पत्र चौदहवाँ
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इवान पूनी और उसकी बीबी, क्साना बगुस्लाव्स्काया
के बारे में.
इस बारे में कि कलाकार कितनी नज़ाकत से प्यार
करता है और कितनी नज़ाकत से कलाकार से प्यार करना चाहिए, पूनी के दोस्तों के बारे
में, और इस बारे में कि किताबें और तस्वीरें कैसे जन्म लेती हैं.
पत्र का मज़मून उपदेशात्मक है.
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ख़तों में भी,
कागज़ के आधे नक़ाब से होकर भी, जो मैंने तुम्हें पहना दिया है, सपने में भी मेरे
लिए मुश्किल है तुम्हारा चेहरा देखना.
ऐ, बिना हुनर
वाली औरत, तुम अपना समय कैसे बिताती हो? आल्या, क्या लोगों के मुँह से निवाला
छीनकर उसे कुत्तों को खिलाना अच्छी बात है?
आख़िर, वे
कुत्ते हैं, फ़ूहड़ और कुत्ते.
मेरे लिए
बर्लिन तुम्हारे नाम से घिरा है.
दुनिया की
ख़बरें नहीं पहुँचती हैं.
क्साना बगुस्लाव्स्काया-पूनी
को दिफ़्तेरिया हो गया है. बेचारी बच्ची, बेचारी कलाकार और बीबी कलाकार की! तुमसे
मिलने से पहले मैंने उसे और उसके पति को ध्यान से देखा था.
वान्या पूनी को
दस साल से जानता हूँ, “ट्राम-B” से – ये प्रदर्शनी
का नाम है.
वह अपने आस-पास की कोई चीज़ नहीं देखता, हालाँकि वह प्यार में गिरफ़्तार नहीं
है, वह, शायद किसी से भी प्यार नहीं करता और लोगों की तरफ़ आकर्षित नहीं होता,
बल्कि बड़ी उदासीनता से उनका स्वागत करना जानता है.
उसका बस एक ही दर्दभरा प्यार है – तस्वीरों के प्रति. जैसे मैं तुम्हें
प्रसन्नता से प्यार न कर सका, वैसी ही
अप्रसन्नता से पूनी ज़िन्दगी भर के लिए कला से प्यार करता है.
मेरी नज़रों में तुम कभी भी सही नहीं हो सकतीं, क्योंकि तुम्हारे पास न तो
कोई हुनर है, न प्यार, और अगर नैतिकता है, तो वह उसकी हिफ़ाज़त नहीं कर सकती, जो ख़ुद
इतना दृढ़ है.
आख़िर उस इन्सान को सही होने की क्या ज़रूरत है, जो पल-पल मुझसे कहता है:
“मैंने तो तुमसे नहीं कहा था कि मुझसे प्यार करो” और मुझे एक किनारे हटा देता है?
चौंको मत, कि मैं क्यों ऐसे चीख़ रहा हूँ, जबकि तुमने मुझे कोई चोट नहीं
पहुँचाई है.
तुम्हारे माध्यम से मैंने साक्षेपता के सिद्धांत को जाना. कल्पना करो गलिवर
की, जब वह महाकाय व्यक्तियों के बीच फंस गया था: एक महाकाय औरत ने उसे हाथ में
पकड़ा है – कुछ-कुछ, क़रीब-क़रीब नहीं पकड़ा है, बल्कि छोड़ना भूल गई है, और अब, बस,
छोड़ने ही वाली है, और बेचारा गलिवर डर के मारे चिल्ला रहा है, फ़ोन कर रहा है –
मुझे मत फेंक!
इवान पूनी अपनी तस्वीरों के प्यार में मगन है; दर्द भरी नज़रों से वह कला के
भविष्य की ओर देखता है, उसके लिए कोई भी चीज़ आसान नहीं है, और आने वाले दिन के
प्यार पर उसे यक़ीन नहीं है.
एक बार रात को मैं उसके यहाँ पहुँचा, साथ में था रोमान याकोब्सन, कार्ल
आइन्स्टीन, बगातीरेव और एक और व्यक्ति.
रात का क़रीब एक या दो बजा होगा, याद नहीं है; पूनी अपने स्टुडियो में काम कर
रहा था. फ़र्श पर, कुर्सियों पर, पलंग पर रंगों की ट्यूब्स बिखरी पड़ी थीं.
उसने बगैर किसी प्रसन्नता के, बिना अचरज के हमारा स्वागत किया, मानो हम –
यात्री हों, और उसका कमरा – कम्पार्टमेंट.
हमने काफ़ी चीज़ों के बारे में बातें कीं, सभी कड़वाहट भरी बातें.
नुक्कड से आलू ख़रीदे, उन्हें खाया. पूनी ने मक्खन दिया, आलू उबाले, मगर
हमारी ओर ध्यान नहीं दिया. वह बड़े ग़ौर से और दुख से तस्वीर की ओर देखता रहा.
मगर एक बार मैंने उसे अपनी तस्वीर के सामने ठहाका लगाते हुए देखा था; वह
रचना के ऊपर उसी तरह हँस सकता है, जैसे व्यंग्य पर हँस रहा हो.
क्साना बगुस्लाव्स्काया – कलाकार की बीबी है और ख़ुद भी कलाकार है.
वह ठीक-ठाक, हालाँकि मिठास भरी कलाकार है, अच्छी ही है, क्योंकि उसकी मिठास
अनुभूतिपूर्ण है –उसकी विधा मिठास है, न कि आँसू.
और उसकी सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि वह अपने पति के चित्रों से बहुत प्यार
करती है. हर विकल्प से उसे ईर्ष्या होती है, ये सोच-सोचकर परेशान होती रहती है कि
आगे क्या होगा.
मगर ज़िन्दा रहने के लिए कलाकार को हल्की-फुल्की चीज़ें बनानी पड़ती हैं. इस
हल्के-फुल्के काम से कंधों में दर्द होने लगता है. असल तस्वीरों को बेचना तो
मुमकिन नहीं है, या, यूँ कहिए कि जब तक वे मशहूर नहीं होतीं, तब तक बर्दाश्त करना
पड़ता है. ये इंतज़ार बेहद लम्बा भी हो सकता है. हम अक्सर मज़ाक में पूनी के घर को “पवित्र
परिवार” कहते थे, और कभी-कभी – “सीमित ज़िम्मेदारियों वाला बिज़नेस-हाउस” कहते. मगर परिवार
तो वाक़ई में पवित्र है: अगर हर बात को बर्लिन की भाषा से प्राचीन भाषा में अनुवादित
किया जाए, तो ये जानकारी मिलेगी: इजिप्ट में पलायन, फिर क्साना बनेगी यूसुफ़, पूनी –
माँ और तस्वीर – नन्हा बच्चा.
हर उस आदमी के लिए जीना मुश्किल है, जो औरत से या अपनी कला से प्यार करता है.
पूनी के पास उसके दोस्त आते हैं: सफ़ेद बालों वाला जर्मन फ्रिग अपनी ख़ूबसूरत बीबी
के साथ, लात्वियन कार्ल ज़ालित, जो चौथी शताब्दी
वाले अफ्रिकन क्रिश्चन जैसा शोर मचाता है, आर्नोल्ड ज़ेर्काल, ख़ामोश तबियत, स्वीडिश
जैसा, भारी-भरकम, बढ़िया कपडों में, शक्तिशाली और मुझे समझ में न आने वाला. रूनी बेलिंग
भी आता है, फ्रांसीसी जैसा जर्मन, शिल्पकार, डील डौल से टिड्डे जैसा; बर्लिन की शो-केसेस
में जो एक्स्प्रेशनिस्ट पुतले हैं वे उसीके मॉडेल्स पर आधारित हैं.
ये सब लोग, जब तस्वीरें देखते हैं, तो ख़ामोश और शांत होते हैं. और क्साना प्यार
भरी नज़रों से कॅनवास को देखती रहती है. पूनी हमेशा खूब काम करता था.
तस्वीरें उसे खा रही हैं. काम करना कितना मुश्किल है!
और चीज़ें पैदा होती रहती हैं, बच्चों के समान.
उनका गर्भधारण प्रसन्नता से होता है, प्रसन्नता से और बिना शर्म के, गर्भ में
उन्हें उठाए रखना कठिन है, उनका प्रसव होता है पीड़ा से, और फिर वे जीती हैं कड़वाहट
से.
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