रविवार, 2 अगस्त 2015

Twenty Fifth Letter

पत्र पच्चीसवाँ

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बसंत के बारे में, प्रागेर डील, एरेनबुर्ग, तुरहियों के, वक़्त के बारे में, जो चलता ही रहता है, होठों के बारे में, जो फिर से ताज़ा-तरीन हो जाते हैं, और दिल के बारे में जो फ़ड़फ़ड़ाता रहता है, उस समय, जब पराये होठों का रंग सिर्फ निकलता है. मेरे दिल के बारे में. 
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तापमान प्लस सात डिग्री हो गया है. शिशिर वाला ओवरकोट बसंत वाले ओवरकोट में बदल गया है. सर्दियाँ जा रही हैं, और चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे फिर से ठण्ड बर्दाश्त करने के लिए कोई मजबूर नहीं करेगा.

अपनी वापसी में यक़ीन करेंगे. बसंत आएगा.

तुमने मुझसे कहा था कि बसंत में तुम्हें ऐसा लगता रहता है, जैसे तुमने कुछ खो दिया है, या तुम कुछ भूल गई हो और याद नहीं कर पा रही हो.

बसंत में मैं काला लबादा ओढ़े पीटर्सबर्ग के तटबंधों पर घूमता था. वहाँ सफ़ेद रातें होती हैं, और पुलों के नदी पर गिरने से पहले सूरज निकलने लगता है. तटबंधों पर मैंने बहुत कुछ पाया है. मगर तुम नहीं पा सकोगी, तुम सिर्फ ‘खोना’ ही देख सकती थीं. बर्लिन के तटबंध दूसरी तरह के हैं. वे भी अच्छे हैं. नहरों के किनारों पर चलकर मज़दूरों की बस्ती में जाना अच्छा लगता है.

कहीं कहीं नहरें चौड़ी होकर बन्दरगाहों में बदल जाती हैं, पानी के ऊपर क्रेन्स लटकती हैं. जैसे पेड़ हों. वहाँ, हेलेशेस तोर के पास, उस जगह से आगे, जहाँ तुम रहती हो, गैस प्लांट्स का गोल टॉवर है, जैसे हमारे ओब्वोद्नी में है. उन टॉवर्स तक, जब मैं अठारह साल का था, मैं हर रोज़ अपनी प्रियतमा को छोड़ने जाता था. नहरें उस समय भी ख़ूबसूरत लगती हैं, जब उनके किनारे से शहरी रेल का ऊँचा प्लेटफॉर्म गुज़रता है.

मुझे याद आ रहा है कि मैंने क्या खोया है.

ख़ुदा का शुक्र है, बसंत आ गया है.

प्रागेर डील से छोटी-छोटी मेज़ें बाहर सड़क पर लाई जाएँगी, और ईल्या एरेनबुर्ग आसमान देखेगा.
ईल्या एरेनबुर्ग बर्लिन की सड़कों पर वैसे ही चलता है, जैसे पैरिस और दूसरे शहरों में - जहाँ शरणार्थी हैं - चलता था, झुक कर, मानो ज़मीन पर कोई खोई हुई चीज़ ढूँढ़ रहा हो. वैसे, ये सही तुलना नहीं है – शरीर कमर से नहीं झुका है, बल्कि सिर्फ सिर झुका हुआ है और पीठ गोल हो गई है. भूरा ओवरकोट, चमड़े की कैप. सिर एकदम जवान. उसके तीन व्यवसाय हैं: 1) पाईप पीना, 2) शक्की होना, कैफ़े में बैठना और ‘चीज़ें’ प्रकाशित करना, 3) ‘जूलियो जुरेनितो’ लिखना.

“जूलियो जुरेनितो” की हाल ही में प्रकाशित कड़ी का नाम है “ट्रस्ट डी.ई.” एरेनबुर्ग से मानो किरणें निकलती हैं, इन किरणों के अलग अलग नाम हैं, उनकी विशेषता ये है, कि वे पाईप के कश लगाती हैं. ये किरणें कैफ़े को भर देती हैं.   

कैफ़े के कोने में ख़ुद शिक्षक बैठता है और पाईप के कश लगाने की कला, उपन्यास लिखना और दुनिया तथा आईस्क्रीम को शक की नज़रों से देखना सिखाता है.

प्रकृति ने एरेनबुर्ग को भर-भरके दिया है – उसके पास सोवियत पासपोर्ट है.

इस पासपोर्ट के  साथ वह विदेशों में रहता है. और हज़ारों वीज़ा हैं उसके पास.

मैं नहीं जानता कि ईल्या एरेनबुर्ग कैसा लेखक है.

पुरानी चीज़ें अच्छी नहीं हैं.

“जूलियो जुरेनितो” के बारे में सोचना चाहता हूँ. ये काफ़ी अख़बारी चीज़ है,  व्यंग्यात्मक आलेख – कथानक सहित, सांकेतिक प्रकार के लोग और ख़ुद बूढ़ा एरेनबुर्ग, प्रार्थना करता हुआ; पुराने काव्य का सांकेतिक रूप में प्रयोग किया गया है.

उपन्यास वोल्टेयर के “केंडिडे” की तरह आगे बढ़ता है, बेशक, कथानक की कम विविधता सहित.  
“केंडिडे” में कथानक बढ़िया है: जब तक कुनेगोन्दे को ढूँढ़ते हैं, वह सब के साथ रहती है और बूढ़ी हो जाती है. नायक को बुढ़िया मिलती है, जो बल्गारियन नौजवान की चिकनी त्वचा को याद करती है.

इस कथानक को, या यूँ कहें कि – इस तथ्य को प्रस्थापित करने का प्रयत्न कि “समय गुज़रता है” और परिवर्तन होते रहते हैं, बोकासिओ द्वारा भी किया गया था. वहाँ औरत- वधू एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती है और अंत में अपने पति को प्राप्त होती है, कुँआरेपन का यक़ीन दिलाते हुए.

मगर रास्ते में उसे केवल हाथ ही नहीं मिले. ये लघु-उपन्यास इस प्रसिद्ध वाक्य से समाप्त होता है कि होंठ मरते नहीं हैं, बल्कि चुम्बनों के बाद वे सिर्फ ताज़ा तरीन हो जाते हैं.

ख़ैर, कोई बात नहीं, मुझे जल्दी ही याद आ जाएगा कि क्या भूल गया था. एरेनबुर्ग का अपना व्यंग्य है, उसके उपन्यास और कहानियाँ एलिज़ाबेती समय के लिए नहीं हैं, उसमें अच्छी बात ये है कि वह महान रूसी साहित्य की परंपरा को आगे नहीं बढ़ाता और “बुरी चीज़ें” लिखने को प्राथमिकता देता है.

पहले मुझे एरेनबुर्ग पर इसलिए गुस्सा आता था कि वह, यूरोपियन कैथोलिक या स्लावोफ़िल से यूरोपियन संरचनावादी बनकर भी विगत को भूला नहीं है.

सावेल से वह पावेल नहीं बना. वह पावेल साव्लोविच है और “जानवरों का जोश” प्रकाशित कर रहा है.

वह सिर्फ अख़बारी कार्यकर्ता नहीं है, जो उपन्यास में औरों के विचारों को इकट्ठा करता है, बल्कि लगभग कलाकार है, जो पुरानी मानवीय संस्कृति और नई दुनिया के विरोधाभास को महसूस करता है, जो इस समय मशीनों द्वारा बन रही है.

मुझे तो सारे विरोधाभासों में सबसे ज़्यादा बुरा ये लगता है कि जब तक होंठ ताज़ा तरीन होते हैं – दिल ज़ोर-ज़ोर से फ़ड़कता है और ये भी, कि जो भुला दिया गया है, वह भी उसके साथ फ़ड़कता है, अनजाना सा.

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