ज़ू
या
(अ)प्रेम-पत्र
लेखक
विक्टर
श्क्लोव्स्की
अनुवाद
आ.
चारुमति रामदास
भूमिका
इन्सान अकेला बर्फ पर
जा रहा है, उसके चारों ओर कोहरा है. उसे लगता है कि वह सीधे जा रहा है. हवा कोहरे को
भगा रही है: इन्सान को अपना लक्ष्य नज़र आता है, वह अपने पैरों के निशान देखता है.
ऐसा लगता है कि बर्फ
पिघल गई और मुड़ गई है: पद-चिह्न गड्ड-मड्ड हो गए हैं – इन्सान भटक गया है.
मैं ईमानदारी से जीना
और निर्णय लेना चाहता था, मुसीबत से छिटकना नहीं चाहता था, मगर अपना रास्ता खो बैठा.
गलती से, और भटकते हुए, मैं विदेश आ पहुँचा, बर्लिन में.
इस बारे में मैं ‘ए
सेंटिमेंटल जर्नी’ में लिख चुका हूँ, जो हमारे यहाँ दो बार प्रकाशित हो चुकी है; अब
मैं उसका पुन: प्रकाशन नहीं करना चाहता.
ये सब हुआ था सन् 1922
में. विदेश में मैं ग़मगीन रहा; एक साल बाद गोर्की और मायकोव्स्की की कोशिशों के परिणामस्वरूप
मैं अपनी मातृभूमि वापस लौट सका.
ये पुस्तक, जो आप पढ़ने
जा रहे हैं, बर्लिन में लिखी गई थी, हमारे यहाँ इसकी चौथी आवृति प्रकाशित हो रही है.
1965
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