शुक्रवार, 26 जून 2015

Sixteenth Letter

पत्र सोलहवाँ

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इस पत्र में आल्या की ट्रान्सएटलांटिक स्टीमर्स के बारे में की गई टिप्पणी को आगे बढ़ाया गया है, डेक पर होने वाले डान्स के बारे में, कारों के बारे में, बोरिस पास्तरनाक के बारे में, मॉस्को के पब्लिशिंग हाउस के बारे में और हमारे भविष्य के बारे में लिखा गया है.
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तुमने मुझे बड़ी अच्छी तरह से ट्रान्सएटलांटिक स्टीमर के बारे में बताया. ख़ैर, तुम्हारे लब्ज़ों के लिए मैं – गुल्लक हूँ. तुमने बताया कि ऐसे स्टीमर में पूरे समय महसूस करते हो कि वह कैसे आपको खींचता है. गति को नहीं, बल्कि कर्षण को, वेग और वेग के सामर्थ्य को. कार चलाने वाले को यह बात समझ में आ जाती है. कारों का कर्षण अलग-अलग तरह से होता है.

बढ़िया कार तुम्हारी पीठ को आराम से सहारा देती है, जैसे हथेली से तुम्हें थोड़ा धक्का दे रही हो. अच्छी कार का प्रमुख आकर्षण होता है – उसके कर्षण का गुण, पॉवर के बढ़ते जाने का गुण. ये एहसास, आवाज़ के ऊँचे होते जाने जैसा होता है. ‘फिएट’ की कर्षण-आवाज़ बड़े प्यार से ऊँची होती जाती है. एक्सेलेरेटर दबाओ, और कार उत्तेजित होकर तुम्हें फुर्ती से ले चलती है. ऐसी भी कारें होती हैं जो बड़ी पॉवर से, मगर कठोरता से चलती हैं, ख़ास तौर से मुझे ऐसी एक कार की याद है : साठ-पॉवर वाली ‘मिशेल’. कार में हर एहसास अलग ही तरह का होता है: या तो तुम कर्षण और शांति का अनुभव करते हो, या फिर कर्षण और पीड़ा का. मगर हर बात तुम पर प्रभाव डाल रही गति पर निर्भर करती है.

ट्रान्सएटलांटिक स्टीमर को मैंने नहीं देखा है. मगर मुझे वह अच्छा लगता है और मैं उसे समझ सकता हूँ. हो सकता है, चलते हुए फ़र्श पर डान्स करना, चुम्बन लेना और सोचना बहुत अच्छा लगता होगा, जब ख़याल गति से कुछ पिछड़ जाते हैं, जैसे लिफ्ट के नीचे उतरते समय दिल पीछे रह जाता है.   

ये संगीत के प्रभाव में आने वाले ख़यालों जैसा, मगर बेहतर है. ये “युद्ध और शांति” में हो रही दोलोखोव की बातचीत जैसा है जब “आह, मेरा पोर्च, मेरा पोर्च!” गीत के कारण वह अपने साथी से बहस नहीं कर पा रहा था.

नई ज़िन्दगी, नए अनुभवों का जन्म हो रहा है, सभी लोग उन पर ग़ौर नहीं करते हैं. हमारी धरती को रस्सियों से कहीं खींचा जा रहा है. एक बार तुम्हारी बहन मॉस्को-प्रकाशन हाउस में बैठी थी. शायद काफ़ी ठण्ड थी, अख़बारी दुनिया के काफ़ी लोग थे. वह पास्तरनाक, बोरिस, के साथ बैठी थी. वह हमेशा की तरह ही बात कर रहा था,  शब्दों के गुच्छे कभी एक ओर, तो कभी दूसरी ओर फेंक रहा था, और सबसे ख़ास बात कही ही नहीं गई. सबसे ख़ास शब्द.

मगर ख़ुद पास्तरनाक इतना अच्छा था कि मैं अभी उसका वर्णन कर देता हूँ. उसका सिर अण्डे के आकार के पत्थर जैसा है, ठोस, मज़बूत, सीना - चौड़ा, आँखें - भूरी. मरीना त्स्वेतायेवा कहती है पास्तरनाक एक ही साथ अरब के और उसके घोड़े के समान है. पास्तरनाक को हमेशा कहीं छिटकने की जल्दी होती है, मगर उन्माद से नहीं, बल्कि जैसे वह कहीं खिंचा जा रहा हो, किसी मज़बूत और जोशीले घोड़े की तरह. वह चलता है, मगर उसका दिल तीर की तरह लपकने को चाहता है, सामने, दूर, पैरों से छलांगें लगाते हुए. कई सारे न समझ में आने वाले शब्दों के बाद पास्तरनाक ने तुम्हारी बहन से कहा:
 “जानती हैं, हम जैसे किसी स्टीमर में हैं.”

ओवरकोट पहने, पब्लिकेशन हाउस के पास वाले काऊंटर पर सैण्डविच खाने वाले लोगों के बीच, यह आदमी इतिहास के कर्षण को महसूस करता है. वह गति को महसूस करता है, अपने कर्षण के कारण उसकी कविताएँ ख़ूबसूरत होती हैं, उनकी पंक्तियाँ छिटकने को बेताब हैं, और ठहर नहीं सकतीं, स्टील की स्प्रिंग्स की तरह, वे एक दूसरे से टकराती, एक दूसरे को धकेलती जाती हैं, अचानक ब्रेक लगाई गई ट्रेन के डिब्बों की तरह. अच्छी कविताएँ हैं.

बर्लिन में पास्तरनाक उत्तेजित हो जाता है. वह पश्चिमी संस्कृति का इन्सान है, कम से कम, उसे समझता है, पहले भी जर्मनी में रह चुका है, अभी उसके साथ जवान, सुन्दर बीबी है, - वह काफ़ी उत्तेजित है. पत्र का निष्कर्ष निकालने की दृष्टि से नहीं, बल्कि सच में कहता हूँ, मुझे लगता है कि वह हमारे बीच कर्षण के अभाव को महसूस करता है. हम शरणार्थी हैं – नहीं, हम शरणार्थी नहीं हैं, हम भाग कर आए हैं, और अब यहाँ घुलमिल गए हैं.

फ़िलहाल इतना ही.

रूसी बर्लिन कहीं नहीं जाएगा. उसका कोई भविष्य नहीं है.

कोई कर्षण नहीं.



कितनी स्पष्टता से मैं इसे महसूस करता हूँ. हो सकता है, तुम्हें अनजान लोग आकर्षित करते हों, अंग्रेज़, अमेरिकन, हो सकता है, हमारे साथ तुम ‘बोर’ हो जाती हो, क्योंकि तुम भी इसे महसूस करती हो. उन लोगों के पास यांत्रिक कर्षण है, ट्रान्सएटलांटिक स्टीमर का कर्षण, जिसके डेक पर डान्स करना जिम्मी को अच्छा लगता है. हम अपनी औरतों को खोते जा रहे हैं. अपने बारे में सोचने का वक़्त आ गया है. हम, मर्द लोग, इन्टर्नल कम्बस्शन वाले इंजिन हैं, हमारा काम नौका को खींचना है. डेक के लिए हमारे पास डान्स वाले जूते नहीं हैं.

सोमवार, 22 जून 2015

Fifteenth Letter

पत्र पन्द्रहवाँ
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आल्या का ये चौथा पत्र है, इस बारे में, कि वह कुछ नहीं चाहती.
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प्यारे, मैं उस दीवान पर बैठी हूँ, जो तुम्हें पसन्द नहीं है, और महसूस कर रही हूँ कि जब गर्माहट हो, सुख-सुविधा हो और कहीं भी दर्द नहीं हो रहा हो, तो कितना अच्छा लगता है!

अच्छी आदतों वाले बच्चों के समान सारी चीज़ें नियंत्रित-मौन धारण किए हैं.

फूल तो सीधे-सीधे कह रहे हैं : हमें मालूम है, मगर हम कहेंगे नहीं, - मगर वो क्या जानते हैं – ये पता नहीं!

ढेर किताबों का, जिन्हें मैं पढ़ सकती हूँ और नहीं पढ़ती; टेलिफ़ोन, जिसमें मैं बात कर सकती हूँ, और नहीं करती; पियानो, जिसे मैं बजा सकती हूँ, और नहीं बजाती; लोग, जिनसे मैं मिल सकती हूँ और नहीं मिलती; और तुम, जिससे मुझे प्यार करना चाहिए था और प्यार नहीं करती.

मगर बग़ैर किताबों के, बग़ैर फूलों के, बग़ैर पियानो के और बग़ैर तुम्हारे, मेरे अपने और प्यारे, मैं कितना रोती.

मैं गुड़ी-मुड़ी होकर बैठी हूँ, और पूरब की सच्ची औरत की तरह, मनन कर रही हूँ:

भट्टी के बेहूदा पैटर्न पर ध्यान लगाती हूँ, फूहड़पन से केतली की नकल करती हूँ – एक हाथ कमर पे, दूसरा मोड़ लेती हूँ, केतली की टोंटी जैसा, - और ख़ुश हो जाती हूँ, कि कितनी समानता है, आँखें सिकोड़ कर न जाने क्यों थरथराते सफ़ेद अज़ालिया के पौधे को देखती हूँ.

न तो किसी चीज़ के बारे में सोचती हूँ, न ही सपने देखती हूँ.

प्यारे, मैं तुम्हारा अपमान नहीं करती, प्लीज़, ऐसा मत सोचो कि मैं तुम्हें अपमानित करती हूँ. मुझे महसूस होता है कि मैं तुम्हें आत्मविश्वासपूर्ण लगने लगी हूँ; नहीं, मुझे मालूम है कि मैं किसी लायक नहीं हूँ, इस बात पर बहस करना बेकार है.

ख़रीदी हुई चीज़ें, बिना खुले, मेज़ पर  पड़ी हैं. कुछ दिन पहले तक तो मैं घर आते ही कपड़े उतार कर नई नाइट शर्ट पहन लेती थी, मगर अब वह, कागज़ में ही लिपटी हुई, मेज़ पर पड़ी है.

आल्या 

रविवार, 21 जून 2015

Fourteenth Letter

पत्र चौदहवाँ
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इवान पूनी और उसकी बीबी, क्साना बगुस्लाव्स्काया के बारे में.
इस बारे में कि कलाकार कितनी नज़ाकत से प्यार करता है और कितनी नज़ाकत से कलाकार से प्यार करना चाहिए, पूनी के दोस्तों के बारे में, और इस बारे में कि किताबें और तस्वीरें कैसे जन्म लेती हैं.
पत्र का मज़मून उपदेशात्मक है.
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ख़तों में भी, कागज़ के आधे नक़ाब से होकर भी, जो मैंने तुम्हें पहना दिया है, सपने में भी मेरे लिए मुश्किल है तुम्हारा चेहरा देखना.

ऐ, बिना हुनर वाली औरत, तुम अपना समय कैसे बिताती हो? आल्या, क्या लोगों के मुँह से निवाला छीनकर उसे कुत्तों को खिलाना अच्छी बात है?

आख़िर, वे कुत्ते हैं, फ़ूहड़ और कुत्ते.

मेरे लिए बर्लिन तुम्हारे नाम से घिरा है.

दुनिया की ख़बरें नहीं पहुँचती हैं.

क्साना बगुस्लाव्स्काया-पूनी को दिफ़्तेरिया हो गया है. बेचारी बच्ची, बेचारी कलाकार और बीबी कलाकार की! तुमसे मिलने से पहले मैंने उसे और उसके पति को ध्यान से देखा था.

वान्या पूनी को दस साल से जानता हूँ,  “ट्राम-B” से – ये प्रदर्शनी का नाम है.

वह अपने आस-पास की कोई चीज़ नहीं देखता, हालाँकि वह प्यार में गिरफ़्तार नहीं है, वह, शायद किसी से भी प्यार नहीं करता और लोगों की तरफ़ आकर्षित नहीं होता, बल्कि बड़ी उदासीनता से उनका स्वागत करना जानता है.

उसका बस एक ही दर्दभरा प्यार है – तस्वीरों के प्रति. जैसे मैं तुम्हें प्रसन्नता से प्यार न कर सका, वैसी  ही अप्रसन्नता से पूनी ज़िन्दगी भर के लिए कला से प्यार करता है.

मेरी नज़रों में तुम कभी भी सही नहीं हो सकतीं, क्योंकि तुम्हारे पास न तो कोई हुनर है, न प्यार, और अगर नैतिकता है, तो वह उसकी हिफ़ाज़त नहीं कर सकती, जो ख़ुद इतना दृढ़ है.

आख़िर उस इन्सान को सही होने की क्या ज़रूरत है, जो पल-पल मुझसे कहता है: “मैंने तो तुमसे नहीं कहा था कि मुझसे प्यार करो” और मुझे एक किनारे हटा देता है?

चौंको मत, कि मैं क्यों ऐसे चीख़ रहा हूँ, जबकि तुमने मुझे कोई चोट नहीं पहुँचाई है.

तुम्हारे माध्यम से मैंने साक्षेपता के सिद्धांत को जाना. कल्पना करो गलिवर की, जब वह महाकाय व्यक्तियों के बीच फंस गया था: एक महाकाय औरत ने उसे हाथ में पकड़ा है – कुछ-कुछ, क़रीब-क़रीब नहीं पकड़ा है, बल्कि छोड़ना भूल गई है, और अब, बस, छोड़ने ही वाली है, और बेचारा गलिवर डर के मारे चिल्ला रहा है, फ़ोन कर रहा है – मुझे मत फेंक!

इवान पूनी अपनी तस्वीरों के प्यार में मगन है; दर्द भरी नज़रों से वह कला के भविष्य की ओर देखता है, उसके लिए कोई भी चीज़ आसान नहीं है, और आने वाले दिन के प्यार पर उसे यक़ीन नहीं है.

एक बार रात को मैं उसके यहाँ पहुँचा, साथ में था रोमान याकोब्सन, कार्ल आइन्स्टीन, बगातीरेव और एक और व्यक्ति.

रात का क़रीब एक या दो बजा होगा, याद नहीं है; पूनी अपने स्टुडियो में काम कर रहा था. फ़र्श पर, कुर्सियों पर, पलंग पर रंगों की ट्यूब्स बिखरी पड़ी थीं.

उसने बगैर किसी प्रसन्नता के, बिना अचरज के हमारा स्वागत किया, मानो हम – यात्री हों, और उसका कमरा – कम्पार्टमेंट.

हमने काफ़ी चीज़ों के बारे में बातें कीं, सभी कड़वाहट भरी बातें.

नुक्कड से आलू ख़रीदे, उन्हें खाया. पूनी ने मक्खन दिया, आलू उबाले, मगर हमारी ओर ध्यान नहीं दिया. वह बड़े ग़ौर से और दुख से तस्वीर की ओर देखता रहा.

मगर एक बार मैंने उसे अपनी तस्वीर के सामने ठहाका लगाते हुए देखा था; वह रचना के ऊपर उसी तरह हँस सकता है, जैसे व्यंग्य पर हँस रहा हो.

क्साना बगुस्लाव्स्काया – कलाकार की बीबी है और ख़ुद भी कलाकार है.   

वह ठीक-ठाक, हालाँकि मिठास भरी कलाकार है, अच्छी ही है, क्योंकि उसकी मिठास अनुभूतिपूर्ण है –उसकी विधा मिठास है, न कि आँसू.

और उसकी सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि वह अपने पति के चित्रों से बहुत प्यार करती है. हर विकल्प से उसे ईर्ष्या होती है, ये सोच-सोचकर परेशान होती रहती है कि आगे क्या होगा.

मगर ज़िन्दा रहने के लिए कलाकार को हल्की-फुल्की चीज़ें बनानी पड़ती हैं. इस हल्के-फुल्के काम से कंधों में दर्द होने लगता है. असल तस्वीरों को बेचना तो मुमकिन नहीं है, या, यूँ कहिए कि जब तक वे मशहूर नहीं होतीं, तब तक बर्दाश्त करना पड़ता है. ये इंतज़ार बेहद लम्बा भी हो सकता है. हम अक्सर मज़ाक में पूनी के घर को “पवित्र परिवार” कहते थे, और कभी-कभी – “सीमित ज़िम्मेदारियों वाला बिज़नेस-हाउस” कहते. मगर परिवार तो वाक़ई में पवित्र है: अगर हर बात को बर्लिन की भाषा से प्राचीन भाषा में अनुवादित किया जाए, तो ये जानकारी मिलेगी: इजिप्ट में पलायन, फिर क्साना बनेगी यूसुफ़, पूनी – माँ और तस्वीर – नन्हा बच्चा.

हर उस आदमी के लिए जीना मुश्किल है, जो औरत से या अपनी कला से प्यार करता है.

पूनी के पास उसके दोस्त आते हैं: सफ़ेद बालों वाला जर्मन फ्रिग अपनी ख़ूबसूरत बीबी के साथ, लात्वियन कार्ल ज़ालित, जो  चौथी शताब्दी वाले अफ्रिकन क्रिश्चन जैसा शोर मचाता है, आर्नोल्ड ज़ेर्काल, ख़ामोश तबियत, स्वीडिश जैसा, भारी-भरकम, बढ़िया कपडों में, शक्तिशाली और मुझे समझ में न आने वाला. रूनी बेलिंग भी आता है, फ्रांसीसी जैसा जर्मन, शिल्पकार, डील डौल से टिड्डे जैसा; बर्लिन की शो-केसेस में जो एक्स्प्रेशनिस्ट पुतले हैं वे उसीके मॉडेल्स पर आधारित हैं.

ये सब लोग, जब तस्वीरें देखते हैं, तो ख़ामोश और शांत होते हैं. और क्साना प्यार भरी नज़रों से कॅनवास को देखती रहती है. पूनी हमेशा खूब काम करता था.

तस्वीरें उसे खा रही हैं. काम करना कितना मुश्किल है!

और चीज़ें पैदा होती रहती हैं, बच्चों के समान.


उनका गर्भधारण प्रसन्नता से होता है, प्रसन्नता से और बिना शर्म के, गर्भ में उन्हें उठाए रखना कठिन है, उनका प्रसव होता है पीड़ा से, और फिर वे जीती हैं कड़वाहट से.

शनिवार, 20 जून 2015

Thirteenth Letter

पत्र तेरहवाँ  
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पत्र रूस के मित्रों को लिखा गया है; इससे स्पष्ट होता है कि लेखक पर कोई सनक सवार है. पत्र में इस बारे में बताया गया है कि आइन्स्टीन के आविष्कार के बाद भी स्थल-काल घेरे बिना जीना कितना मुश्किल है. पत्र समाप्त होता है बर्लिन में सर्वनाम ‘हम’ के गलत प्रयोग पर अप्रसन्नता से.
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प्यारे दोस्तों, तुम मुझे इतना कम क्यों लिखते हो?

कहीं तुमने मुझे अपने दिल से तो नहीं निकाल दिया?

मुझे लोगों-परछाइयों से बचाइए, उन लोगों से बचाइए जो मुक्त हो चुके हैं शैफ़्ट (बम) से, ज़ंग से, 
पूरी ज़िन्दगी से, जो (यहाँ ज़िन्दगी से तात्पर्य है – अनु.)  मुझसे एक ही बात कहती है:
“तू रह सकता है, मगर मुझसे जगह और समय न मांग”.
और कहती है:
 “ये रहा तेरे लिए दिन और ये रही रात, और तू इनके दरम्यान जी ले. सिर्फ सुबह और शाम को मेरे पास न आ”.

मेरे दोस्तों, भाईयों! कितनी गलत बात है कि मैं यहाँ हूँ!

तुम सब लोग बाहर जाओ, नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट पर, निवेदन करो, मांग करो कि मुझे वापस लौटने की इजाज़त दी जाए.

अप्रिय प्रसंगों से बचने के लिए, नेव्स्की पर ट्राम में जा सकते हो.

मगर अपने पाँव ज़मीन पर ही रहने दो, दोस्तों.

मैं बर्लिन से जुड़ गया हूँ, मगर यदि मुझसे कहा जाता: “वापस लौट सकते हो”, - तो, मैं OPOYAZ  की क़सम खाकर कहता हूँ कि बिना पीछे मुड़ कर देखे, बिना अपनी पाण्डुलिपियाँ साथ लिए घर वापस चला जाता. फोन किए बिना.

मुझे फोन करने की इजाज़त नहीं है.

तुम लोग आजकल क्या लिख रहे हो?

क्या कल्चरल हाउस के सामने वाली मोर्स्काया के पुल की मरम्मत कर दी गई है?

बिना किसी मक़सद के जीने से बेहतर होगा इस गड्ढ़े में मुर्दे की तरह लेट जाना, जिससे लॉरियों के लिए रास्ता सुधारा जा सके.

क्या पीटर्सबुर्ग में बहुत कारें हैं?

आप लोगों का प्रकाशन कैसे चल रहा है?

हम काफ़ी कुछ प्रकाशित कर लेते हैं.

सिर्फ यहाँ ‘हम’ अजीब सा शब्द प्रतीत होता है.

एक महिला ने मुझे फ़ोन किया. मैं बीमार था.

कुछ देर बात की. मैंने कहा कि घर में बैठा हूँ.

मगर, रिसीवर लटकाते हुए वह बोली:
 “आज हम थियेटर जा रहे हैं”.

चूंकि मैंने अभी-अभी उससे बात की थी, इसलिए मैं समझ नहीं पाया:
 “ये ‘हम’ कौन? मैं तो बीमार हूँ”.

कितनी अविश्वसनीय बात है! ‘हम’, मतलब - मैं और कोई और.         

रूस में “हम” काफ़ी मज़बूत होता है.

सोमवार, 15 जून 2015

Twelfth Letter

पत्र बारहवाँ

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यह सुबह छह से दस बजे के बीच लिखा गया है.
समय की अधिकता ने पत्र को लम्बा कर दिया है. उसमें तीन भाग हैं. उसमें महत्वपूर्ण है सिर्फ इस बात का ज़िक्र कि बर्लिन के नाइट-क्लब की औरतों को फ़ोर्क पकड़ना आता है. 
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सुबह के छह बजे हैं,
खिड़की के बाहर, कैसेराली पर, अभी अंधेरा है.
तुम्हें सिर्फ साढ़े दस बजे ही फ़ोन कर सकता हूँ.
साढ़े चार घण्टे, और फिर बीस ख़ाली घण्टे, जिनके दौरान – तुम्हारी आवाज़.
अपने कमरे से मैं बेज़ार हो गया हूँ. मेरी राइटिंग टेबल, जिस पर मैं सिर्फ तुम्हें ख़त लिखता हूँ, मुझे अच्छी नहीं लगती.
बैठा हूँ प्यार में गिरफ़्तार, किसी टेलिग्राफ़िस्ट की तरह.
गिटार लेकर गाना कितना अच्छा होता.
कम से कम बात तो कर तू मुझसे,
सात तारों वाली मेरी सहेली,
रूह है लबालब ऐसे दर्द से,
और रात है कैसी चाँद वाली.

रोज़ी-रोटी के लिए कुछ तो लिखना होगा. मोटरबाईक्स के लिए कोई विज्ञापन.

तुम्हारे बारे में, मोटरबाईक के बारे में, कार के बारे में ख़याल मेरे दिमाग़ में गड्ड-मड्ड हो रहे हैं.
ख़त ही लिखूँगा. फ़िल्म इंतज़ार कर सकती है.

मैं तुम्हें हर रात लिखता हूँ, फिर उसे फ़ाड़ देता हूँ और डस्टबिन में डाल देता हूँ. ख़त सजीव हो जाते हैं, बढ़ने लगते हैं, और मैं उन्हें नये सिरे से लिखता हूँ.

मेरा लिखा हुआ हर ख़त तुम्हें मिल जाता है.

टूटे हुए खिलौनों वाली तुम्हारी टोकरी में सबसे पहला वो है, जिसने तुम्हें, बिदा लेते हुए, लाल फूल दिए थे. तुमने फ़ोन करके उसे धन्यवाद दिया था; और वो, जिसने तुम्हें पुखराज का ताबीज़ दिया था, और वो, जिससे तुमने बड़े ख़ुश होकर स्टील के तारों का बुना हुआ छोटा सा लेडीज़ पर्स स्वीकार किया था.

तुम्हारा आचरण बिल्कुल एक जैसा है: प्रसन्नता से मुलाक़ात, फूल, आदमी का प्यार, जो (यहाँ ‘प्यार’ से तात्पर्य है – अनु.) हमेशा देर कर देता है, कार के सिलिंडर में ताज़ी गैस के अवशोषण जैसा.
आदमी तब से एक दिन बाद प्यार करना शुरू करता है, जब वह कहता है “आइ लव यू”.
इसलिए इस शब्द को नहीं कहना चाहिए.
प्यार बढ़ता जाता है, आदमी तपता रहता है, और तुम्हारा दिल उससे फिर जाता है.
कार की टेक्नोलॉजी में इसे कहते हैं ‘प्री-रिलीज़”.  
सिर्फ मैं, ख़त की तरह फ़ाड़ा हुआ, तुम्हारे टूटे हुए खिलौनों की टोकरी से बाहर निकलता रहता हूँ. मैं तुम्हारे दसियों शौक बर्दाश्त कर लूंगा, सुबह तुम मुझे फ़ाड देती हो, मगर रात को मैं सजीव हो जाता हूँ, ख़तों की तरह.

अभी तक सुबह नहीं हुई है, और मैं अभी से अपनी गार्ड-ड्यूटी पर आ गया हूँ.   
सड़क की तरफ़ की खिड़की खुली है.
कारें भी जाग गई हैं, या अभी तक सोई नहीं हैं.
आल्, आल् एल्, - वे चीख़ती हैं: उन्हें तुम्हारा नाम लेना अच्छा लगता है.

अपनी बीमारी वाले कमरे में बैठा हूँ, तुम्हारे बारे में, कारों के बारे में सोच रहा हूँ. ये ज़्यादा मज़ाहिया लगता है.

तुमने मेरी ज़िन्दगी को उसी तरह घुमा दिया है, जैसे दाँतों वाला स्क्रू गियर घुमा देता है. 

 गियर तो स्टीयरिंग व्हील नहीं घुमा सकता. टेक्नोलॉजी में इसे कहते हैं: अ-पलट ड्राईव. अ-पलट है मेरा भाग्य.

सिर्फ समय ही, जैसा कि ओडेसा के पहेली-गीत में गाते हैं, जिसे लीव्शित्स ने बनाया था, मेरा अपना है: मैं इंतज़ार के समय को घण्टों में, मिनटों में, बाँट सकता हूँ, उन्हें गिन सकता हूँ. मैं इंतज़ार कर रहा हूँ, इंतज़ार कर रहा हूँ. अफ़सोस, गिटार नहीं है.

मुझे किसका इंतज़ार है? मैं सूरज का इंतज़ार करूँगा. सूरज क़रीब आठ बजे उठेगा. कैसेराली को रोशन करेगा, और सड़क कामेन्नाओस्त्रोव्स्की-प्रॉस्पेक्ट जैसी लगने लगेगी.

पीटर्सबुर्ग के कामेन्नाओस्त्रोव्स्की-प्रॉस्पेक्ट में वह स्कूल था, जिसे मैंने पूरा किया था.

वह कोई-सा साल था, ओह, शायद, 1913. हम स्कूल के अंतिम वर्ष में थे. हम शिद्दत से स्कूल ख़त्म करके बाहर रास्ते पर घूमना चाहते थे, लकड़ी के पहिए जैसे कलाबाज़ी खाते हुए.

हवा तमन्नाओं से सराबोर थी, वे कामेन्नाओस्त्रोव्स्की पर तैरतीं - परों से, पंखों से. बादल परों जैसे थे.
हम जल्दी से जल्दी ज़िन्दगी को पकड़ना चाहते थे. मगर हम शब्दों से अनजान थे, सोचते थे कि औरत को किसी चीज़ की तरह हाथ में पकड़ा जा सकता है.
गर्म या ठण्डे हाथों से ज़िन्दगी को पकड़ने चले थे.
अलग-अलग चीज़ों में प्यार पहचानना चाहते थे. स्कूल की गेट-टुगेदर में तार काट देते थे, और अगर बहुत ही ज़्यादा बहक जाते, तो शौक से अपने आपको गोली मार लेते, मानो एक और चीज़ जानना चाहते थे. इन मौतों की आदत थी. हम, morituri थे, मतलब, वो थे जिन्हें मरना ही था.              
Morituri सिर्फ एक और चीज़ आज़माना चाहते थे.

नहीं, बेहतर है कि कमरे में ही बैठूँ, सुबह छह बजे न सोऊँ, सात बजे फूलों के लिए बाज़ार जाऊँ. बेहतर है कि सारी ज़िन्दगी गिटार के साथ गुज़ार दूँ.

बर्लिन के नाइट-क्लब्स विचित्र हैं. मैं Nachtlokal पहुँच गया.

कमरा साधारण ही था, दीवारों पर तस्वीरें लटक रही थीं.
किचन की गंध आ रही थी. पियानो घुटी-घुटी आवाज़ में बज रहा था. वायलिन वादक बड़े भद्दे तरीक़े से एक विचित्र, नक्काशी वाले वॉयलिन पर रोनी धुन बजा रहा था. पब्लिक ख़ामोश नशे में धुत थी. सिर्फ काली स्टॉकिंग्स वाली एक नग्न औरत बाहर आती है और फूहड़पन से हाथों को फेंकते हुए नाचने लगती है; फिर दूसरी औरत बाहर आती है, बिना स्टॉकिंग्स वाली.
मुझे मालूम नहीं था कि हमारे अलावा कमरे में और कौन-कौन था. वॉयलिन-वादक मेज़ों का चक्कर लगाता है, पैसे इकट्ठा करता है. वह कोने में बैठे हुए उदास नशे में धुत आदमी के पास जाता है. वह उससे कुछ कहता है.
वॉयलिन-वादक अपना बिना सीने वाला वॉयलिन लेता है, और हवा में पतली-बेहद पतली ’गॉड सेव द किंग’ की धुन तैरने लगती है. कई दिनों से मैंने यह गीत नहीं सुना था.
उस औरत ने अपना काम ख़त्म किया, एक बढ़िया, तैयार ड्रेस पहनी और अब वह हमारी बगल वाली मेज़ पर बैठी हुई कुछ खा रही है.
“देखो, उसे फ़ोर्क भी पकड़ना आता है,” बगातीरेव ने मुझसे कहा.

खाने का सलीक़ा हमारे लिए एक फ़ैशनेबल सवाल था.

हम घर जाने लगे. वार्ड-रोब में किसी औरत ने हमें कोट दिया. कूपन देते हुए मैं उसके चेहरे को ग़ौर से देखता हूँ. ये वही थी, जो अभी-अभी स्टॉकिंग्स पहनकर डान्स कर रही थी. हर चीज़ बड़ी पोर्टॆबल थी और शायद पारिवारिक मामला था. व्यभिचार का नामोनिशान नहीं था. कुछ लोग होते हैं शब्दों वाले और कुछ बिन शब्दों के. शब्दों वाले लोग जाते नहीं हैं, और, मेरा यक़ीन करो, मैंने ख़ुशी से अपनी ज़िन्दगी जी है.

बिना शब्दों के तल से कुछ भी निकालना संभव नहीं है.

रोशनी हो रही है, मुझे लिखना बन्द करने की कोई ज़रूरत नहीं है. वक़्त मेरा है. लीव्शित्स सही कहता है.

मेरा निद्राहीन ख़त टुकड़ों में बिखर गया है. फाड़ने से पहले इसे जोड़ लूँगा.

ईश्वर से संबंधित एक परीकथा में ईश्वर समुद्र की तह से कुछ रेत लाना चाहता है. 

मगर ईश्वर ख़ुद पानी में डुबकी लगाना नहीं चाहता. वह शैतान को भेजता है और उसे हिदायत देता है: “जब रेत लेने लगो, तो कहना – मैं नहीं ले रहा, ईश्वर ले रहा है.”
शैतान ने बिल्कुल तली तक डुबकी लगाई, तली पर घूमता रहा, रेत उठाई और बोला:
“ईश्वर नहीं ले रहा - मैं ले रहा हूँ”.
ख़ुद से प्यार करने वाला शैतान.
रेत हाथ में ही नहीं आती. नीला होकर शैतान बाहर आया.
ईश्वर ने उसे फिर से पानी में भेजा.
शैतान तल तक गया, रेत को नाखूनों से खुरचा, बोला:
 “ईश्वर नहीं ले रहा – मैं ले रहा हूँ”.
रेत मिलती ही नहीं है. गहरी-गहरी साँसें लेते हुए बाहर आया. ईश्वर ने उसे तीसरी बार पानी में भेजा.
परीकथाओं में हर चीज़ तीन बार होती है.
 शैतान ने देखा – कोई अन्य चारा ही नहीं   है.

वह कथावस्तु को बिगाड़ना नहीं चाहता था. रोने लगा, हो सकता है, और पानी में डुबकी लगाई. तैर कर तल तक पहुँचा और बोला:
 “मैं नहीं ले रहा – ईश्वर ले रहा है”. रेत उठाई और तैर कर बाहर आ गया. और ईश्वर ने उस रेत से, जिसे ईश्वर की आज्ञा से शैतान तल से लाया था, इन्सान का निर्माण किया.

आगे लिखने का मन नहीं है. मुझे ख़तों की ज़रूरत नहीं है. मुझे गिटार की भी ज़रूरत नहीं है. और मुझे इस बात से भी कोई फ़रक नहीं पड़ता कि मेरा प्यार अ-पलट ड्राईव जैसा है या नहीं.



मेरे लिए सब कुछ एक जैसा है. मुझे मालूम है: तुम मेरा ख़त अपनी मेज़ की दाईं ओर वाली टोकरी में भी नहीं रखोगी.