सोमवार, 10 अगस्त 2015

Thirtieth Letter

पत्र तीसवाँ

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अंतिम. यह रशियन सेंटृल एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी को लिखा गया है.
इसमें फिर से बारह लोहे के पुलों के बारे में कहा गया है.
इस पत्र में रूस वापस लौटने की अनुमति देने की प्रार्थना भी शामिल है.
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रशियन सेंट्रल एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी को दरख़्वास्त.

मैं बर्लिन में नहीं रह सकता.

अपने समूचे अस्तित्व, सारी आदतों समेत मैं आज के रूस से जुड़ा हूँ. सिर्फ उसी के लिए काम कर सकता हूँ.

ये सही नहीं है कि मैं बर्लिन में रहता हूँ.

क्रांति ने मुझे पुनर्जन्म दिया है, उसके बगैर मैं साँस ही नहीं ले सकता. यहाँ तो सिर्फ दम घुट सकता है.

बर्लिन की वेदना कार्बाईड की धूल जैसी कड़वी है. चौंकिए नहीं, कि मैं ये पत्र एक औरत को कई पत्र लिखने के बाद लिख रहा हूँ.

प्यार के लफ़ड़े में मैं पड़ना ही नहीं चाहता.

वह औरत, जिसे मैं ख़त लिखता रहा, कभी थी ही नहीं. हो सकता है, कोई दूसरी हो, अच्छी कॉम्रेड और मेरी दोस्त, जिससे मैं दिल की बात कह नहीं सका. आल्या – सिर्फ एक रूपक का निष्पादन है. मैंने एक औरत और उसके प्यार की कल्पना की - सिर्फ मेरी किताब के लिए, जो समझ न पाने के बारे में, पराए लोगों के बारे में, पराए देश के बारे में है. मैं अपना रूस ही चाहता हूँ.

वो सब, जो था – गुज़र चुका है, लोहे के बारह पुलों ने मेरी जवानी और आत्मविश्वास को छीन लिया है.

मैं हाथ उठाकर आत्मसमर्पण करता हूँ.


मुझे और मेरे सीधे सादे सामान को : छह कमीज़ें (तीन मेरे पास, तीन लाँड्री में), पीले जूते, जिन्हें गलती से काले पॉलिश से साफ़ किया था, और पुरानी नीली पतलून, जिस पर मैंने सफ़ाई से पैच लगाने की कोशिश की थी.

Twenty Ninth Letter

पत्र उनतीसवाँ
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अलीना का अंतिम पत्र. इसमें आल्या इस बारे में लिखती है कि प्रेम पत्र कैसे लिखना चाहिए. यह पत्र एक तैश भरे वाक्य से समाप्त होता है : “ये लिखना बन्द करो कि तुम कैसे, कैसे, कैसे मुझसे प्यार करते हो, क्योंकि तीसरे ‘कैसे’ पर मैं किसी अजनबी के बारे में सोचना शुरू कर देती हूँ.”
इस किताब का लेखक तहे-दिल से चाहता है कि उसके पाठकों को ऐसे पत्र न मिलें.
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तुम समझौते को तोड़ रहे हो.               

तुम मुझे हर रोज़ दो-दो ख़त लिखते हो. काफ़ी ख़त जमा हो गए हैं.

मेरी मेज़ की दराज़ में, जेबों में और पर्स में मैंने उन्हें ठूँस दिया है.

तुम कहते हो कि, तुम ये जानते हो कि “डॉन-किखोत” कैसे बनाया गया है, मगर तुम एक प्रेम पत्र नहीं बना सकते.

और तुम अधिकाधिक कड़वाहट से भरते जा रहे हो

और जब प्यार से लिखते हो, तो काव्यात्मक हो जाते हो और बुलबुले छोड़ते हो....

(तुम्हें “साऊथ” से लिख रहा हूँ, चुपचाप, अकेला, फिलेट का इंतज़ार करते हुए).

साहित्य की समझ मुझे कम है, हालाँकि तुम चापलूस हो और ये यक़ीन दिलाते हो कि मैं तुम्हारे जितना ही उसे समझती हूँ; मगर प्रेम-पत्रों का मर्म मैं जानती हूँ. तुम बेकार ही में नहीं कहते हो कि किसी दफ़्तर में घुसते ही मैं फ़ौरन जान जाती हूँ कि क्या हो रहा है, और कौन किसके साथ है.

तुम हमेशा अपने बारे में लिखते हो, और जब मेरे बारे में लिखते हो तो ताने देते हो.

प्रेम पत्र अपनी ख़ुद की ख़ुशी के लिए नहीं लिखते, क्योंकि एक सच्चा प्रेमी प्यार में अपने बारे में नहीं सोचता.

तुम अलग-अलग बहाने बनाकर सिर्फ एक ही बात के बारे में लिखते हो.

ये लिखना बन्द करो कि तुम कैसे, कैसे, कैसे मुझसे प्यार करते हो, क्योंकि तीसरे ‘कैसे’ पर मैं किसी अजनबी के बारे में सोचना शुरू कर देती हूँ.

रविवार, 9 अगस्त 2015

Twenty Eighth Letter

पत्र अट्ठाईसवाँ

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इस शिकायत के साथ कि दुख बहुत छोटा है. वह अपनी सामर्थ्य से ज़्यादा की मांग करता है.
दुख उसके रूमाल के लिए काफ़ी है.
इसके अलावा पत्र में मशहूर कहानी का एक अलग रूप दिया गया है.
ये पत्र लिखा नहीं गया था, और अनकहे शब्द ख़याल बन जाते हैं.
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क़सम खाता हूँ .... अपना उपन्यास मैं शीघ्र पूरा कर लूंगा.

औरत, जो मेरे ख़तों का जवाब नहीं देती है!

तुमने मेरे प्यार को टेलिफ़ोन के चोंगे में धकेल दिया है.

मेरा दुख मेरे पास आता है और मेरे साथ एक ही मेज़ पर बैठ जाता है.

मैं उससे बातें करता हूँ.

मगर डॉक्टर कहता है कि मेरा ब्लड-प्रेशर सामान्य है और मेरा ये आभास – सिर्फ एक साहित्यिक घटना है.

दुख मेरे पास आता है. मैं उससे बातें करता हूँ और मन ही मन पन्ने गिनता हूँ.
लगता है, सिर्फ तीन पन्ने हैं.

कितना छोटा है दुख.

कुछ और करना चाहिए था - अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर.

इसका उलटा भी हो सकता था.

मैं कर नहीं पाया.

मैं सिर्फ वही कर पाया, जैसा तुमने हुक्म दिया था, छह कमीज़ें रखना.

तीन मेरे पास, तीन लाँड्री में.

मुझे ख़ुद टूटना चाहिए था, मगर मैंने अपने लिए तोड़ने वाला प्यार खोजा; बेशक, इस बारे में मैं तुम्हें पहले भी लिख चुका हूँ.

आदमी पत्थर पे चाकू घिस रहा है. उसे पत्थर की ज़रूरत नहीं है, हालाँकि वह उसकी तरफ़ झुकता है.

ये टॉल्स्टॉय से है.

उसने ज़्यादा विस्तार से और बेहतर लिखा है.

मेरी क़िस्मत में सब कुछ पहले से ही निश्चित था.

मगर इसका उलटा भी हो सकता था.

मैं तुम्हें उपन्यास का दूसरा अंत बताता हूँ.

ये एण्डरसन से होगा.

ये वो है, जो हो सकता था.

एक था राजकुमार.

उसके पास दो क़ीमती चीज़ें थीं: गुलाब का फूल, जो उसकी माँ की कब्र पर उगा था, और एक बुलबुल, जो इतना मीठा गाती थी कि इन्सान अपनी रूह को भी भूल जाए.

उसे पड़ोस के राज्य की राजकुमारी से प्यार हो गया और उसने उसे भेजा तोहफ़ा:
      1)    गुलाब,

       2) बुलबुल.
2
गुलाब तो राजकुमारी ने स्केटिंग रिंग के इंस्ट्रक्टर को भेंट कर दिया, और बुलबुल उसके यहाँ तीसरे ही दिन मर गई: उससे यूडीकोलन और पाउडर की गंध बर्दाश्त नहीं हुई.

आगे एण्डरसन हर चीज़ गलत-सलत लिखता है.

राजकुमार ने गड़रिये का भेस नहीं बनाया.

उसने पैसे उधार लिए, रेशमी मोज़े और नुकीले सिरे वाले जूते ख़रीदे.

एक दिन उसने मुस्कुराना सीखा, दो दिन – चुप रहना और तीन महीने पाउडर की गंध की आदत डाली.

उसने राजकुमारी को तोहफ़ा दिया:
1)      एक झुनझुना, जिसके साथ शिम्मी डांस कर सकते हैं,
2) कोई एक खिलौना, जो हमेशा बेकार की बातें किया करता था – शायद, समर्पण लेख वाली किताब थी.

राजकुमारी ने सचमुच में उसका चुम्बन लिया.

वह रात जब राजकुमारी राजकुमार के पास आई, वाक़ई में काली, बरसात वाली रात थी.

राजकुमारी ने आत्मविश्वास से दरवाज़ा खटखटाया.

राजकुमार रेलिंग से फिसलता हुआ आया: उसे हर रात ऐसा लगता था, कि कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है, और वह बड़ी सफ़ाई से फ़िसलना सीख गया था.

उसने दरवाज़ा खोला, और (क्यूबिज़्म की ख़ातिर कहूँगा) हवा ने प्रिज़्म की भांति बारिश को चारों कोनों में बिखेर दिया और छतरी को गोलाकार आकृति बनाते हुए फेंक दिया.

राजकुमार ने फ़ौरन छतरी को पहचान लिया.

वह अपने पैरों से भी नीचे झुका (वह तो देहलीज़ पर खड़ा था ना) और बोला:

 “आईये, राजकुमारी, अपने घर में आईये”.

वह अन्दर आई; बारिश हो रही थी.

वह इतनी थक गई थी कि छतरी बन्द किए बिना ही सीढ़ियाँ चढ़ने लगी.

राजकुमार ने उसे फ़ायर-प्लेस के सामने बिठाया, आग जलाई, मेज़ सजाई और भागने की सोचने लगा. वह उसे तोहफ़ा देना चाहता था:
1) गुलाब,
2) बुलबुल.

राजकुमार परेशान हो गया.

बस, तभी फ़्राईड मछली हँसने लगी.

फ़्राईड मछली पूरब की कहानियों में हँसती है. इसके बारे में विस्तार से अपनी दूसरी किताबों में बताऊँगा.

यूरोपियन साहित्य में, जहाँ तक मुझे ज्ञात है, वह पहली बार मेरे यहाँ हँसी थी.

वह तब हँसती है, जब देखती है कि किसी ने झुनझुने के बदले अपने दिल का तोहफ़ा दे दिया है.
इस बार वह बेतहाशा हँस रही थी, पूँछ को छपछपा रही थी और सॉस उछाल रही थी.

 “प्रिंस,” – उसने कहा, - “तुम दूसरों की कहानियों को क्यों बिगाड़ते हो?”
 “एण्डरसन ने मुझे बदनाम कर दिया है,” प्रिंस ने जवाब दिया.
मेरा घर और मेरा दिल राजकुमारी का है!
र्क्योंकि वो, जिससे प्यार करते हैं, कभी भी क़ुसूरवार नहीं होता.
और तू चुपचाप यहीं पड़ी रह और सॉस न उछाल, क्योंकि राजकुमारी अभी तुझे खाने वाली है.”     
“तू ख़ुद ही खाया जा चुका है, ओ फ्राईड प्रिंस”, मछली ने कहा.

इतना कहकर वह दुबारा मर गई, उकताहट के मारे: वह राजकुमारी से प्यार नहीं करती थी.

और, ये रहा उपन्यास का दूसरा संभावित अंत.

राजकुमारी राजकुमार के साथ एक ही घर में रहती है, क्योंकि शहर में ख़ाली फ्लैट्स बहुत ही कम हैं.

राजकुमार खिलौने सुधारने वाला बन गया: वह ग्रामोफ़ोन्स सुधारता है और झुनझुने बनाता है, जिनके साथ शिम्मी डान्स किया जा सकता है.

राजकुमारी उसके घर में रहती है.

मगर वह औरों के साथ रहती है.

लगता है कि एक बिन्दु से किसी सरल रेखा पर कई लम्ब डाले जा सकते हैं.

ये सब तब समझ में आ सकता है, जब, या तो तुम नॉन-यूक्लिड जॉमेट्री को अच्छी तरह जानते हो, या उस हालत में, जब श्लेष इन्सान को इतना कम हंसाता है, जैसे पेट का अल्सर.

यह सब है – “कैसे”.


मेरे सारे पत्र उस बारे में हैं कि मैं तुमसे “कैसे” प्यार करता हूँ.

शनिवार, 8 अगस्त 2015

Twenty Seventh Letter

पत्र सत्ताईसवाँ

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सापेक्षता के सिद्धांत के बारे में, और कानों में बालियों वाले जर्मन के बारे में.
यहीं उस चुहिया की कहानी भी है, जो लड़की बन गई थी.  
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क्या कानों में बालियाँ पहनने वाला आदमी आकर्षक हो सकता है?

बेशक, सिर्फ नक़ाब पहनकर किए गए नृत्यों में.

पतलूनें छैलों जैसी, मगर अपने आप की इज़्ज़त करने वाले इन्सान के लिए काफ़ी चौड़ी. और सड़क पर – ऊदबिलाव की हैट.

और तुम उसकी ओर बस खिंची चली जाती हो!

क्या करूँ, आल्या, तुमसे साक्षेपता के सिद्धांत के बारे में सीखूँगा.

ख़ैर, देखो, इस कहानी को.

एक सन्यासी ने एक चुहिया को, जिसे वह प्यार करने लगा था – अजीब सा प्यार, मगर बर्लिन में अकेलेपन के कारण और कर भी क्या सकते हो – लड़की में परिवर्तित कर दिया.

लड़की सन्यासी से प्यार नहीं करती थी. सन्यासी उससे ईर्ष्या करता था.

वह उससे कहती: “तो, ऐसा है तुम्हारा प्यार.”

लड़की ने ये भी कहा: “सबसे पहले, मुझे आज़ादी चाहिए. बेहतर है तुम चले जाओ.”

सन्यासी ने उसे फ़ोन किया और कहा: “आज अच्छा दिन है!”

लड़की ने कहा: “मैंने अभी कपड़े नहीं बदले हैं.”

सन्यासी ने कहा : “मैं इंतज़ार करूँगा. जाएँगे, मैं दुकानों में तुम्हारे साथ रहूँगा.”

लड़की शॉपिंग करती रही.

फिर सन्यासी उसे शहर से बाहर, वन्नसे ले गया.

सूरज अभी डूबा नहीं था.

हालाँकि दुकानें ख़ूब सारी हैं.

उसने कहा: “क्या सूरज से शादी करोगी?”

उसी समय एक बादल ने सूरज को ढाँक दिया.

लड़की ने कहा: “बादल ज़्यादा ताक़तवर है.”

सन्यासी समझदारी दिखा रहा था, ख़ासतौर से लड़की के प्रति.

उसने कहा: “क्या तुम चाहती हो कि बादल तुम्हारा पति बने?”

तभी हवा ने बादल को भगा दिया.

लड़की ने कहा: “हवा ज़्यादा ताक़तवर है.”

सन्यासी को गुस्सा आने लगा.

टेलिफ़ोन ने उसका दिमाग़ ख़राब कर दिया.

वह चीख़ा: “मैं हवा से तुम्हारी शादी की बात करता हूँ!”

लड़की ने अपमानित होकर कहा: “मुझे हवा की ज़रूरत नहीं है, मुझे गर्मी हो रही है और हवा चल ही नहीं रही है. मुझे इस पहाड़ ने ढाँककर हवा से अलग कर दिया है. पहाड़ ज़्यादा ताक़तवर है.”

सन्यासी समझ गया कि औरतें दुकानों में काफ़ी देर तक चीज़ें पसन्द करती हैं और लड़की सोच रही है कि वह दुकान में है. उसने फ़ौरन, किसी सेल्समैन की तरह जवाब दिया: “तो पहाड़ ले लो!”

लड़की का मुख खिल गया. वह बेहद ख़ुश हो गई.

सन्यासी को लगा कि वह भी सुखी है.

उसने ऊँगली से पहाड़ के निचले हिस्से की ओर इशारा किया और कहा: “देखो!”

सन्यासी को कुछ भी दिखाई नहीं दिया.

 “देखो, वह कितना सुन्दर है, कितना ताक़तवर है, वह पहाड़ से ज़्यादा ताक़तवर है, यही है मेरा जीवनसाथी, कैसे कपड़े पहने हैं उसने!”

 “किसने?” – सन्यासी ने पूछा.

 “चूहा, प्यारे सन्यासी!” लड़की ने कहा. “उसने पहाड़ को कुतर दिया, देखो, वह मुझसे प्यार भी करने लगा है.”

 “ग्रेट,” सन्यासी ने कहा, “इससे तुम सचमुच में प्यार करोगी; ख़ैर, ये तो अच्छा हुआ कि तुमने कम से कम म्यूज़िकल-कॉमेडी के किसी आदमी से प्यार नहीं किया.”

और उसने लड़की-चुहिया के गुलाबी कानों को चूम लिया और उसे चूहों का पासपोर्ट देकर छोड़ दिया. इस पासपोर्ट से, वैसे, सभी देशों में प्रवेश मिल जाता है.

चूहे पर गुस्सा मत करो.

तांबे के बटनों से दिल छलनी हो गया है, लिफ़्ट वाले लड़के के जैकेट की तरह.

दिन भर में वह हज़ारों बार ऊपर उठता है और हज़ारों बार नीचे गिरता है.

वह चूहेदानी की लकीरें पड़ी चुहिया जैसा है.

मैं तुमसे प्यार करता हूँ – जैसे सूरज करता है. जैसे हवा करती है. जैसे पहाड़ करता है.



जैसे प्यार करते हैं : हमेशा के लिए.

बुधवार, 5 अगस्त 2015

Twenty Sixth Letter

पत्र छब्बीसवाँ

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मास्क के बारे में, बैटरी वाली मोटर के बारे में, ‘हिस्पानो सुइज़ा’ मोटर के बोनेट की लम्बाई के बारे में, आम तौर से इंटर्नल कम्बस्शन इंजिनों के बारे में और इस बारे में, कि यदि कार ‘हिस्पानो सुइज़ा’ इन्सान होती तो वह कानों में बालियाँ पहनती.
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एक मोटरिस्ट होने के नाते कहता हूँ : यह ख़त ख़ामोश तैश और निन्दा से भरपूर है.

आज रात में नींद खुल गई. एक अजीब सी चीज़ ने, जो मेरे हाथों में थी, मुझे जगा दिया था.
ये चीज़ थी – कागज़ का काला मास्क, और मैं ख़ुद था कमरे के बीचोंबीच.

ज़ाहिर है, मेरे लिए बेहतर होता सेनेटोरियम जाना.

प्यार के बारे में बात करना मेरे लिए ख़तरनाक है.

कारों के बारे में बात करेंगे.

टैक्सी में जाना बड़ा उदास लगता है!

सबसे ज़्यादा बुरा लगता है इलेक्ट्रिक मोटर में जाना. उसका दिल धड़कता नहीं है, वह चार्ज्ड होती है, भारी-भारी बैटरियों से भरी होती है, मगर बैटरी डिस्चार्ज होते ही – वह खड़ी हो जाती है.
अपने ज़माने में मैंने कई कारें चलाई हैं, कभी तो उन्होंने ही मुझे टक्कर मारी; कई आदमियों को मैंने भी उठाया.

कभी कभी बर्लिन में कार चलाने को जी चाहता है, ऐसी कार जिस पर ड्राइवर का बस नहीं चलता, एक दो बार ऐसा किया भी, मगर तीसरी बार बुरी तरह से ग़लती कर बैठा.
कार स्टार्ट करने चला, मगर कार तो इलेक्ट्रिक वाली थी, उसका रेडियेटर कृत्रिम था, और हैंडल, बेशक, थे ही नहीं. ऐसी कार को कैसे चलाऊँ जिसके पास दिल ही नहीं है, जो चलाई ही नहीं जा सकती? उसका रूप भी झूठा है, जैसे शर्ट का सामने का हिस्सा और कफ़-लिंक्स; सामने बोनेट बना है, मानो इंजिन के लिए हो, मगर उसमें भरे हैं चीथड़े.

इंटर्नल कम्बस्शन इंजिन होने का नाटक करते हैं.

बेचारे रूसी शरणार्थी!

उसका दिल धड़कता नहीं है.

बर्लिन में रास्तों पर ज़ोर-ज़ोर से रूसी में बोलना मना है, इसे बदतमीज़ी समझा जाता है. ख़ुद जर्मन भी तो फ़ुसफ़ुसाकर ही बात करते हैं.

जिओ, मगर ख़ामोश रहो.

कार की मुर्दा बैटरी की तरह, बिना शोर के, बिना उम्मीद के, शहर में भटकते रहो.

सांस रोककर, वो मिटाते रहो, जो तुम्हारे पास था, और मिटाने के बाद, मर जाओ. 

हम रूस में चार्ज्ड हुए थे, और यहाँ सिर्फ बैटरी डाऊन हो रही है, डाऊन हो रही है और जल्दी ही हम खड़े हो जाएँगे.

बैटरियों की जस्ते की पट्टियाँ सिर्फ फ़ालतू वज़न में परिवर्तित हो जाएँगी.

एसिड खट्टा हो जाएगा.

खट्टे बोझिलपन से गंधाते हैं बर्लिन के रूसी अख़बार.

मैंने खट्टे और भारी-भरकम शब्द लिख दिए हैं.

बेहतर है कि हम कारों के ब्राण्ड्स के बारे में बातें करें.

क्या तुम्हें ‘हिस्पानो सुइज़ा’17 पसन्द है?

बकवास! अपना राज़ मत खोलो.

तुम्हें महंगी चीज़ें पसन्द हैं और अगर रात को दुकान में चीज़ों के मूल्य वाली स्लिप गड़बड़ कर दी जाए, तो भी तुम उन्हें ढूँढ़ लोगी. “हिस्पानो सुइज़ा’? बुरी कार है. ईमानदार, भली कार - भरोसेमन्द स्पीड वाली, जिसमें ड्राइवर तिरछा होकर बैठता है, अपनी शक्तिहीनता पर अकड़ते हुए – वो है ‘मर्सिडीज़’, ‘बेंज़’, ‘फ़िएट’, ‘देलोन-बेल्विल’, ‘पेक्कार्ड’, ‘’रेनो’, ‘देलाझ’ और बेहद महंगी, मगर संजीदा ‘रोल्स-रॉयस’, असाधारण रूप से आसानी से चलने वाली.

इन सभी कारों में इनके ढाँचे की रचना मोटर की संरचना को और ट्रांसमिशन को प्रकट करती है और, साथ ही, वह हवा के न्यूनतम प्रतिरोध के लिए की गई है. रेसिंग-कार्स की अक्सर नाक लम्बी होती है, वे सामने से ऊँची होती हैं; इसे इस तरह समझना चाहिए कि खूब तेज़ वेग के चलते, सिर्फ ऐसा ही आकार वातावरण से न्यूनतम प्रतिरोध करता है. तुमने देखा ही है, आल्या, कि पंछी आगे की ओर पूँछ की तरफ़ से नहीं, बल्कि चौड़े सीने की ओर से उड़ता है.

बोनेट की लम्बाई, बेशक, इंजिन के सिलिण्डर्स की संख्या ( 4, 6, या कभी-कभार 8,12) और उनके व्यास पर निर्भर करती है. पब्लिक को लम्बी नाक वाली कारों की आदत हो गई है. ‘हिस्पानो सुइज़ा’ – लम्बे स्ट्रोक वाली कार है, मतलब उसके निचले और ऊपरी डेड-पॉइन्ट्स के बीच काफ़ी दूरी है.
ये तेज़ गति वाली, तैश में चलने वाली कार है , जैसे – कोकीन सूंघकर आई हो. उसका इंजिन ऊँचा और पतला है.

ये उसका अपना मामला है.

मगर कार का बोनेट लम्बा है.

इस तरह, “हिस्पानो सुइज़ा” अपने बोनेट का मास्क पहने हुए होती है, उसमें रेडियेटर और इंजिन के बीच 28 इंच की भी जगह नहीं है. ये झूठ के 28 इंच हैं, जो अकडू लोगों के लिए छोड़े गए हैं, संरचना के विनाश के इन 28 इंचों से मैं तैश में आ जाता हूँ.

अगर मैं तुमसे नफ़रत करने लगूँ, अगर मैं कभी गा सकूँ:

लुप्त हो जाओ ऐ राहों,
जिन पर मैं चलता था! -
तो मैं तुम्हारी याद को शैतानों के पास नहीं, बल्कि “हिस्पानो सुइज़ा” की उस ख़ाली जगह पर फ़ेंक दूँगा.

तुम्हारी “हिस्पानो सुइज़ा” महंगी तो है, मगर बकवास है.

उसमें दरवाज़े के बदले एक किनारे को झुकने वाली सीट्स लगाई जाती हैं. अल्फोन्सों 18 को पसन्द आएँगी.


उसकी स्टीयरिंग का झुकाव अच्छा नहीं है और अगर वह इन्सान होती तो उसके कानों में ज़रूर बालियाँ होतीं. तुम्हारी “हिस्पानो सुइज़ा” का रेडियेटर भी अपनी जगह पर नहीं है, उसके ‘कफ़-लिंक्स’ हमेशा बन्द होते हैं. वह तुम्हें कभी भी प्यार नहीं करेगी. मेरे लिए ये रूसी शरणार्थियों के भाग्य से ज़्यादा दिलचस्प है. ख़ैर, “हिस्पानो सुइज़ा” का पहाड़ी इलाकों में सबसे लम्बी दूरी तय करने का रेकॉर्ड है.

रविवार, 2 अगस्त 2015

Twenty Fifth Letter

पत्र पच्चीसवाँ

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बसंत के बारे में, प्रागेर डील, एरेनबुर्ग, तुरहियों के, वक़्त के बारे में, जो चलता ही रहता है, होठों के बारे में, जो फिर से ताज़ा-तरीन हो जाते हैं, और दिल के बारे में जो फ़ड़फ़ड़ाता रहता है, उस समय, जब पराये होठों का रंग सिर्फ निकलता है. मेरे दिल के बारे में. 
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तापमान प्लस सात डिग्री हो गया है. शिशिर वाला ओवरकोट बसंत वाले ओवरकोट में बदल गया है. सर्दियाँ जा रही हैं, और चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे फिर से ठण्ड बर्दाश्त करने के लिए कोई मजबूर नहीं करेगा.

अपनी वापसी में यक़ीन करेंगे. बसंत आएगा.

तुमने मुझसे कहा था कि बसंत में तुम्हें ऐसा लगता रहता है, जैसे तुमने कुछ खो दिया है, या तुम कुछ भूल गई हो और याद नहीं कर पा रही हो.

बसंत में मैं काला लबादा ओढ़े पीटर्सबर्ग के तटबंधों पर घूमता था. वहाँ सफ़ेद रातें होती हैं, और पुलों के नदी पर गिरने से पहले सूरज निकलने लगता है. तटबंधों पर मैंने बहुत कुछ पाया है. मगर तुम नहीं पा सकोगी, तुम सिर्फ ‘खोना’ ही देख सकती थीं. बर्लिन के तटबंध दूसरी तरह के हैं. वे भी अच्छे हैं. नहरों के किनारों पर चलकर मज़दूरों की बस्ती में जाना अच्छा लगता है.

कहीं कहीं नहरें चौड़ी होकर बन्दरगाहों में बदल जाती हैं, पानी के ऊपर क्रेन्स लटकती हैं. जैसे पेड़ हों. वहाँ, हेलेशेस तोर के पास, उस जगह से आगे, जहाँ तुम रहती हो, गैस प्लांट्स का गोल टॉवर है, जैसे हमारे ओब्वोद्नी में है. उन टॉवर्स तक, जब मैं अठारह साल का था, मैं हर रोज़ अपनी प्रियतमा को छोड़ने जाता था. नहरें उस समय भी ख़ूबसूरत लगती हैं, जब उनके किनारे से शहरी रेल का ऊँचा प्लेटफॉर्म गुज़रता है.

मुझे याद आ रहा है कि मैंने क्या खोया है.

ख़ुदा का शुक्र है, बसंत आ गया है.

प्रागेर डील से छोटी-छोटी मेज़ें बाहर सड़क पर लाई जाएँगी, और ईल्या एरेनबुर्ग आसमान देखेगा.
ईल्या एरेनबुर्ग बर्लिन की सड़कों पर वैसे ही चलता है, जैसे पैरिस और दूसरे शहरों में - जहाँ शरणार्थी हैं - चलता था, झुक कर, मानो ज़मीन पर कोई खोई हुई चीज़ ढूँढ़ रहा हो. वैसे, ये सही तुलना नहीं है – शरीर कमर से नहीं झुका है, बल्कि सिर्फ सिर झुका हुआ है और पीठ गोल हो गई है. भूरा ओवरकोट, चमड़े की कैप. सिर एकदम जवान. उसके तीन व्यवसाय हैं: 1) पाईप पीना, 2) शक्की होना, कैफ़े में बैठना और ‘चीज़ें’ प्रकाशित करना, 3) ‘जूलियो जुरेनितो’ लिखना.

“जूलियो जुरेनितो” की हाल ही में प्रकाशित कड़ी का नाम है “ट्रस्ट डी.ई.” एरेनबुर्ग से मानो किरणें निकलती हैं, इन किरणों के अलग अलग नाम हैं, उनकी विशेषता ये है, कि वे पाईप के कश लगाती हैं. ये किरणें कैफ़े को भर देती हैं.   

कैफ़े के कोने में ख़ुद शिक्षक बैठता है और पाईप के कश लगाने की कला, उपन्यास लिखना और दुनिया तथा आईस्क्रीम को शक की नज़रों से देखना सिखाता है.

प्रकृति ने एरेनबुर्ग को भर-भरके दिया है – उसके पास सोवियत पासपोर्ट है.

इस पासपोर्ट के  साथ वह विदेशों में रहता है. और हज़ारों वीज़ा हैं उसके पास.

मैं नहीं जानता कि ईल्या एरेनबुर्ग कैसा लेखक है.

पुरानी चीज़ें अच्छी नहीं हैं.

“जूलियो जुरेनितो” के बारे में सोचना चाहता हूँ. ये काफ़ी अख़बारी चीज़ है,  व्यंग्यात्मक आलेख – कथानक सहित, सांकेतिक प्रकार के लोग और ख़ुद बूढ़ा एरेनबुर्ग, प्रार्थना करता हुआ; पुराने काव्य का सांकेतिक रूप में प्रयोग किया गया है.

उपन्यास वोल्टेयर के “केंडिडे” की तरह आगे बढ़ता है, बेशक, कथानक की कम विविधता सहित.  
“केंडिडे” में कथानक बढ़िया है: जब तक कुनेगोन्दे को ढूँढ़ते हैं, वह सब के साथ रहती है और बूढ़ी हो जाती है. नायक को बुढ़िया मिलती है, जो बल्गारियन नौजवान की चिकनी त्वचा को याद करती है.

इस कथानक को, या यूँ कहें कि – इस तथ्य को प्रस्थापित करने का प्रयत्न कि “समय गुज़रता है” और परिवर्तन होते रहते हैं, बोकासिओ द्वारा भी किया गया था. वहाँ औरत- वधू एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती है और अंत में अपने पति को प्राप्त होती है, कुँआरेपन का यक़ीन दिलाते हुए.

मगर रास्ते में उसे केवल हाथ ही नहीं मिले. ये लघु-उपन्यास इस प्रसिद्ध वाक्य से समाप्त होता है कि होंठ मरते नहीं हैं, बल्कि चुम्बनों के बाद वे सिर्फ ताज़ा तरीन हो जाते हैं.

ख़ैर, कोई बात नहीं, मुझे जल्दी ही याद आ जाएगा कि क्या भूल गया था. एरेनबुर्ग का अपना व्यंग्य है, उसके उपन्यास और कहानियाँ एलिज़ाबेती समय के लिए नहीं हैं, उसमें अच्छी बात ये है कि वह महान रूसी साहित्य की परंपरा को आगे नहीं बढ़ाता और “बुरी चीज़ें” लिखने को प्राथमिकता देता है.

पहले मुझे एरेनबुर्ग पर इसलिए गुस्सा आता था कि वह, यूरोपियन कैथोलिक या स्लावोफ़िल से यूरोपियन संरचनावादी बनकर भी विगत को भूला नहीं है.

सावेल से वह पावेल नहीं बना. वह पावेल साव्लोविच है और “जानवरों का जोश” प्रकाशित कर रहा है.

वह सिर्फ अख़बारी कार्यकर्ता नहीं है, जो उपन्यास में औरों के विचारों को इकट्ठा करता है, बल्कि लगभग कलाकार है, जो पुरानी मानवीय संस्कृति और नई दुनिया के विरोधाभास को महसूस करता है, जो इस समय मशीनों द्वारा बन रही है.

मुझे तो सारे विरोधाभासों में सबसे ज़्यादा बुरा ये लगता है कि जब तक होंठ ताज़ा तरीन होते हैं – दिल ज़ोर-ज़ोर से फ़ड़कता है और ये भी, कि जो भुला दिया गया है, वह भी उसके साथ फ़ड़कता है, अनजाना सा.