पत्र उनतीसवाँ
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अलीना का अंतिम
पत्र. इसमें आल्या इस बारे में लिखती है कि प्रेम पत्र कैसे लिखना चाहिए. यह पत्र
एक तैश भरे वाक्य से समाप्त होता है : “ये लिखना बन्द करो कि तुम कैसे, कैसे, कैसे
मुझसे प्यार करते हो, क्योंकि तीसरे ‘कैसे’ पर मैं किसी अजनबी के बारे में सोचना
शुरू कर देती हूँ.”
इस किताब का लेखक
तहे-दिल से चाहता है कि उसके पाठकों को ऐसे पत्र न मिलें.
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तुम समझौते को तोड़
रहे हो.
तुम मुझे हर रोज़
दो-दो ख़त लिखते हो. काफ़ी ख़त जमा हो गए हैं.
मेरी मेज़ की दराज़
में, जेबों में और पर्स में मैंने उन्हें ठूँस दिया है.
तुम कहते हो कि,
तुम ये जानते हो कि “डॉन-किखोत” कैसे बनाया गया है, मगर तुम एक प्रेम पत्र नहीं
बना सकते.
और तुम अधिकाधिक
कड़वाहट से भरते जा रहे हो
और जब प्यार से
लिखते हो, तो काव्यात्मक हो जाते हो और बुलबुले छोड़ते हो....
(तुम्हें “साऊथ”
से लिख रहा हूँ, चुपचाप, अकेला, फिलेट का इंतज़ार करते हुए).
साहित्य की समझ
मुझे कम है, हालाँकि तुम चापलूस हो और ये यक़ीन दिलाते हो कि मैं तुम्हारे जितना ही
उसे समझती हूँ; मगर प्रेम-पत्रों का मर्म मैं जानती हूँ. तुम बेकार ही में नहीं
कहते हो कि किसी दफ़्तर में घुसते ही मैं फ़ौरन जान जाती हूँ कि क्या हो रहा है, और
कौन किसके साथ है.
तुम हमेशा अपने
बारे में लिखते हो, और जब मेरे बारे में लिखते हो तो ताने देते हो.
प्रेम पत्र अपनी
ख़ुद की ख़ुशी के लिए नहीं लिखते, क्योंकि एक सच्चा प्रेमी प्यार में अपने बारे में
नहीं सोचता.
तुम अलग-अलग बहाने
बनाकर सिर्फ एक ही बात के बारे में लिखते हो.
ये लिखना बन्द करो कि तुम कैसे, कैसे, कैसे मुझसे प्यार करते हो, क्योंकि तीसरे ‘कैसे’ पर मैं किसी अजनबी के बारे में सोचना शुरू कर देती हूँ.
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