटर्सबुर्ग के
कामेन्नाओस्त्रोव्स्की-प्रॉस्पेक्ट में वह स्कूल था, जिसे मैंने पूरा किया था.
वह कोई-सा साल
था, ओह, शायद, 1913. हम स्कूल के अंतिम वर्ष में थे. हम शिद्दत से स्कूल ख़त्म करके
बाहर रास्ते पर घूमना चाहते थे, लकड़ी के पहिए जैसे कलाबाज़ी खाते हुए.
हवा तमन्नाओं
से सराबोर थी, वे कामेन्नाओस्त्रोव्स्की पर तैरतीं - परों से, पंखों से. बादल परों
जैसे थे.
हम जल्दी से
जल्दी ज़िन्दगी को पकड़ना चाहते थे. मगर हम शब्दों से अनजान थे, सोचते थे कि औरत को
किसी चीज़ की तरह हाथ में पकड़ा जा सकता है.
गर्म या ठण्डे
हाथों से ज़िन्दगी को पकड़ने चले थे.
अलग-अलग चीज़ों में
प्यार पहचानना चाहते थे. स्कूल की गेट-टुगेदर में तार काट देते थे, और अगर बहुत ही
ज़्यादा बहक जाते, तो शौक से अपने आपको गोली मार लेते, मानो एक और चीज़ जानना चाहते
थे. इन मौतों की आदत थी. हम, morituri थे, मतलब, वो थे जिन्हें मरना ही था.
Morituri सिर्फ एक और चीज़
आज़माना चाहते थे.
नहीं, बेहतर है कि कमरे में ही
बैठूँ, सुबह छह बजे न सोऊँ, सात बजे फूलों के लिए बाज़ार जाऊँ. बेहतर है कि सारी
ज़िन्दगी गिटार के साथ गुज़ार दूँ.
बर्लिन के नाइट-क्लब्स विचित्र हैं.
मैं Nachtlokal पहुँच गया.
कमरा साधारण ही था, दीवारों पर तस्वीरें लटक रही थीं.
किचन की गंध आ
रही थी. पियानो घुटी-घुटी आवाज़ में बज रहा था. वायलिन वादक बड़े भद्दे तरीक़े से एक
विचित्र, नक्काशी वाले वॉयलिन पर रोनी धुन बजा रहा था. पब्लिक ख़ामोश नशे में धुत
थी. सिर्फ काली स्टॉकिंग्स वाली एक नग्न औरत बाहर आती है और फूहड़पन से हाथों को
फेंकते हुए नाचने लगती है; फिर दूसरी औरत बाहर आती है, बिना स्टॉकिंग्स वाली.
मुझे मालूम
नहीं था कि हमारे अलावा कमरे में और कौन-कौन था. वॉयलिन-वादक मेज़ों का चक्कर लगाता
है, पैसे इकट्ठा करता है. वह कोने में बैठे हुए उदास नशे में धुत आदमी के पास जाता
है. वह उससे कुछ कहता है.
वॉयलिन-वादक
अपना बिना सीने वाला वॉयलिन लेता है, और हवा में पतली-बेहद पतली ’गॉड सेव द किंग’
की धुन तैरने लगती है. कई दिनों से मैंने यह गीत नहीं सुना था.
उस औरत ने अपना
काम ख़त्म किया, एक बढ़िया, तैयार ड्रेस पहनी और अब वह हमारी बगल वाली मेज़ पर बैठी
हुई कुछ खा रही है.
“देखो, उसे फ़ोर्क
भी पकड़ना आता है,” बगातीरेव ने मुझसे कहा.
खाने का सलीक़ा
हमारे लिए एक फ़ैशनेबल सवाल था.
हम घर जाने
लगे. वार्ड-रोब में किसी औरत ने हमें कोट दिया. कूपन देते हुए मैं उसके चेहरे को
ग़ौर से देखता हूँ. ये वही थी, जो अभी-अभी स्टॉकिंग्स पहनकर डान्स कर रही थी. हर
चीज़ बड़ी पोर्टॆबल थी और शायद पारिवारिक मामला था. व्यभिचार का नामोनिशान नहीं था.
कुछ लोग होते हैं शब्दों वाले और कुछ बिन शब्दों के. शब्दों वाले लोग जाते नहीं
हैं, और, मेरा यक़ीन करो, मैंने ख़ुशी से अपनी ज़िन्दगी जी है.
बिना शब्दों के
तल से कुछ भी निकालना संभव नहीं है.
रोशनी हो रही
है, मुझे लिखना बन्द करने की कोई ज़रूरत नहीं है. वक़्त मेरा है. लीव्शित्स सही कहता
है.
मेरा निद्राहीन
ख़त टुकड़ों में बिखर गया है. फाड़ने से पहले इसे जोड़ लूँगा.
ईश्वर से
संबंधित एक परीकथा में ईश्वर समुद्र की तह से कुछ रेत लाना चाहता है.
मगर ईश्वर ख़ुद
पानी में डुबकी लगाना नहीं चाहता. वह शैतान को भेजता है और उसे हिदायत देता है:
“जब रेत लेने लगो, तो कहना – मैं नहीं ले रहा, ईश्वर ले रहा है.”
शैतान ने
बिल्कुल तली तक डुबकी लगाई, तली पर घूमता रहा, रेत उठाई और बोला:
“ईश्वर नहीं ले
रहा - मैं ले रहा हूँ”.
ख़ुद से प्यार
करने वाला शैतान.
रेत हाथ में ही
नहीं आती. नीला होकर शैतान बाहर आया.
ईश्वर ने उसे
फिर से पानी में भेजा.
शैतान तल तक
गया, रेत को नाखूनों से खुरचा, बोला:
“ईश्वर नहीं ले रहा – मैं ले रहा हूँ”.
रेत मिलती ही
नहीं है. गहरी-गहरी साँसें लेते हुए बाहर आया. ईश्वर ने उसे तीसरी बार पानी में
भेजा.
परीकथाओं में
हर चीज़ तीन बार होती है.
शैतान ने देखा – कोई अन्य चारा ही नहीं है.
वह कथावस्तु को
बिगाड़ना नहीं चाहता था. रोने लगा, हो सकता है, और पानी में डुबकी लगाई. तैर कर तल
तक पहुँचा और बोला:
“मैं नहीं ले रहा – ईश्वर ले रहा है”. रेत उठाई
और तैर कर बाहर आ गया. और ईश्वर ने उस रेत से, जिसे ईश्वर की आज्ञा से शैतान तल से
लाया था, इन्सान का निर्माण किया.
आगे लिखने का
मन नहीं है. मुझे ख़तों की ज़रूरत नहीं है. मुझे गिटार की भी ज़रूरत नहीं है. और मुझे
इस बात से भी कोई फ़रक नहीं पड़ता कि मेरा प्यार अ-पलट ड्राईव जैसा है या नहीं.
मेरे लिए सब
कुछ एक जैसा है. मुझे मालूम है: तुम मेरा ख़त अपनी मेज़ की दाईं ओर वाली टोकरी में
भी नहीं रखोगी.
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