गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

Third Introduction

तीसरी प्रस्तावना


मैं सत्तर साल का हो गया हूँ. मेरी आत्मा मेरे सामने पड़ी है.

वह झुक गई है, जर्जर हो चुकी है.

उस किताब ने तब उसे झुका दिया था. मैंने उसे सीधा कर दिया.

दोस्तों की मौत ने आत्मा को झुका दिया. युद्ध ने. विवादों ने.

गलतियाँ. अपमान. सिनेमा. और बुढ़ापा, जो आ ही गया. मुझे इस बात से आराम मिलता है कि मैं उन जगहों को नहीं जानता, जहाँ तुम घूमती हो, तुम्हारे नए दोस्तों को नहीं जानता, तुम्हारी पनचक्की के पास के पुराने पेड़ों को नहीं जानता.

स्मरण शक्ति तरंगों के समान बिखर गई. तरंगें पथरीले किनारे से टकराईं. विगत नहीं है.

किनारे की ओर गईं गोल-गोल लहरें, प्यार की अंगूठियाँ.

सागर के किनारे नहीं बैठूँगा, अच्छे मौसम का इंतज़ार नहीं करूँगा, अपनी सुनहरे पंखों वाली मछली को नहीं पुकारूँगा.

रात को सागर के किनारे नहीं बैठूँगा, पुरानी फेल्ट हैट से पानी नहीं निकालूँगा.
नहीं कहूँगा: “मुझे अंगूठियाँ दे, ऐ सागर.”

रात आ ही गई. आसमान से अबूझ तारे समेट लिए गए.

सिर्फ एक वीनस ही, शाम और सुबह का प्रमुख तारा, आसमान में लौट आया है. प्रेम के प्रति वफ़ादार: किसी और को प्यार करता हूँ.

सुबह, उस समय, जब सफ़ेद और नीले धागे में फर्क करना संभव होता है, मैं कहता हूँ वो शब्द – प्रेम.

सूरज आसमान में बिखर गया है.

गीत की सुबह का अंत नहीं होता, सिर्फ हम चले जाते हैं.

किताब से देखेंगे, जैसे पानी से देखते हैं, किन-किन दर्रों से दिल गुज़रा है, विगत से कितना लहू और स्वाभिमान बचा है, कितनी तथाकथित काव्यात्मकता बची है.  

1963. मॉस्को

टिप्पणी: आल्या कई दशकों से फ्रांसीसी लेखिका है, अपने गद्य के लिए, और उसे समर्पित कविताओं के लिए प्रसिद्ध है.

Second Introduction

दूसरी प्रस्तावना

पुरानी किताब के लिए

मेरा विगत – तुम थे.

बर्लिन की सड़कों के प्रातःकालीन फुटपाथ थे.

बाज़ार, खिले हुए सेबों की सफ़ेद पंखुडियों से ढंके.

सेबों की टहनियाँ बाज़ार की लम्बी मेज़ों पर बाल्टियों में खड़ी थीं.

बाद में, गर्मियों में, उनमें थे गुलाब, लम्बी टहनियों पर – शायद, ये बेलों वाले गुलाब थे.

उन्तेर-डेन-लिन्डेन पर फूलों की दुकान में ऑर्चिड्स थे, मगर मैंने उन्हें कभी नहीं ख़रीदा. ग़रीब था. गुलाब खरीदता था – ब्रेड के बदले.

दिल का जो टुकड़ा काटा गया था, उसे कब का ले गए. मुझे सिर्फ उस विगत का अफ़सोस है: विगत के इन्सान का.

मैंने उसे (विगत के स्वयँ को) इस किताब में छोड़ दिया है, जैसे कि पहले के उपन्यासों में किसी अपराधी नाविक को एक निर्जन टापू पर छोड़ दिया करते थे.

पड़ा रह तू गुनहगार: यहाँ गर्माहट है. मैं तुझे नहीं सुधार सकता. बैठा रह, सूर्यास्त की तरफ़ देखता रह.

वे पत्र जो पहली आवृति में नहीं थे, वाक़ई में तेरे द्वारा लिखे गए थे, मगर तूने उन्हें कभी भेजा ही नहीं.


1924. लेनिनग्राद

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

Introduction to First Edition

तीन प्रस्तावनाएँ
लेखकीय प्रस्तावना
पहली आवृति के लिए


यह पुस्तक इस तरह से लिखी गई.

सबसे पहले तो मैंने सोचा कि रूसी-बर्लिन के बारे में कई किस्से प्रस्तुत करूँ, फिर ऐसा प्रतीत हुआ कि इन किस्सों को किसी सामान्य विषय में पिरोना काफ़ी दिलचस्प होगा. विषय चुना “चिड़ियाघर” (“Zoo”) – पुस्तक का शीर्षक पैदा हो गया, मगर वह विभिन्न टुकड़ों को जोड़ नहीं रहा था. फिर ये ख़याल आया कि इसे पत्रों की शक्ल के एक उपन्यास का रूप क्यों न दिया जाए.

पत्रों वाले उपन्यास के लिए किसी कारण की आवश्यकता होती है – आख़िर लोग एक दूसरे को पत्र क्यों लिखते हैं. आम तौर से एक कारण होता है – प्रेम और विरह. मैंने अंशतः इस कारण को चुना: एक प्रेमी ऐसी महिला को पत्र लिखता है, जिसके पास उसके लिए समय नहीं है. अब मुझे एक नए संदर्भ की ज़रूरत पड़ी: चूंकि पुस्तक की प्रमुख विषयवस्तु प्रेम नहीं है, अतः मैंने प्रेम के बारे में लिखने की बंदिश को चुना. परिणाम वह हुआ जिसे मैंने उपशीर्षक में दर्शाया है – “(अ)प्रेम-पत्र”.

अब तो जैसे किताब ख़ुद-ब-ख़ुद लिखती चली गई, उसे बस, ज़रूरत थी विषयवस्तु को जोड़ने की, अर्थात् प्रेम-काव्य पक्ष और वर्णनात्मक पक्ष को गूंथने की. भाग्य और विषयवस्तु के सामने सिर झुकाते हुए, मैंने इन चीज़ों को तुलनात्मक रूप से एक दूसरे से जोड़ा: तब सारे वर्णन प्रेम के रूपक प्रतीत होने लगे.

श्रृंगार-काव्य की चीज़ें इस तरह से लिखी जाती हैं: उनमें वास्तविक चीज़ों को नकारते हुए रूपकों पर बल दिया जाता है.

“प्राचीन कथाओं” से तुलना करें.


बर्लिन, 5 मार्च 1923

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

Zoo ya Aprem-patr - Bhoomika




ज़ू

या


(अ)प्रेम-पत्र


लेखक

विक्टर श्क्लोव्स्की


अनुवाद

आ. चारुमति रामदास




भूमिका


इन्सान अकेला बर्फ पर जा रहा है, उसके चारों ओर कोहरा है. उसे लगता है कि वह सीधे जा रहा है. हवा कोहरे को भगा रही है: इन्सान को अपना लक्ष्य नज़र आता है, वह अपने पैरों के निशान देखता है.

ऐसा लगता है कि बर्फ पिघल गई और मुड़ गई है: पद-चिह्न गड्ड-मड्ड हो गए हैं – इन्सान भटक गया है.

मैं ईमानदारी से जीना और निर्णय लेना चाहता था, मुसीबत से छिटकना नहीं चाहता था, मगर अपना रास्ता खो बैठा. गलती से, और भटकते हुए, मैं विदेश आ पहुँचा, बर्लिन में.

इस बारे में मैं ‘ए सेंटिमेंटल जर्नी’ में लिख चुका हूँ, जो हमारे यहाँ दो बार प्रकाशित हो चुकी है; अब मैं उसका पुन: प्रकाशन नहीं करना चाहता.

ये सब हुआ था सन् 1922 में. विदेश में मैं ग़मगीन रहा; एक साल बाद गोर्की और मायकोव्स्की की कोशिशों के परिणामस्वरूप मैं अपनी मातृभूमि वापस लौट सका.

ये पुस्तक, जो आप पढ़ने जा रहे हैं, बर्लिन में लिखी गई थी, हमारे यहाँ इसकी चौथी आवृति प्रकाशित हो रही है.

1965